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अशोक वाटिका की पदयात्रा: साहित्य, श्रद्धा और स्मृतियों का संगम

अशोक वाटिका की पदयात्रा: साहित्य, श्रद्धा और स्मृतियों का संगम

सत्येन्द्र कुमार पाठक
समय का चक्र जब अपनी धुरी पर घूमता है, तो कई बार ऐसे संयोग बनाता है जो मनुष्य की कल्पना से परे होते हैं। जनवरी 2026 की शुरुआत मेरे लिए कुछ ऐसी ही रही। पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी, शिलांग द्वारा श्रीलंका में आयोजित 'विश्व हिंदी दिवस' (9 जनवरी - 12 जनवरी 2026) के त्रिदिवसीय सम्मेलन में भाग लेने का निमंत्रण महज एक बौद्धिक यात्रा का बुलावा नहीं था, बल्कि यह मेरे लिए त्रेतायुग के उन पन्नों को पलटने का अवसर था, जिन्हें हमने अब तक केवल रामचरितमानस की चौपाइयों में पढ़ा था। सम्मेलन के बीच से समय निकालकर, 10 जनवरी 2026 का दिन मैंने उस स्थान के लिए सुरक्षित किया, जिसका नाम सुनते ही हर भारतीय का मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है—नुवारा एलिया की अशोक वाटिका।
नुवारा एलिया का जादुई सफर में कोलंबो की हलचल से दूर, जब हमारी गाड़ी पहाड़ियों की घुमावदार सड़कों पर चढ़ने लगी, तो मौसम का मिजाज बदलने लगा। श्रीलंका का यह हिस्सा 'लिटिल इंग्लैंड' के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन मेरे लिए यह 'सीता एलिया' की खोज थी। ऊँचे चाय के बागान, कोहरे की चादर और ठंडी हवाओं के बीच सफर करते हुए हम उस पड़ाव पर पहुँचे, जहाँ सीता नदी का कल-कल नाद सुनाई देने लगा। सीता अम्मन मंदिर: जहाँ पत्थरों में भी भक्ति है । नुवारा एलिया से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित 'सीता अम्मन मंदिर' ही वह केंद्र है, जिसे प्राचीन अशोक वाटिका माना जाता है। यहाँ पहुँचते ही वातावरण में एक अजीब सी शांति और पवित्रता का अनुभव हुआ। मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली की है, लेकिन इसकी आत्मा रामायण कालीन है। मंदिर के ठीक बगल में बहती सीता नदी (जिसे सीता एलिया नदी भी कहा जाता है) के किनारे खड़े होकर जब मैंने उस जल को स्पर्श किया, तो लगा जैसे समय सदियों पीछे चला गया है। मान्यता है कि रावण द्वारा अपहृत होने के बाद माता सीता ने इसी नदी के जल से अपनी दैनिक क्रियाएँ की थीं और इसी के तट पर बैठकर प्रभु राम की प्रतीक्षा में अनगिनत आंसू बहाए थे। हनुमान जी के पदचिह्न: साक्षात प्रमाण की यात्रा का सबसे विस्मयकारी और रोमांचक हिस्सा था—बजरंगबली के विशाल पदचिह्नों का दर्शन। सीता नदी के चट्टानी किनारों पर कुछ ऐसे निशान मौजूद हैं, जो मानवीय आकार से कई गुना बड़े हैं। स्थानीय श्रद्धालुओं और ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, ये वही पदचिह्न हैं जो हनुमान जी ने लंका में उतरते समय छोड़े थे। इन विशाल निशानों को देखना एक ऐसा अनुभव था जिसे शब्दों में बांधना कठिन है। यह केवल पत्थर पर उकेरी गई आकृति नहीं थी, बल्कि यह उस अटूट विश्वास का प्रतीक था कि संकटमोचन ने इसी स्थान पर आकर माता जानकी को सांत्वना दी होगी और उन्हें प्रभु राम की मुद्रिका सौंपी होगी। उन निशानों को स्पर्श करते समय ऐसा लगा मानो इतिहास अपनी गवाही खुद दे रहा है। अशोक वाटिका और लंका दहन की राख का गाइड और स्थानीय निवासियों से बातचीत के दौरान एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया। वाटिका के आसपास की मिट्टी का रंग सामान्य भूरा न होकर गहरा काला है। लोक मान्यता है कि जब हनुमान जी ने अपनी पूंछ से स्वर्ण लंका को जलाया था, तो उस आग से जो राख बनी, उसने यहाँ की मिट्टी को हमेशा के लिए काला कर दिया। आधुनिक विज्ञान इसे भूगर्भीय परिवर्तन कह सकता है, लेकिन एक भक्त की दृष्टि में यह उस 'धर्मी' की विजय का प्रतीक है जिसने अन्याय के गढ़ को भस्म कर दिया था। त्रिजटा मंदिर और मानवीय संवेदना का मुख्य मंदिर के समीप ही त्रिजटा को समर्पित एक छोटा सा स्थान है। रामायण की कथा में त्रिजटा वह राक्षसी थी जिसने राक्षसों के बीच रहकर भी माता सीता की सुरक्षा की और उन्हें मानसिक संबल दिया। इस मंदिर की उपस्थिति यह दर्शाती है कि शत्रु के खेमे में भी यदि कोई धर्म का साथ देता है, तो इतिहास उसे कभी नहीं भूलता। यहाँ दर्शन करना मानवीय संवेदनाओं के प्रति सम्मान जैसा था।।साहित्यिक संगम और विश्व हिंदी दिवस की गूँज यात्रा का एक पहलू 'पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी' का वह सम्मेलन भी था, जिसने हमें यहाँ तक पहुँचाया। विश्व हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में जब श्रीलंका की धरती पर हिंदी के विद्वानों ने भाषा और संस्कृति पर चर्चा की, तो लगा कि राम और सीता की यह कथा केवल भारत की नहीं, बल्कि वैश्विक चेतना का हिस्सा है। हिंदी भाषा ने कैसे देशों की सीमाओं को तोड़कर हमें एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरो रखा है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण इस यात्रा में मिला।
अमर स्मृति 10 जनवरी की वह शाम जब मैं नुवारा एलिया से वापस लौट रहा था, तो मेरे पास केवल तस्वीरें नहीं थीं, बल्कि एक गहरा अनुभव था। मैंने देखा कि कैसे एक स्थान हजारों वर्षों के बाद भी अपनी पवित्रता को संजोए हुए है। सीता नदी की लहरें, हनुमान जी के वे पदचिह्न और अशोक वाटिका के वे वृक्ष—सब मिलकर एक ही गाथा गा रहे थे—धैर्य, भक्ति और धर्म की जीत की गाथा। यह यात्रा मेरे जीवन की सबसे महत्वपूर्ण यात्राओं में से एक रहेगी, जहाँ मैंने अपनी साहित्यिक यात्रा को अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जुड़ते हुए देखा।


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