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भारतीय नृत्य कला केंद्र, पटना में कार्यशाला प्रकरण: विद्वान हृदय नारायण झा की उपेक्षा, प्रक्रिया की अनदेखी और संस्कृति–युवा विभाग की चुप्पी पर सवाल

भारतीय नृत्य कला केंद्र, पटना में कार्यशाला प्रकरण: विद्वान हृदय नारायण झा की उपेक्षा, प्रक्रिया की अनदेखी और संस्कृति–युवा विभाग की चुप्पी पर सवाल

पटना।
बिहार की सांस्कृतिक पहचान और शास्त्रीय कला परंपरा को सहेजने वाला भारतीय नृत्य कला केंद्र, पटना इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है। केंद्र में प्रस्तावित 15 दिवसीय शास्त्रीय नृत्य कार्यशाला का आयोजन न होना केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि यह राज्य की सांस्कृतिक नीति, प्रक्रिया की पारदर्शिता और विद्वान कलाकारों के प्रति सरकारी उपेक्षा को उजागर करता है।

प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, भारतीय नृत्य कला केंद्र के प्रभारी पदाधिकारी द्वारा स्पष्ट निर्देश जारी कर 2 जून से 17 जून 2024 तक 15 दिवसीय शास्त्रीय नृत्य कार्यशाला आयोजित करने का निर्णय लिया गया था। इसके लिए तिथि, समय और रूपरेखा भी तय की गई थी। कार्यशाला का उद्देश्य बिहार के उभरते नृत्य कलाकारों को राष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण से जोड़ना था।

गर्मी का बहाना, फिर चुप्पी

9 जून 2024 को यह कहकर कार्यशाला स्थगित कर दी गई कि अत्यधिक गर्मी के कारण दोपहर 12 से 4 बजे तक विद्यार्थियों को बुलाना व्यावहारिक नहीं है। आश्चर्य की बात यह है कि इसके बाद न तो वैकल्पिक समय निर्धारित किया गया, न नई तिथि घोषित हुई और न ही कोई औपचारिक सूचना जारी की गई।

शिकायतकर्ता का कहना है कि यह कारण मात्र औपचारिकता निभाने के लिए दिया गया, जबकि वास्तविकता यह है कि प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में जानबूझकर उदासीनता बरती गई।
विद्वान हृदय नारायण झा की अनदेखी

इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बिहार की सांस्कृतिक चेतना के प्रमुख स्तंभ, विद्वान, कलाविद् और सांस्कृतिक चिंतक हृदय नारायण झा जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तित्व की भूमिका और योगदान को भी नजरअंदाज किया गया।

हृदय नारायण झा वर्षों से बिहार की शास्त्रीय कला, लोक परंपरा और सांस्कृतिक विमर्श को राष्ट्रीय स्तर तक ले जाने का कार्य करते रहे हैं। बावजूद इसके, न तो उन्हें परामर्श में शामिल किया गया और न ही उनकी संस्तुतियों को महत्व दिया गया। कला जगत का मानना है कि यह केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं, बल्कि बिहार की बौद्धिक और सांस्कृतिक परंपरा का अपमान है।

संस्कृति एवं युवा विभाग की भूमिका पर प्रश्न


यह पूरा मामला कला, संस्कृति एवं युवा विभाग, बिहार सरकार की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। विभाग का दायित्व है कि वह न केवल योजनाओं की स्वीकृति दे, बल्कि उनके क्रियान्वयन की निगरानी भी करे। लेकिन इस प्रकरण में विभाग की चुप्पी और निष्क्रियता साफ झलकती है।

जब कार्यशाला के लिए प्रस्ताव, स्वीकृति और संभावित धनराशि की प्रक्रिया पूरी की जा चुकी थी, तब कार्यक्रम का यूं अधर में लटक जाना यह दर्शाता है कि विभागीय समन्वय और जवाबदेही का घोर अभाव है।

प्रतिभाओं के भविष्य से खिलवाड़

कला प्रेमियों का कहना है कि इस प्रकार की लापरवाही से बिहार के प्रतिभाशाली युवा कलाकारों का मनोबल टूटता है। जिन विद्यार्थियों को राष्ट्रीय स्तर के गुरुओं से सीखने का अवसर मिलना था, वे आज भी प्रतीक्षा में हैं।
निष्पक्ष जांच की मांग

कला, संस्कृति और बौद्धिक समाज से जुड़े लोगों ने मांग की है कि—

इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच हो


यह स्पष्ट किया जाए कि कार्यशाला क्यों नहीं हुई


जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए


विद्वान हृदय नारायण झा जैसे मनीषियों को नीति निर्माण में सम्मानजनक भूमिका दी जाए

यह मामला केवल एक कार्यशाला का नहीं, बल्कि यह सवाल है कि क्या बिहार सरकार वास्तव में अपनी सांस्कृतिक विरासत और विद्वानों के सम्मान के प्रति संवेदनशील है या नहीं।

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