मानवाधिकार के नाम पर सत्ता का खेल
दिव्य रश्मि के उपसम्पादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से |मानवाधिकार की दुहाई से भरी इस दुनिया में जब-जब किसी राष्ट्र की संप्रभुता अपने पैरों पर खड़ी होने का साहस करती है, तब-तब उसे सभ्यता, लोकतंत्र और मानवता के नाम पर कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। यह कोई नया दृश्य नहीं है, बल्कि दशकों से दोहराई जा रही एक सुव्यवस्थित वैश्विक पटकथा है, जिसके सूत्रधार वही हैं जो स्वयं को विश्व का नैतिक प्रहरी घोषित करते आए हैं। समय बदला, तकनीक बदली, हथियार बदले, बयानबाजी बदली, लेकिन जो नहीं बदला वह है ताकत के नशे में चूर वह मानसिकता, जो अपने स्वार्थ को ही मानवता का पर्याय मानती है। इसी मानसिकता का ताजा प्रतिबिंब निकोलस मादुरो के इर्द-गिर्द बुनी गई अंतरराष्ट्रीय कथा में दिखाई देता है, जिसने अनायास ही सद्दाम हुसैन की विलुप्त कर दी गई स्मृतियों को पुनर्जीवित कर दिया।
जब अमेरिका किसी देश के राष्ट्रपति को तानाशाह घोषित करता है, तो वह केवल एक व्यक्ति नहीं होता है, बल्कि पूरे राष्ट्र की अस्मिता को अभियुक्त बना दिया जाता है। सद्दाम हुसैन के समय कहा गया कि उसके पास सामूहिक विनाश के हथियार हैं, जो पूरी मानवता के लिए खतरा हैं। दुनिया ने देखा कि वर्षों की खोज, हजारों मौतों और एक सभ्यता के मलबे के बाद भी वे हथियार कभी नहीं मिले। लेकिन तब तक इराक एक देश नहीं, बल्कि खंडहर बन चुका था। लाखों लोग मारे जा चुके थे, एक पीढ़ी अनाथ हो चुकी थी और मध्य पूर्व की स्थिरता इतिहास के सबसे बड़े झूठ की भेंट चढ़ चुकी थी। क्या यह मानवाधिकार था या मानवता के नाम पर किया गया सबसे बड़ा अपराध। इस प्रश्न का उत्तर आज भी अमेरिकी सत्ता के गलियारों में गूंजने की अनुमति नहीं पाता।
आज वही दृश्य वेनेजुएला में दोहराया जा रहा है। फर्क केवल इतना है कि इस बार हथियारों की जगह आर्थिक प्रतिबंध हैं, बमों की जगह मुद्रा युद्ध है और सैनिकों की जगह मीडिया है। निकोलस मादुरो को तानाशाह कहा जाता है, चुनावों को अवैध बताया जाता है और जनता की दुर्दशा का जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन यह प्रश्न जानबूझकर अनुत्तरित छोड़ दिया जाता है कि वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को किसने सांस लेने से रोका। जिस देश के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं, उसे भिखारी बनाने में किसकी भूमिका रही। प्रतिबंधों के कारण दवाइयाँ नहीं पहुँच पातीं, खाद्य आपूर्ति बाधित होती है और फिर उसी संकट को दिखाकर ‘मानवीय हस्तक्षेप’ का नैतिक लाइसेंस माँगा जाता है। यह वही पुराना नुस्खा है, जिसे सद्दाम, नोरिएगा, गद्दाफी और चार्ल्स टेलर पर आजमाया गया था।
पनामा के मैनुअल नोरिएगा कभी अमेरिका के लिए उपयोगी थे। सीआईए के करीबी, साम्यवाद के खिलाफ लड़ाई के साझेदार और लैटिन अमेरिका में अमेरिकी हितों के संरक्षक। लेकिन जैसे ही उन्होंने अपनी स्वतंत्र नीति अपनाने की कोशिश की, वे ड्रग तस्कर, तानाशाह और लोकतंत्र के दुश्मन घोषित कर दिए गए। ‘ऑपरेशन जस्ट कॉज’ के नाम पर पनामा पर हमला किया गया, राजधानी बमों से दहल उठी और हजारों निर्दोष लोग मारे गए। यह सब लोकतंत्र की बहाली के लिए किया गया बताया गया, लेकिन लोकतंत्र की इस बहाली में पनामा की आत्मा कहीं दफन हो गई।
मिस्र के मोहम्मद मोर्सी का अपराध यह नहीं था कि वे लोकतांत्रिक नहीं थे, बल्कि उनका अपराध यह था कि वे अमेरिकी और इजराइली एजेंडे के अनुरूप नहीं थे। लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए राष्ट्रपति को सत्ता से हटाने वाले सैन्य तख्तापलट पर वही अमेरिका मौन रहा, जो दुनिया भर में लोकतंत्र की मशाल लेकर घूमता है। मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनता की इच्छा, यह सभी शब्द उस समय अमेरिकी शब्दकोश से अचानक गायब हो गए। यह मौन इस बात का प्रमाण था कि सिद्धांत केवल तब तक सिद्धांत हैं, जब तक वे स्वार्थ से न टकराएँ।
लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी का हश्र भी इसी फेहरिस्त का हिस्सा है। एक समय वे पश्चिम के दुश्मन थे, फिर मित्र बने, और अंततः फिर से राक्षस घोषित कर दिए गए। ‘नो-फ्लाई जोन’ के नाम पर की गई बमबारी ने लीबिया को एक असफल राष्ट्र में बदल दिया। गद्दाफी की निर्मम हत्या को लोकतंत्र की जीत बताया गया, लेकिन आज लीबिया गुलाम बाजारों, गृहयुद्ध और आतंकवादी गुटों का गढ़ बन चुका है। क्या यही वह मानवाधिकार हैं, जिनकी रक्षा के लिए हस्तक्षेप किया गया था?
चार्ल्स टेलर, इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, सूची लंबी है और पैटर्न एक जैसा। पहले देश को अस्थिर करो, फिर अस्थिरता को कारण बताकर हस्तक्षेप करो, और अंत में उस मलबे पर अपने हितों का महल खड़ा करो। इस प्रक्रिया में मानवाधिकार एक हथियार बन जाता है, लोकतंत्र एक मुखौटा और शांति एक प्रचार वाक्य। असल में यह सब एक साम्राज्यवादी मानसिकता का विस्तार है, जो मानती है कि दुनिया को चलाने का नैतिक अधिकार केवल उसके पास है।
अमेरिकी राजनीति में राष्ट्रपति बदलते हैं, चेहरे बदलते हैं, भाषणों की भाषा बदलती है, लेकिन नीति की आत्मा वही रहती है। बुश ने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर देशों को रौंदा, ट्रम्प ने ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे के साथ उसी नीति को और अधिक नग्न रूप में प्रस्तुत किया। फर्क केवल शैली का था, मंशा की नहीं। एक ने झूठ को नैतिकता के आवरण में ढका, दूसरे ने उसे खुलेआम स्वीकार किया। लेकिन दोनों के केंद्र में वही घमंड था ताकत का, डॉलर का और हथियारों का।
मानवाधिकार की बात तब खोखली लगने लगती है, जब ग्वांतानामो बे जैसे यातना शिविरों की याद आती है, जहाँ वर्षों तक बिना मुकदमे के लोगों को कैद रखा गया। जब अबू गरीब की तस्वीरें सामने आती हैं, जहाँ कैदियों को अमानवीय यातनाएँ दी गईं। जब ड्रोन हमलों में मारे गए बच्चों को ‘कोलैटरल डैमेज’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। यदि मानवाधिकार सचमुच वैश्विक मूल्य होता, तो उनका मूल्यांकन सत्ता के मित्र और शत्रु के आधार पर नहीं किया जाता।
विडंबना यह है कि हर पीढ़ी को यह कथा नए सिरे से सुनाई जाती है। मीडिया के जरिए, अकादमिक विमर्श के जरिए और कूटनीतिक भाषा के जरिए। नई पीढ़ी को बताया जाता है कि यह सब सभ्यता की रक्षा के लिए किया गया, कि यह बुराई के खिलाफ अच्छाई की लड़ाई थी। शायद इसीलिए व्यंग्य में ही सही, यह कहा जा सकता है कि अपनी परंपराओं से नई पीढ़ी को रूबरू कराने के लिए अमेरिकी नीति को बधाई दी जानी चाहिए, क्योंकि उसने इतिहास को दोहराने में कभी कोताही नहीं बरती।
यह लेख केवल व्यक्तियों की बात नहीं करता, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था की आलोचना है, जिसमें शक्ति ही न्याय बन जाती है। जहाँ अंतरराष्ट्रीय कानून शक्तिशाली के हाथों में एक औजार बनकर रह जाता है। जहाँ संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थान भी अक्सर मूकदर्शक बन जाता है। प्रश्न यह नहीं है कि सद्दाम हुसैन, मादुरो या गद्दाफी निर्दोष थे या दोषी, प्रश्न यह है कि क्या किसी एक देश को यह अधिकार है कि वह पूरी दुनिया का न्यायाधीश बन बैठे। क्या मानवाधिकारों की रक्षा का ठेका केवल उन्हीं के पास है, जिनके अपने हाथ खून से सने हैं।
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