"आत्म-पांडुलिपि"
पंकज शर्मामैं नायाब उलझनों की मुकम्मल किताब हूँ—
जिसके पन्ने
ना तो किसी पुस्तकालय में दर्ज हैं
ना किसी अनुक्रमणिका में।
मेरी जिल्द पर
मेरा ही नाम धुँधला लिखा है,
और हर पाठक
पहले ही पृष्ठ पर
खुद को खो देता है।
मुझे मेरे अलावा कोई नहीं जानता—
क्योंकि जानना यहाँ
सूचना नहीं,
अनुभव की आग है।
लोग मेरी बातों को सुनते हैं,
पर मेरे मौन को
अशिष्ट समझकर
नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
मैं प्रश्नों से बना हूँ,
उत्तर मेरे यहाँ
अतिथि की तरह आते हैं
और बिना ठहरे लौट जाते हैं।
मेरे भीतर
तर्क थककर बैठ जाता है,
और संशय
घर का सबसे पुराना सदस्य है।
मैं भीड़ में खड़ा
एकल व्यक्ति हूँ—
जहाँ पहचान
चेहरों से नहीं,
समझौते से तय होती है।
मैं समझौते से इंकार करता हूँ,
इसलिए
अक्सर अकेला रह जाता हूँ।
मेरे भीतर समय
घड़ी नहीं पहनता,
वह कभी
घाव बनकर रिसता है,
कभी स्मृति बनकर
अचानक सामने आ खड़ा होता है।
इतिहास मुझे
भूलने की सलाह देता है,
पर मैं वर्तमान में
कैसे छिपूँ—
यह नहीं सिखाता।
मैंने सत्य को
कई बार
नंगे पाँव चलते देखा है,
और व्यवस्था को
उसे जूते पहनाने की
साज़िश करते।
इसीलिए
मेरी भाषा
कभी-कभी
असभ्य लगती है।
मैं खुद का
अनुवाद नहीं कर पाता—
हर शब्द
कुछ छूट जाने की
शिकायत करता है।
मेरी पीड़ा
वाक्यों में नहीं,
विराम-चिह्नों में
ज़्यादा स्पष्ट है।
मैं नायाब उलझनों की
मुकम्मल किताब हूँ—
अभी अधूरी,
अभी लिखी जा रही।
मुझे मेरे अलावा
कोई नहीं जानता,
और शायद
यही मेरा
सबसे सटीक परिचय है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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