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माँ शारदे — भजनात्मक छंद में

माँ शारदे

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
माँ शरणागत हूँ तेरी, करुणा का संसार दे।
श्वास-श्वास में बस जा माँ, जीवन को साकार दे।
श्रद्धा-दीप जलाए मन, प्रीति का संचार दे।
भाव की थाली लिए मैं, द्वार पर माँ शारदे।।

वीणा के स्वर झंकारें, मौन हृदय गा उठे।
ज्ञान सुधा के कण झरें, अज्ञान तम बह उठे।
शब्द-शब्द में बस जा तू, वाणी को अधिकार दे।
भाव की थाली लिए मैं, द्वार पर माँ शारदे।।०१।।

नेत्रों में करुणा भर दे, हाथों में हो कर्म योग।
चित्त शुद्ध हो सेवा में, मिट जाए सारा रोग।
सत्य-धर्म की राहों पर, चलने का उपहार दे।
भाव की थाली लिए मैं, द्वार पर माँ शारदे।।०२।।

घर-घर में मंगल गूँजे, दीप प्रेम के जल उठें।
भेद-भाव की दीवारें, पल में सब ढह उठें।
राष्ट्र-प्राण में प्रज्ञा का, उज्ज्वल नव अवतार दे।
भाव की थाली लिए मैं, द्वार पर माँ शारदे।।०३।।

अंत समय में नाम तेरा, अधरों पर बस जाए।
शरण तिहारी छोड़ न जाऊँ, सांस-सांस रच जाए।
मुक्ति नहीं बस भक्ति दे, चरणों में अधिकार दे।
भाव की थाली लिए मैं, द्वार पर माँ शारदे।।०४।।

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