मिथिला से लंका तक: मर्यादा पुरुषोत्तम और सिया के पदचिह्न
सत्येन्द्र कुमार पाठक
रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत और उसके पड़ोसी देशों की सांस्कृतिक धड़कन है। एक जिज्ञासु यात्री के रूप में जब मैंने भगवान राम और माता सीता के जीवन से जुड़े तीन सबसे महत्वपूर्ण पड़ावों—जनकपुर, अयोध्या और अशोक वाटिका की यात्रा शुरू की, तो मुझे अहसास हुआ कि ये स्थान केवल पत्थर और मिट्टी के ढांचे नहीं, बल्कि जीवंत इतिहास हैं। यह यात्रा प्रेम, कर्तव्य और धैर्य के उस त्रिकोण को समझने की कोशिश थी, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप के चरित्र को गढ़ा है। जनकपुर जहाँ उत्सव कभी समाप्त नहीं होता है। मेरी यात्रा की शुरुआत हुई नेपाल के तराई क्षेत्र में स्थित जनकपुर से। जैसे ही मैंने इस शहर की सीमा में प्रवेश किया, कानों में 'सिया-राम' की मधुर धुन और मैथिली भाषा की मिठास घुलने लगी। जानकी मंदिर की भव्यता: जनकपुर का मुख्य आकर्षण 'जानकी मंदिर' है। सफेद संगमरमर से बना यह विशाल मंदिर हिंदू-राजपूत और इस्लामी वास्तुकला का एक अनूठा संगम है। इसे 'नौ लखा मंदिर' भी कहा जाता है। मंदिर के गर्भ गृह में खड़ा होकर जब मैंने माता सीता की शांत प्रतिमा को देखा, तो मन उस युग में चला गया जब राजा जनक को हल चलाते समय भूमि से एक पुत्री प्राप्त हुई थी।।विवाह मंडप की जीवंतता: मंदिर परिसर के पास ही वह मंडप है जहाँ राम-जानकी का विवाह हुआ था। यहाँ की दीवारों पर आज भी उस विवाह के दृश्यों को इतनी बारीकी से उकेरा गया है कि लगता है मानो शहनाइयां अभी बज उठेंगी। जनकपुर के 'धनुष सागर' और 'गंगा सागर' जैसे पवित्र सरोवरों के तट पर शाम की आरती आपको एक अलग ही आध्यात्मिक शांति से भर देती है। जनकपुर हमें सिखाता है कि बेटी केवल पराया धन नहीं, बल्कि पूरे समाज का गर्व होती है।
अयोध्या — मर्यादा और धर्म की शाश्वत नगरी जनकपुर की कोमलता को समेटे हुए मैं उत्तर प्रदेश की पावन नगरी अयोध्या पहुँचा। सरयू नदी के तट पर बसी यह नगरी आज अपने एक नए और भव्य स्वरूप में दुनिया के सामने है।।नया वैभव और प्राचीन गौरव अयोध्या में कदम रखते ही 'जय श्री राम' का जयघोष वातावरण में ऊर्जा भर देता है। हाल ही में निर्मित भव्य राम मंदिर की नक्काशी और पत्थरों की मजबूती मर्यादा पुरुषोत्तम के चरित्र की याद दिलाती है। नागर शैली में बने इस मंदिर के गर्भगृह में रामलला की मनमोहक मूर्ति को देखकर भक्त अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं।
अनुशासन की नगरी अयोध्या केवल भव्यता नहीं, बल्कि अनुशासन का नाम है। 'हनुमानगढ़ी' की 76 सीढ़ियाँ चढ़ते हुए जब मैंने अयोध्या का विहंगम दृश्य देखा, तो अहसास हुआ कि क्यों इसे अपराजेय नगरी कहा जाता था। 'कनक भवन' की सुंदरता देखकर माता सीता के प्रति अयोध्यावासियों के प्रेम का पता चलता है। सरयू के तट पर शाम को होने वाली आरती और दीपदान का दृश्य ऐसा लगता है मानो आकाश के तारे धरती पर उतर आए हों। अयोध्या हमें संदेश देती है कि राजधर्म और व्यक्तिगत सुख में से जब चुनना हो, तो मर्यादा हमेशा सर्वोपरि होनी चाहिए।
अशोक वाटिका — विरह, धैर्य और शक्ति की भूमि यात्रा का अंतिम और सबसे भावुक पड़ाव था श्रीलंका का नुवारा एलिया क्षेत्र, जिसे रामायण काल में अशोक वाटिका कहा जाता था। उत्तर भारत की गर्मी और अयोध्या की भीड़भाड़ से दूर, यह स्थान घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों और झरनों के बीच स्थित है। सीता एलिया का सन्नाटा स्थल पर पहुँचते ही वातावरण में एक अजीब सी गंभीरता महसूस होती है। 'सीता अम्मन मंदिर' उसी स्थान पर बना है जहाँ सीता जी ने 10-12 महीने बंदी के रूप में बिताए थे। मंदिर के बगल में बहता झरना ऐसा प्रतीत होता है मानो आज भी माता सीता के विरह की कथा सुना रहा हो।
हनुमान जी के पदचिह्न और जलती हुई मिट्टी: यहाँ की चट्टानों पर बड़े-बड़े गड्ढे मौजूद हैं, जिन्हें 'हनुमान जी के पदचिह्न' माना जाता है। सबसे आश्चर्यजनक अनुभव था उस्सांगोडा (Ussangoda) की यात्रा। यहाँ की मिट्टी आज भी काली है। वैज्ञानिक तर्क चाहे जो भी हों, लेकिन स्थानीय लोककथाएं कहती हैं कि यह वही स्थान है जिसे हनुमान जी ने अपनी पूंछ की आग से जलाकर राख कर दिया था। अशोक वाटिका में सीता जी का अशोक वृक्ष के नीचे बैठना और रावण के ऐश्वर्य को तिनके के समान ठुकरा देना, नारी शक्ति और आत्मसम्मान का सबसे बड़ा उदाहरण है।
जनकपुर से शुरू होकर अयोध्या के वैभव से गुजरती हुई अशोक वाटिका की राख तक पहुँचने वाली यह यात्रा जीवन के संपूर्ण चक्र को दर्शाती है। जनकपुर प्रेम और पारिवारिक मूल्यों का प्रतीक है। अयोध्या कर्तव्य, न्याय और समाज के प्रति जिम्मेदारी का केंद्र है। अशोक वाटिका हमें सिखाती है कि जब सब कुछ छीन लिया जाए, तब भी आपका चरित्र और आपका आत्मबल ही आपकी सबसे बड़ी शक्ति होता है। आज भी, जब हम इन स्थानों की यात्रा करते हैं, तो हमें लगता है कि रामायण कोई पुरानी कहानी नहीं बल्कि एक शाश्वत सत्य है जो भौगोलिक सीमाओं को पार कर भारत, नेपाल और श्रीलंका को एक ही धागे में पिरोता है। यह यात्रा केवल दर्शन के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर के 'राम' और 'सीता' को जगाने की एक कोशिश है।
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