अंग्रेजी नव वर्ष का अंधानुकरण छोड़ें, चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही हमारा सच्चा नव वर्ष : धर्म चंद्र पोद्दार
पटना। भारतीय जन महासभा के अध्यक्ष धर्म चंद्र पोद्दार ने अंग्रेजी नव वर्ष मनाने की बढ़ती होड़ पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह प्रवृत्ति हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो सकती है। उन्होंने कहा कि जिन अंग्रेजों ने लगभग 200 वर्षों तक भारत को गुलामी की बेड़ियों में जकड़े रखा, जिन्होंने हमारे समाज पर अमानवीय अत्याचार किए, उन्हीं की सांस्कृतिक परंपराओं का आज हम अंधानुकरण कर रहे हैं, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।
धर्म चंद्र पोद्दार ने कहा कि इतिहास साक्षी है कि अंग्रेजी शासनकाल में भारतवासियों पर असहनीय अत्याचार किए गए। लाखों बहन-बेटियों के साथ अमानवीय व्यवहार हुआ, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक अस्मिता को कुचलने का प्रयास किया गया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि वीर सावरकर की पुस्तक गोमांतक में गोवा के उन हृदयविदारक प्रसंगों का उल्लेख मिलता है, जहाँ धर्म परिवर्तन से इनकार करने पर हमारी बहन-बेटियों के साथ क्रूरता की सारी सीमाएँ लांघ दी गईं।
उन्होंने कहा कि देश की स्वतंत्रता यूँ ही नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे हजारों क्रांतिकारियों का रक्त और बलिदान छिपा है। लाला लाजपत राय, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, मदनलाल ढींगरा, चंद्रशेखर आजाद, भगवान बिरसा मुंडा और वीर सावरकर जैसे अनगिनत वीरों ने मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। हमें उनके बलिदान को कभी नहीं भूलना चाहिए।
धर्म चंद्र पोद्दार ने स्पष्ट कहा कि जिन शक्तियों ने हमारे देश और समाज को लहूलुहान किया, उनके द्वारा किए गए कुकृत्यों को भुलाकर उनके नव वर्ष को उत्सव की तरह मनाना आत्मगौरव के विरुद्ध है। उन्होंने कहा कि भारत की अपनी प्राचीन, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध कालगणना है, जिसे हमें पुनः अपनाना चाहिए।
इस अवसर पर उन्होंने दिव्य रश्मि के सम्पादक डॉ. राकेश दत्त मिश्र की एक चर्चित कविता का उल्लेख करते हुए कहा कि यह कविता भारतीय नव वर्ष की भावना को अत्यंत सटीक रूप से व्यक्त करती है—
“ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं,
है अपना ये त्योहार नहीं।
है अपनी तो ये रीत नहीं,
है अपना ये व्यवहार नहीं।
युक्ति-प्रमाण से स्वयं-सिद्ध,
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध।
आर्यों की कृति सदा-सदा,
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।”उन्होंने जोर देते हुए कहा कि भारतीय परंपरा के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ही हमारा वास्तविक नव वर्ष है और हमें उसी को पूरे श्रद्धा, आत्मगौरव और सांस्कृतिक चेतना के साथ मनाना चाहिए। यही हमारी पहचान है और यही भावी पीढ़ियों को संस्कारवान, आत्मनिर्भर और राष्ट्रभक्त बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगा।
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