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चरक वचन हित कहें, रति हो सुमति-अनुकूल।

चरक वचन हित कहें, रति हो सुमति-अनुकूल।

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
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चरक वचन हित कहें, रति हो सुमति-अनुकूल।
काल, बल, ऋतु, भाव से, शुभ फल दे सुख-मूल॥
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अति रति तन थक जाइ, अल्प रति दुःख रात।
संयम सजग समीप हो, तब उपजे रंगात॥
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सात धातु पलवित हों, जब रति हो मर्याद।
रस–रक्त अरु मेद-मना, बढ़े ओज प्रसाद॥
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ओज बढ़े शीत-ऋतु में, वसंत दे अनुराग।
ग्रीष्म घटे बल, वर्षा में, संयम रखे सुहाग॥
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तन-मन मेल जहाँ मिले, रति वहाँ मंगल होय।
वासना ज्यों धूलि बने, प्रेम बने सुख-सोय॥
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रीति-रति चरक कहे, भाव न हो कुटिलात।
जबरै संग अरु स्वार्थ से, उपजे दोष विकात॥
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शुचि-सुगंध सुवेश से, मन उद्घाटे फूल।
रति बनि जाती साधना, जब धीरज हो मूल॥
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भोजन बाद न रति भली, चरक करै आह्वान।
हल्का, स्निग्ध, बलद ई, दे सुख का विधान॥
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ऋतुमती के दिवस में, वर्जित चरक उपदेश।
धातु-शोधन बाधि करै, दे रोगन संदेश॥
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एकनिष्ठ गृहधर्म में, ओज सदा अभिराम।
विकृत रति व्यभिचार से, क्षीणत हो अविराम॥
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रति पश्चात विश्राम दे, आलिंगन मधु बोल।
तन-मन पावे पूर्णता, कट जाय सब कोल॥
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चरक कहे समभाव ही, रति का असली तंत्र।
धर्म–स्वास्थ्य–प्रेम-पथ, दे जीवन को मंत्र॥
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जहाँ सम्मान सहमति, वहाँ रति रूप अनूप।
तन-मन-प्राण प्रतिपल खिले, ज्यों चंद्रिका के रूप॥
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प्रकृति-नियम पालन करे, जब नर-नारी संग।
तब रति बनत अष्टांग सम, मधुर, पावन, रंग॥
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प्रेम, धैर्य, मर्यादा मिल, रति दे अमृत-धार।चरक वचन साक्षी कहें—यहि जीवन आधार॥
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