चाचा-भतीजे का गठबंधन
(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 16 दिसम्बर को एक नया अध्याय शुरू हुआ जब सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल यादव के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। यादव परिवार की वर्षों पुरानी कलह को खत्म कर चाचा-भतीजे में सुलह हो गयी है। आज से तीन साल पहले भी अखिलेश यादव ने कहा था कि चाचा शिवपाल यादव को 2022 में राज्यसभा भेजूंगा लेकिन तब इसे मजाक माना गया था। अब 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने छोटी-छोटी पार्टियों को जोड़कर सशक्त मोर्चा बनाया है। अखिलेश और शिवपाल के मिलने के बाद सैफई में जश्न मनाया गया। दरअसल, भाजपा के बढ़ते प्रभाव ने दोनों को यह सीख दे दी कि अलग-अलग रहकर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है। पहले सीटों को लेकर कहा जा रहा था कि शिवपाल यादव सौदेबाजी कर सकते हैं लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। दोनों में झगड़े की कई वजहें थीं जो समय के थपेड़े में अब निरर्थक हो गयी है। शिवपाल और अखिलेश का साथ दूसरी पार्टियों को भी गठबंधन के लिए मजबूर कर सकता है।
इटावा के सैफई में पांच साल के लंबे अंतराल के बाद सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव के पैतृक गांव सैफई में समाजवादी परिवार के एक होने का जश्न मनाया गया। लखनऊ में चाचा शिवपाल की भतीजे अखिलेश की मुलाकात और गठबंधन की सूचना आते ही सैफई में दीपावली जैसा उत्सव मनाया गया। अखिलेश और शिवपाल के मिलन के बाद उनके गृह नगर सैफई में जश्न का माहौल था। इस दौरान कार्यकर्ताओं ने जमकर आतिशबाजी की और लोगों ने एक दूसरे को मिठाइयां खिलाकर बधाई दी। ऐसा प्रतीत होता था कि अखिलेश और शिवपाल के मिलन के बाद एक बार फिर से सैफई के लोग दीपावली मना रहे हैं। हालांकि अभी आधिकारिक तौर पर इसका ऐलान नहीं किया गया है ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि एक सप्ताह के भीतर गठबंधन का ऐलान हो सकता है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 के लिए चाचा-भतीजे में सुलह की खबर के बाद अब यूपी की राजनीति गरमा चुकी है। अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव के साथ अपनी तस्वीर ट्वीट कर इस बात की जानकारी भी दी। जानकारी मिलने पर सपा व प्रसपा के कार्यकर्ताओं में खुशी की लहर दौड़ गई। अखिलेश यादव ने ट्विटर पर चाचा शिवपाल सिंह यादव के साथ तस्वीर पोस्ट करते हुए जानकारी दी कि प्रगतिशील सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जी से मुलाकात हुई और गठबंधन की बात तय हुई। क्षेत्रीय दलों को साथ लेने की नीति समाजवादी पार्टी को निरंतर मजबूत कर रही है और सपा व अन्य सहयोगियों को ऐतिहासिक जीत की ओर ले जा रही है। बता दें कि समाजवादी पार्टी में पड़ी फूट के बाद शिवपाल सिंह यादव ने प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का गठन कर लिया था। भरोसेमंद सूत्रों ने बताया कि अखिलेश यादव और शिवपाल सिंह यादव की 45 मिनट की मुलाकात में सीटों पर भी फैसला हो गया है। बताया जा रहा है कि समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव प्रगतिशील समाजवादी पार्टी को चुनाव में 5 से 7 सीटें देने को तैयार हैं। इस मुद्दे पर अखिलेश और शिवपाल के बीच बंद कमरे में लंबी बातचीत चली है। सूत्रों ने बताया कि अखिलेश ने यह भी संकेत दिया है कि शिवपाल सिंह यादव के लोगों को और एडजस्ट किया जाएगा। बताया जा रहा है कि शिवपाल सिंह यादव के खेमे के लोग सपा के सिंबल पर भी लड़ सकते हैं। इस 45 मिनट की मुलाकात में दोनों लोगों के हाव-भाव प्रसन्नता वाले थे। इस मौके पर अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल सिंह यादव के पैर छूकर आशीर्वाद भी लिया।
समाजवादी पार्टी में तत्कालीन मुख्यमंत्री और अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव के बीच का झगड़ा सपा के लिए मुसीबत बन गया और सोमवार को लखनऊ में पार्टी के घर की रार सभी ने देखी। कहने के लिए तो यह झगड़ा पिछले एक-दो महीने से ही सामने आया लेकिन दोनों के बीच मनमुटाव कई साल पुराना था। चाचा-भतीजे के बीच झगड़े का घटनाक्रम डिंपल यादव की राजनीति में एंट्री के समय ही शुरू हुआ। विधानसभा उपचुनाव में डिंपल यादव की हार के बाद अमर सिंह और शिवपाल यादव पर आरोप लगे। वहीं से चाचा-भतीजे का झगड़ा बढ़ने लगा था। फिरोजाबाद जैसी मजबूत सीट से डिंपल 2009 में उपचुनाव हार गई थीं। इसी सीट से जीतकर अखिलेश यादव सांसद बने थे। माना गया कि अखिलेश ने यह सीट छोड़ी तो जनता में नाराजगी दिखी और डिंपल को हार का सामना करना पड़ा। यूपी विधानसभा चुनाव 2012 में सपा को बहुमत हासिल हुआ तो मुलायम सिंह ने पुत्र को सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया। शिवपाल और कई अन्य बड़े नेताओं को पहले तो लगा कि प्रदेश की कमान भले ही अखिलेश को दी गई हो लेकिन असल सरकार नेताजी ही चलाएंगे। लेकिन धीरे-धीरे अखिलेश ने अपना प्रभाव बढ़ाते हुए अपने स्तर पर फैसले करने शुरू किए और पार्टी में भी अपना रुतबा बढ़ाना शुरू किया। यहीं से शिवपाल यादव और बाकी नेताओं की चिढ़ बढ़ने लगीं। अमर सिंह की सपा में वापसी पर भी अखिलेश यादव ने आपत्ति जताई लेकिन पिता से लेकर चाचा तक सभी को उनकी आपत्ति नागवार गुजरी। अखिलेश के चाहने के बावजूद भी अमर सिंह को ससम्मान सपा में वापस लाया गया।मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के विलय के सवाल पर भी अखिलेश ने सख्त रुख अख्तियार किया तो विलय रद्द किया गया। तब से चाचा शिवपाल खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे थे। दरअसल, यूपी की सत्ता में एक अहम केंद्र होने के बावजूद शिवपाल को शायद इस विलय के न होने से सार्वजनिक रूप से शर्मिंदगी झेलनी पड़ी होगी। अंसारी की पार्टी के विलय पर विवाद के बाद शिवपाल ने ही सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया। उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा देने की भी चेतावनी दी। शिवपाल के आरोपों के हफ्ते भर बाद अखिलेश यादव ने पहले अपने दो मंत्रियों और फिर अगले ही दिन मुख्य सचिव दीपक सिंघल को हटा दिया, जो शिवपाल के करीबी माने जाते थे। बस इसके बाद तो आग मानो पूरी तरह सुलग गई और यूपी की सियासत में इस आग का धुआं और गुब्बार फैल गया।
हालांकि 2018 में समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल सिंह यादव के साथ अन्तर्कलह से इंकार किया। उन्होंने कहा कि चाचा विधायक हैं, फिर उस सीट पर चुनाव हो ये ठीक नहीं, लेकिन मैं आप सबको यकीन दिलाता हूं कि 2022 में चाचा शिवपाल सिंह यादव को मैं राज्यसभा का टिकट दे दूंगा। उन्होंने कहा कि जब कुर्सी थी तो झगड़ा था, अब कुर्सी नहीं है तो झगड़ा भी नहीं है। उन्होंने कहा कि चाचा से कोई झगड़ा नहीं है। नेता जी ने मुझे जो आदेश दिया था वो मैंने पूरा किया। उन्होंने दावा किया है कि उनके परिवार में कोई झड़गा नहीं है। उनका परिवार नहीं टूटा है। अखिलेश यादव का यह बयान पार्टी और परिवार में चल रहे अन्तर्कलह को खत्म करने की दिशा में बढ़ाया गया कदम माना जा रहा था एक चैनल से बातचीत के दौरान सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने परिवार के अन्तर्कलह व टूटने पर किए सवाल पर कहा कि किसी का भी परिवार नहीं टूटना चाहिए। हमारा परिवार भी नहीं टूटा है। अखिलेश ने कहा कि कुर्सी थी तो झगड़ा था। अब कुर्सी नहीं तो कोई झगड़ा नहीं। शिवपाल को लेकर किए सवाल पर उन्होंने कहा कि कोई मनमुटाव नहीं है। हम होली पर मिले थे। मैंने उनके पैर छुए और उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया। उस समय अखिलेश यादव की बातें होली के रंग की तरह लगी थीं लेकिन 2019 की हार के बाद दोनों को हकीकत समझ में आ गयी है। (हिफी)
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