पाकर हमसफर
--:भारतका एक ब्राह्मण.
संजय कुमार मिश्र"अणु"
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बडा बेखबर-
मैं चला जा रहा था डगर।
बिल्कुल अपनी मस्ती में-
न कुछ इच्छा न कोई डर।
मेरे संग और भी लोग-
चल रहे थे मिलाकर कदम।
अपनी मंजिल की ओर-
ठोककर अपना दमखम।
हम भी चल रहे थे-
आंखों में सपने पल रहे थे।
बडी मधुर कल्पना थी मन में-
और अंग-अंग मचल रहे थे।
वो पास आई और मुस्कुराई-
कुछ बात भी सुनाई देखकर।
अब और चला नहीं जाता-
अरे तुम जरा रुको तो इधर।
देखते हीं देखते वह-
ठहर सी गई पाने को उत्तर।
आंखों से कह रही रही थी-
मेरी बात सुन लो जरा ठहर।
मैनें पुछा...बात क्या है?
वह कुछ देखने लगी उपर।
फिर मुझसे वो बोली-
बनना चाहोगे मेरा हमसफर।
उसकी बातें सुन-
मेरा जी गया भर।
रुक गये पांव मेरे-
सफर में पाकर हमसफर।
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