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सब चाहते हैं

सब चाहते हैं

      --:भारतका एक ब्राह्मण.
        संजय कुमार मिश्र"अणु"
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सूरज की ताप से,
सब चाहते हैं बचाव
गर्मियों में।।
वही लोग लेने लगते हैं
मजे खुलकर बेहद चाव
सर्दियों में।।
वो सूरज वही होता है
बदलता है तो सिर्फ मौसम
मन मर्जियों में।।
बदलती रहती है चाह
कभी आह तो कभी वाह
लिखी अर्जियों में।।
इधर मन बदलता है उधर मौसम।
जिससे खुशी है बस उसीसे गम।।
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वलिदाद,अरवल(बिहार)
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