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एला की वादियों में जीवित है रामायण: श्रीलंका के 'रावण जलप्रपात

एला की वादियों में जीवित है रामायण: श्रीलंका के 'रावण जलप्रपात

सत्येन्द्र कुमार पाठक
श्रीलंका, जिसे हिंद महासागर का 'पन्ना' कहा जाता है, अपनी गोद में न केवल प्राकृतिक सुंदरता समेटे हुए है, बल्कि यहाँ की हवाओं में इतिहास और पौराणिक कथाओं का अद्भुत संगीत भी बहता है। 10 जनवरी 2026 की वह गुनगुनी सुबह मेरे जीवन के उन सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गई, जिन्हें मैं बार-बार पलटना चाहूँगा। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के तत्वावधान में आयोजित इस सांस्कृतिक परिभ्रमण का सबसे रोमांचक पड़ाव था—एला (Ella) और वहाँ का विश्वप्रसिद्ध 'रावण जलप्रपात'। पहाड़ों का हृदय: एला की जादुई घाटियाँ - श्रीलंका का मध्य पहाड़ी क्षेत्र अपनी धुंध भरी सुबहों और अंतहीन चाय के बागानों के लिए जाना जाता है। एला, जो एक छोटा सा पर बेहद खूबसूरत कस्बा है, यहाँ पहुँचते ही ऐसा लगता है मानो समय ठहर गया हो। ऊँची चोटियाँ, बादलों से ढकी घाटियाँ और हरियाली की ऐसी चादर कि आँखें थक जाएँ पर दृश्य खत्म न हों। इसी एला से लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है वह स्थान, जिसका संबंध सीधे भारत के महान महाकाव्य 'रामायण' से जुड़ा है।
रावण जलप्रपात: जहाँ पत्थर भी गाते हैं इतिहास की गाथा जैसे ही हमारी बस घुमावदार रास्तों से होती हुई नीचे की ओर उतरी, कानों में एक मधुर गर्जना सुनाई देने लगी। यह 'रावण एला' या रावण जलप्रपात था। लगभग 25 मीटर (82 फीट) की ऊँचाई से गिरता यह झरना श्रीलंका के सबसे चौड़े प्रपातों में से एक है। इस झरने की बनावट बड़ी ही अनूठी है। यह एक विशाल अंडाकार अवतल (Concave) चट्टान के ऊपर से नीचे गिरता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि वर्षा ऋतु में जब यह अपने पूरे वेग में होता है, तो इसकी आकृति 'मुरझाई हुई पंखुड़ियों वाले सुपारी के फूल' के समान दिखाई देती है। चट्टानों के गहरे रंग और पानी के दूधिया सफेद रंग का विरोधाभास यहाँ के दृश्य को जीवंत बना देता है।
माता सीता का वनवास और वो रहस्यमयी गुफाएँ - इस यात्रा का सबसे भावुक कर देने वाला पक्ष इसका धार्मिक महत्व है। रामायण की कथाओं के अनुसार, जब लंकापति रावण ने माता सीता का अपहरण किया था, तब उन्हें कुछ समय के लिए इसी जलप्रपात के पीछे स्थित गुफाओं में छिपाकर रखा गया था। आज इन गुफाओं को 'रावण एला गुफा' कहा जाता है।।एक यात्री के तौर पर जब आप उस झरने की गिरती धार को देखते हैं, तो मन स्वतः ही उस कालखंड की कल्पना करने लगता है। लोकश्रुति है कि माता सीता ने इसी झरने के शीतल जल से बने प्राकृतिक कुंडों में स्नान किया था। उस समय यह पूरा क्षेत्र अभेद्य जंगलों से घिरा हुआ था। आज भी यह स्थान 'रावण एला वन्यजीव अभ्यारण्य' का हिस्सा है, जो इसकी प्राचीनता और प्राकृतिक शुद्धता को संरक्षित रखता है। श्रीलंका की मिट्टी में रामायण के जीवंत साक्ष्य - हमारी यात्रा केवल झरने तक सीमित नहीं थी, हमने उन साक्ष्यों को भी करीब से देखा जो रामायण को एक ऐतिहासिक सत्य के रूप में स्थापित करते हैं:।हनुमान जी के पदचिह्न: सीता एलिया (सीता अम्मन टेंपल ) के पास नदी के किनारे चट्टानों पर विशाल पैरों के निशान बने हुए हैं। स्थानीय लोगों का अटूट विश्वास है कि ये निशान पवनपुत्र हनुमान के हैं। अशोक वाटिका (हकगला): यहाँ की मिट्टी का रंग आज भी आसपास की भूमि से भिन्न है। माना जाता है कि लंका दहन की अग्नि से यहाँ की मिट्टी काली पड़ गई थी। दिव्यारुमपोला स्थान जहाँ माता सीता ने अग्नि परीक्षा दी थी। आज भी यहाँ लोग सत्य की शपथ लेने आते है दक्षिण तट पर स्थित 'रुमासाला' पहाड़ी पर हिमालयी वनस्पतियों का मिलना आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक सुखद आश्चर्य है। श्रीलंका में रावण को केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक प्रकांड विद्वान और शिव भक्त के रूप में देखा जाता है। हमारी यात्रा के दौरान हमने उन प्राचीन मंदिरों के महत्व को भी समझा जिनका सीधा संबंध रावण की भक्ति से है । कोनेश्वरम मंदिर (त्रिंकोमाली): इसे 'दक्षिण का कैलाश' कहा जाता है। रावण ने अपनी कठिन तपस्या से यहीं भगवान शिव को प्रसन्न किया था। यहाँ चट्टानों पर बने 'रावण वेत' (खाई) के निशान आज भी रावण की असीम शक्ति की याद दिलाते हैं।
मुन्नेश्वरम मंदिर: यहाँ भगवान राम ने रावण वध के बाद ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए शिव की आराधना की थी। शिव तांडव स्तोत्र: जब एला की वादियों में हवाएँ चलती हैं, तो ऐसा आभास होता है मानो रावण द्वारा रचित शिव तांडव स्तोत्र की गूँज आज भी यहाँ की पहाड़ियों में रची-बसी है। रावण जलप्रपात केवल देखने की वस्तु नहीं है, बल्कि यह अनुभव करने की जगह है। यहाँ पहुँचकर आप स्वयं को प्रकृति के बहुत करीब पाते हैं। यदि आप साहसी हैं, तो आप यहाँ की विशाल चट्टानों पर चढ़कर झरने के ऊपरी हिस्सों तक जा सकते हैं। पत्थरों पर जमी काई और उन पर गिरती पानी की बूंदें एक अद्भुत फिसलन पैदा करती हैं, जो रोमांच को दोगुना कर देती हैं। झरने के नीचे बने तालाबों में स्नान करना पर्यटकों का सबसे प्रिय काम है। हमने देखा कि विश्व भर से आए पर्यटक वहाँ के शीतल जल में अठखेलियाँ कर रहे थे। हालांकि, चट्टानें फिसलन भरी हैं, इसलिए सावधानी बरतना अनिवार्य है।
इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण आयाम पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी की सहभागिता रही। अकादमी के सदस्यों के साथ चर्चा करते हुए यह बात स्पष्ट हुई कि कैसे भाषा और संस्कृति भौगोलिक सीमाओं को लांघ जाती हैं। रावण जलप्रपात के किनारे बैठकर हिंदी के विद्वानों और साहित्य प्रेमियों के बीच रामायण के प्रसंगों पर चर्चा करना, भारत और श्रीलंका के बीच के सांस्कृतिक सेतु को और मजबूत कर रहा था। यह केवल एक पर्यटन नहीं, बल्कि एक 'सांस्कृतिक अन्वेषण' था। एला रेलवे स्टेशन से यह मात्र 6 किलोमीटर की दूरी पर है। टुक-टुक या टैक्सी आसानी से उपलब्ध है । सुबह 8 से 11 बजे का समय सबसे अच्छा है जब सूरज की रोशनी सीधे जलप्रपात पर पड़ती है । चट्टानें अत्यंत फिसलन भरी हैं, विशेषकर बारिश के बाद।: स्मृतियों की पोटली में एक अनमोल रत्न है।
जब हम शाम को एला की ओर वापस लौट रहे थे, तो रावण जलप्रपात की वह गर्जना बहुत देर तक हमारे कानों में गूंजती रही। वह केवल पानी के गिरने की आवाज नहीं थी, बल्कि वह उन हजारों वर्षों की गवाह थी जो इस धरती ने देखे हैं। रावण जलप्रपात की सुंदरता उसकी ऊँचाई में नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़ी उन भावनाओं में है जो हर भारतीय और श्रीलंकाई के मन में रची-बसी हैं। 10 जनवरी 2026 की यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि प्रकृति और इतिहास एक-दूसरे के पूरक हैं। पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी के इस परिभ्रमण ने हमें न केवल श्रीलंका की सुंदरता से रूबरू कराया, बल्कि हमें अपनी साझा जड़ों और प्राचीन गौरव से भी फिर से जोड़ दी है।


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