हम हों धनवान, कोई तो राह दिखाओ,
सीमाएँ क्या होंगी, कोई तो बतलाओ?धन से कितनी संतुष्टि, ख़ुशियाँ मिलती,
धन सुखों का आधार, कोई तो समझाओ?
भौतिक सुविधाओं से किसने सुख पाया है,
बाहर सब चकाचौंध, अन्तर्मन ख़ाली पाया है।
तन्हाई में जब तन्हां, अपनों की यादें आती,
दौलत ने तन्हां ज़ख़्मों पर कब लेप लगाया है?
नहीं चाहिए हीरे मोती खाने में,
दो रोटी काफ़ी ज़िंदा रह जाने में।
स्वाभिमान से रहें सम्मानित जीवन,
है जीवन का सार स्वस्थ रह पाने में।
अ कीर्ति वर्द्धन
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