कुछ कदम साथ चलें
अरुण दिव्यांशक्यूॅं हिचकते चलने में ,
कुछ कदम साथ चलें ।
तेरा मेरा साथ चले तो ,
अरि भी देख हाथ मले ।।
आओ मिल एक हो लें ,
दिल दिल से मिला लें ।
बढ़ा लें अपनी ताकत ,
अरि धड़कन खिला दें ।।
दोस्त बना पड़ा दुश्मन ,
उसकी शक्ति हिला दें ।
दिखा रहा है जो हेकड़ी ,
उसे नानी याद दिला दें ।।
खेल रहा हमसे है चाल ,
व्यंग्य में खिलखिला दें ।
सर्प खदेड़े नेवले को ,
आओ इसकी सिला दें ।।
रावण बना त्रैलोक्य नृप ,
आओ हम रामलीला दें ।
एक करके हमभी खेल ,
रावण को तिलमिला दें ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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