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बिकती हुई दुनिया में बचा क्या है? - “जब इंसानियत बिकने लगे”

बिकती हुई दुनिया में बचा क्या है? - “जब इंसानियत बिकने लगे”

दिव्य रश्मि के उपसम्पादक जितेन्द्र कुमार सिन्हा की कलम से |

पैसा आज के समय में सबसे बड़ी ताकत, सबसे बड़ा तर्क और सबसे खतरनाक हथियार बन चुका है। देखा गया है , सुना गया है, महसूस किया गया है कि कैसे पैसे के सामने सब कुछ झुक जाता है। ईमान बिकता है, धर्म सौदे में बदल जाता है, फर्ज कागज का बोझ बन जाता है। लेकिन जब इंसानियत भी बाज़ार में उतर आए, जब करुणा भी मोल-भाव की वस्तु बन जाए, तब कहीं न कहीं से एक तूफान उठता है।


वह तूफान कभी सड़क पर उतर आता है, कभी अदालत की दहलीज पर, और कभी व्यवस्था के भीतर ही विस्फोट बनकर फूट पड़ता है। पटना पुलिस के साथ जो हुआ, वह किसी एक व्यक्ति, एक विभाग या एक संस्था की कहानी नहीं है, बल्कि समय की आत्मा का आईना है।


यह कहानी केवल एक मेधावी छात्रा की नहीं है। यह उस सपने की कहानी है, जो हर छोटे शहर, हर कस्बे और हर गांव के घर में पलता है “बेटी डॉक्टर बनेगी।” यह उस भरोसे की कहानी है, जो समाज पुलिस, डॉक्टर और प्रशासन पर करता है और यह उस विश्वासघात की दास्तान है, जिसमें तीनों ने मिलकर इंसानियत के गले पर हाथ रख दिया।


एक मेधावी छात्रा। सपनों से भरी आंखें। सिर पर माता-पिता की उम्मीदों का आकाश। हाथ में किताबें और मन में सफेद कोट पहनने की आकांक्षा। लेकिन जो हुआ, वह शायद उसकी किस्मत या नियति का हिस्सा हो सकता है। दुर्घटनाएं होती हैं। बीमारी आती है। जीवन हमेशा योजना के मुताबिक नहीं चलता। कभी-कभी सबसे प्रतिभाशाली जीवन भी अचानक बुझ जाता है। यदि कहानी यहीं तक सीमित रहती है तो यह केवल एक दुखद घटना होती है। लोग शोक मनाते हैं, परिवार टूट जाता है, समाज आह भरता है और समय धीरे-धीरे उस घाव पर परदा डाल देता है।


कहानी यहीं नहीं रुकी। उसके बाद जो हुआ, वह हादसा नहीं था। वह नियति नहीं थी। वह एक साजिश थी एक ऐसा खेल, जिसमें पुलिस, डॉक्टर और धनकुबेरों की तिकड़ी ने मिलकर सच को कुचलने का प्रयास किया। यहीं से यह कथा त्रासदी से अपराध की ओर बढ़ती है और अपराध से कुकृत्य की ओर।


पिछले दस दिनों से कुछ घट रहा था। हम क्या कर रहे थे? हम त्योहारों की तैयारी में उलझे थे। हम सोशल मीडिया पर व्यस्त थे। हम दही-चूड़ा, उत्सव और औपचारिकताओं में डूबे थे और उधर कहीं, एक परिवार हर रात जागता था। एक मां बार-बार अपनी बेटी की तस्वीर देखती थी। एक पिता सवालों से लड़ रहा था कि “मेरी बेटी के साथ आखिर हुआ क्या?” और व्यवस्था? वह चुप थी। या कहें कि खामोशी की आड़ में कुछ और ही खेल चल रहा था। सच को ढकने की कोशिश हो रही थी। कागजों को बदला जा रहा था। बयान मोड़े जा रहे थे। रिपोर्टें संदेहास्पद बन रही थीं। यह केवल लापरवाही नहीं थी। यह एक सुनियोजित प्रयास था, ताकि सच्चाई कभी बाहर न आ सके।


हर अपराध अपने पीछे एक निशान छोड़ जाता है। हर झूठ के भीतर एक दरार होती है और हर साजिश में कोई न कोई कमजोर कड़ी होती है। जब कल इस पूरे प्रकरण की परतें खुलने लगीं, जब सवालों ने जवाबों को घेरना शुरू किया, जब सबूतों ने बयान पर शक पैदा किया, तब जाकर उच्च हाकिमों का ईमान जागा। तब जाकर व्यवस्था ने करवट ली और फिर वही हुआ जिसकी नौबत ही नहीं आनी चाहिए थी। जिसे पहले ही दिन होना चाहिए था, वह दस दिन बाद हुआ। देर आई लेकिन जब आई, तो तूफान बनकर आई।


वह कोई “केस” नहीं थी। वह कोई “फाइल नंबर” नहीं थी। वह एक बेटी थी। उसके कमरे की दीवारों पर मेडिकल कॉलेजों के पोस्टर थे। उसकी मेज़ पर बायोलॉजी की मोटी किताबें पड़ी रहती थीं। रात देर तक जलती लाइट उसके जज्बे की गवाही देती थी। उसने तय किया था कि “मैं डॉक्टर बनूंगी।” क्यों? क्योंकि उसने गांव में इलाज के अभाव में लोगों को मरते देखा था। क्योंकि उसने मां की आंखों में वह डर देखा था, जब बीमारी आती है और अस्पताल दूर होता है। उसके सपने में सफेद कोट सिर्फ पेशा नहीं था बल्कि वह सेवा था। वह इंसानियत थी। लेकिन उसकी उड़ान अधूरी रह गई। शायद नियति ने वहीं रोक दिया। यदि कहानी यहीं खत्म हो जाती, तो हम इसे एक दुखद घटना मानकर आगे बढ़ जाते, लेकिन उसके बाद जो हुआ वह उसकी आत्मा की अशांति है। वह उसका अधूरा प्रश्न है कि “मेरे साथ जो हुआ, उसके बाद तुमने सच क्यों नहीं बोला?”


यह केवल एक लड़की की कहानी नहीं है। यह उस समाज की कहानी है, जहां अपराध से भी बड़ा अपराध, अपराध को छिपाना बन चुका है। अपराध होना विकृति है लेकिन स्वार्थ में अपराधी का साथ देना, सच को दबाना और पूरी दुनिया को गुमराह करना, यह सबसे बड़ा कुकृत्य है।


समाज तीन संस्थाओं पर सबसे अधिक भरोसा करती हैं। पहला पुलिस, जो सुरक्षा देती है। दूसरा डॉक्टर, जो जीवन बचाता है और तीसरा प्रशासन/तंत्र, जो न्याय सुनिश्चित करता है। जब कोई नागरिक संकट में होता है, तो वह इन्हीं तीनों की ओर देखता है। दुर्घटना हो, तो पुलिस। बीमारी हो, तो डॉक्टर और अन्याय हो, तो व्यवस्था। लेकिन जब यही तीनों एक साथ खड़े होकर सच को दबाने लगें, तब नागरिक अकेला पड़ जाता है और व्यवस्था राक्षस बन जाती है। इस प्रकरण में सबसे भयावह बात यही थी कि छात्रा के बाद जो खेल शुरू हुआ, वह किसी एक विभाग की गलती नहीं थी। वह एक गठजोड़ था, जहाँ हर कोई अपने हिस्से का लाभ देख रहा था।


पुलिस की डायरी में लिखा गया एक वाक्य किसी की जिन्दगी बदल सकता है। एक FIR किसी को न्याय के रास्ते पर ला सकता है या उसे हमेशा के लिए अंधेरे में धकेल सकता है। यहाँ वही कलम सच को काटने लगी। वही शब्द जो पीड़ा का बयान बनना था, वह संदेह में बदल दिया गया। प्रश्न उठता है कि क्या घटनास्थल की जाँच निष्पक्ष हुई? क्या बयान बिना दबाव के दर्ज हुए? क्या समय पर कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई? क्या हर “नहीं” के पीछे किसी “हाँ” का सौदा था? और यह सौदा किसी गरीब परिवार के भविष्य के साथ किया गया?


डॉक्टर को धरती पर भगवान कहा जाता है। उसकी रिपोर्ट पर अदालत भरोसा करती है। उसके शब्दों में विज्ञान होता है और उसके निर्णय में जीवन-मृत्यु का अंतर। लेकिन जब डॉक्टर ही सच से मुंह मोड़ ले, जब रिपोर्ट में हेरफेर होने लगे, जब समय और कारण को धुंधला किया जाने लगे, तो यह केवल पेशागत चूक नहीं रहती है। यह नैतिक अपराध बन जाता है। यह वही क्षण होता है, जब स्टेथोस्कोप हथियार बन जाता है और विज्ञान साजिश का औज़ार।


हर शहर में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनका नाम ही दरवाज़े खोल देता है। जिनका फोन ही फाइल की दिशा बदल देता है। जिनकी मौजूदगी ही कानून को भी असहज कर देती है। इस प्रकरण में भी एक ऐसा ही नाम परछाईं की तरह फैला रहा। पैसा यहाँ रिश्वत नहीं था बल्कि पैसा भय था। पैसा सुविधा था और पैसा सुरक्षा कवच था। जब पुलिस सोचने लगे कि “ऊपर से फोन आ जाएगा”, जब डॉक्टर डरने लगे कि “कहीं नौकरी न चली जाए”, तो सच अकेला पड़ जाता है। ऐसे गठजोड़ अचानक नहीं बनता है। वह एक संस्कृति का परिणाम होता है, जहाँ “मैनेज कर लेना” कानून से बड़ा मूल्य बन जाता है। यहाँ कोई खुद को अपराधी नहीं मानताहै बल्कि पुलिस सोचती है कि “ऊपर का आदेश है।” डॉक्टर कहता है कि “मैं क्या कर सकता हूँ?” और धनवान सोचता है कि “सब कुछ खरीदा जा सकता है।” इस बीच पीड़ित परिवार सिर्फ रोता है। यही वह बिंदु है जहाँ समाज टूटता है।


छात्रा के माता-पिता कोई आंदोलनकारी नहीं थे। वे कोई नेता नहीं थे। वे सिर्फ माँ-बाप थे, जो अपनी बेटी के लिए सच चाहते थे। वे दर-दर भटके, कभी थाने में, कभी अस्पताल में और कभी दफ्तरों के चक्कर लगाते हुए। हर जगह एक ही जवाब मिलता था कि “जांच चल रही है।” “सब ठीक है।” “आप क्यों परेशान हो रहे हैं?” लेकिन माता-पिता जानते थे कि कुछ ठीक नहीं है, और जब आम आदमी अपने भीतर का डर तोड़कर व्यवस्था से सवाल करता है, तब इतिहास बदलता है।


यह मामला इसलिए खतरनाक नहीं था कि एक बच्ची के साथ कुछ गलत हुआ। यह इसलिए खतरनाक था कि उसके बाद तीन स्तंभ, पुलिस, डॉक्टर और तंत्र, एक साथ सच के विरुद्ध खड़े हो गए। यही वह क्षण होता है, जब अपराध सिर्फ व्यक्तिगत नहीं रहता है बल्कि वह संस्थागत हो जाता है।


हर युग की अपनी व्यस्तताएँ होती हैं। कभी रोटी, कभी रोज़गार, कभी राजनीति, कभी उत्सव। हम सब अपने-अपने संसार में इतने उलझ जाते हैं कि पास में घटती त्रासदी भी सिर्फ एक “न्यूज़ आइटम” बनकर रह जाती है। इस प्रकरण में भी पहले दिन से ही कुछ पत्रकारों ने सवाल उठाए। कुछ स्थानीय आवाजों ने चिंता जताई लेकिन व्यापक समाज चुप रहा। हमने कहा कि “कोई और देख लेगा।” “सरकार है न।” “पुलिस है।” “कोर्ट है।” यही वाक्य हर अन्याय का सबसे बड़ा हथियार बन जाता है। जब तक पीड़ा हमारे घर के दरवाज़े पर दस्तक नहीं देती है तब तक हम उसे दूसरों की कहानी मानते रहते हैं।


मीडिया का काम सच को सामने लाना है लेकिन हर समय मीडिया भी अपने संघर्ष में होता है अपने टीआरपी, दबाव, विज्ञापन, संबंध में लीन। कुछ ने इस मामले को संवेदनशीलता से उठाया। कुछ ने सिर्फ सतही सुर्खियाँ बनाईं और कुछ ने इसे दबे स्वर में ही रहने दिया, लेकिन सच की एक विशेषता है कि वह बार-बार दरवाज़ा खटखटाता है। एक सवाल उठता है कि फिर दूसरा, फिर तीसरा और जब सवालों की संख्या जवाबों से अधिक हो जाती है, तब व्यवस्था को बोलना ही पड़ता है। हर साजिश एक समय तक ही चलती है। क्योंकि झूठ को लगातार याद रखना पड़ता है और सच खुद को याद दिलाता रहता है। इस मामले में भी कुछ छोटी-छोटी दरारें उभरने लगीं, समयरेखा मेल नहीं खा रही थी। रिपोर्टों में विरोधाभास था। बयान आपस में टकरा रहे थे और परिवार के प्रश्न अनुत्तरित थे। यही वह बिंदु था जहाँ साजिश अपने ही बोझ से डगमगाने लगी।


एक साधारण प्रश्न कभी-कभी पूरी इमारत को हिला देता है“अगर सब सामान्य था तो जाँच इतनी देर से क्यों?” “अगर दुर्घटना थी तो इतनी गोपनीयता क्यों?” “अगर कुछ छिपाया नहीं गया तो परिवार को टाल क्यों रहे हैं?” यह प्रश्न सिर्फ शब्द नहीं था बल्कि हथौड़ा था जो झूठ की दीवार पर लगातार पड़ रहा था। जब बात स्थानीय सीमाओं से बाहर निकलने लगी, जब सवाल ऊपर तक पहुँचने लगे, जब सोशल प्लेटफॉर्म गूंजने लगे, तब जाकर “ऊपर” में हलचल हुई। यही वह क्षण था जब व्यवस्था ने महसूस किया कि अब चुप रहना और महँगा पड़ेगा।


इस प्रकरण ने एक बार फिर आईना दिखाया है कि हम कितना जल्दी भूल जाते हैं। हम कितना आसानी से चुप हो जाते हैं, लेकिन इसने यह भी दिखाया कि सच की अपनी जिद होती है। वह देर से आता है पर आता ज़रूर है। कानून की भाषा में अपराध वह है, जिसे दंड संहिता परिभाषित करती है। हत्या, बलात्कार, धोखाधड़ी, लापरवाही, हर अपराध का एक दायरा, एक सजा तय है, लेकिन नैतिकता की भाषा में अपराध केवल कर्म नहीं होता वह इरादा होता है।


वह छात्रा डॉक्टर नहीं बन सकी। उसका सफेद कोट किसी अलमारी में टंगा रह गया। यदि सच पूरी तरह सामने आए, दोषियों को दंड मिले और समाज यह स्वीकार करे कि उसके साथ अन्याय हुआ है तो शायद उसकी आत्मा को कुछ शांति मिले। अपराध व्यक्ति करता है। कुकृत्य संस्था करती है और जब संस्थाएँ कुकृत्य करने लगें तो समाज असुरक्षित हो जाता है। यह प्रकरणसिखाता है कि चुप रहना तटस्थता नहीं रहती है, बल्कि सहभागिता बन जाता है। --------------
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