उत्तराखण्ड में चतुष्कोणिक संघर्ष
(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
देवभूमि उत्तराखण्ड में एक तरफ शीत लहरी है तो दूसरी तरफ चुनावी पारा चढ़ा हुआ है। इस बार वहां चार दलों में चुनावी टक्कर मानी जा रही है। तीन प्रमुख दल वहां पहले से थे। कांग्रेस, भाजपा और उत्तराखण्ड क्रांति दल (उक्रांद)। इस बार आम आदमी पार्टी (आप) ने भी जोरदार एंट्री की है। सभी दलों का टारगेट सैनिक सम्मान की ढाल लेकर चल रहा है और सभी अपने को आस्तिक बता रहे हैं। कांग्रेस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने तो केदारनाथ की गुफाओं के विकास का श्रेय भी अपनी पार्टी को दिया है। भाजपा की कमान राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने संभाल रखी है। शहीद जनरल रावत के नगर से कांग्रेस ने शक्ति प्रदर्शन किया तो जेपी नड्डा श्री गढ़वाल से ही चुनावी शंखनाद 26 दिसम्बर को करेंगे। इस बीच उत्तराखण्ड क्रांति दल ने अपना चुनाव घोषणा पत्र भी जारी कर दिया है।
सत्तारूढ़ भाजपा के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी कहते हैं ‘भाजपा चैंकाने वाली पार्टी है। आप बस इंतजार कीजिए, हम परंपरा तोड़कर नया इतिहास रचेंगे और भाजपा फिर सत्ता में आएगी।’ उत्तराखंड में यूं तो मुकाबला हमेशा कांग्रेस और भाजपा के बीच रहा है, लेकिन इस बार अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी भी चुनाव मैदान में है। मार्च 2021 में त्रिवेंद्र रावत को कुर्सी से हटाकर तीरथ सिंह रावत को लाया गया। विवादास्पद बयानों और कुंभ कोविड टेस्टिंग घोटाले के सामने आने के बाद चार महीने से भी कम वक्त में तीरथ रावत की विदाई हुई और युवा पुष्कर धामी को बीजेपी मुख्यमंत्री के तौर पर लाई। इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस को फिर मौके का विश्वास दिया और पार्टी कमर कसकर तैयार हो गई। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने न केवल चुनाव अभियान की कमान संभाली बल्कि अपने खेमे के गणेश गोदियाल की कुर्सी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर सुरक्षित करवाई। कांग्रेस ने विपक्षी भाजपा के भीतर उठापटक में भी कामयाबी पाई और कैबिनेट मंत्री व प्रमुख दलित नेता यशपाल आर्य और उनके विधायक बेटे को भी अपने पाले में कर लिया। कुल मिलाकर मुकाबला बेहद दिलचस्प हो चुका है। कांग्रेस के लिए उम्मीद की किरण जरूर है। हालांकि यहां पार्टी ने मुख्यमंत्री के लिए कोई चेहरा प्रोजेक्ट नहीं किया है, लेकिन हरीश रावत को ही बड़ा दावेदार माना जा रहा है। रावत खुद ‘दलित सीएम’ का बयान देकर यशपाल आर्या को भी दावेदार की दौड़ में ला चुके हैं, तो अब दोनों के बीच सवाल तो खड़ा हो ही गया है। नेता प्रतिपक्ष प्रीतम सिंह भी हैं। आप का दावा भी कुछ खास है। दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का कहना है, ‘उत्तराखंड भाजपा और कांग्रेस से तंग आ चुका है। यहां पर 2002 से 2012 के बीच वोट शेयरिंग के आंकड़े देखे जाएं तो भाजपा और कांग्रेस के बीच अंतर मामूली रहा। 2017 में यह अंतर बढ़ा जब 70 में से 57 सीटें जीतने वाली भाजपा को 47 फीसदी वोट शेयर मिला और कांग्रेस को 33 फीसदी। माना जाता है कि बसपा, यूकेडी और दूसरी पार्टियों का वोट शेयर बीजेपी को चला गया लेकिन अब आप के होने से कम से कम 10 फीसद वोट तो छिन जाएंगे।
भाजपा के लिए 2017 जितना आसान तो यह रण नहीं है।’ बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा एक हफ्ते के अंतराल के बाद इसीलिए एक बार फिर उत्तराखंड आएंगे और संगठन का डिटेल एनालिसिस करेंगे। नड्डा 18 दिसंबर को उत्तराखंड दौरे पर थे। यहां नड्डा ने हरिद्वार में विजय संकल्प यात्रा की शुरुआत की थी। अब एक बार फिर 26 दिसंबर को नड्डा एक दिन के दौरे पर देहरादून आ रहे हैं। ये दौरा पूरी तरह से संगठन की गतिविधियों से जुड़ा होगा। आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा के टिकट वितरण की कवायद के लिए इस दिन नड्डा गढ़वाल मंडल की एक-एक विधानसभा सीट का एनालिसिस करेंगे। गढ़वाल मंडल में विधानसभा की 41 सीटें पड़ती हैं। पार्टी के प्रदेश महामंत्री कुलदीप कुमार के अनुसार जेपी नड्डा जिलाध्यक्ष, जिला प्रभारी, विधानसभा प्रभारी, विस्तारक और हाल में विधानसभाओं में दूसरे राज्यों से तैनात किए गए पार्टी वर्कर्स के साथ विधानसभावार अलग-अलग मीटिंग करेंगे। इसका मतलब यह है कि एक विधानसभा से कुल छह लोग एक समय में इस मीटिंग में शामिल होंगे। पार्टी के ये छह डेडिकेटेड पदाधिकारी वो लोग हैं, जो पिछले एक से तीन महीनों से चुनावी लिहाज से विधानसभाओं में मोर्चा संभाले हुए हैं। गढ़वाल मंडल के बाद ऐसी ही मीटिंग कुमाऊं मंडल में भी आयोजित करने का प्रोगाम है। मकसद साफ है कि इन मीटिंगों के जरिए नड्डा सीधे हर विधानसभा की ग्राउंड रिपोर्ट लेना चाहते हैं। ये रिपोर्ट टिकट वितरण से लेकर पार्टी की आगे की रणनीति भी तय करने वाली है। गढ़वाल मंडल के बाद ऐसी ही मीटिंग नड्डा कुमाऊं मंडल में भी करेंगे और वहां की 29 सीटों का एनालिसिस भी इसी तर्ज पर किया जाएगा।
उत्तराखंड क्रांति दल ने (उक्रांद) अपना घोषणा पत्र जारी कर दिया है। घोषणापत्र में गैरसैण को स्थाई राजधानी बनाने का वादा यूकेडी ने एक बार फिर जनता से किया है। वहीं उत्तराखंड 2022 में सत्ता में आते ही जनता को फ्री बिजली और पानी देने का वादा भी किया है। इसके अलावा स्वास्थ्य और शिक्षा को लेकर भी रोडमैप बनाया गया है।
हेल्थ और एजुकेशन के सेक्टर में जहां प्राइवेटाइजेशन के विरोध में यूकेडी हैं, वहीं राज्य के 30 फीसद स्टूडेंट्स को निशुल्क शिक्षा देने का भी वादा घोषणा पत्र में किया गया है। हालांकि यूकेडी अध्यक्ष कहते हैं कि नए वादे नहीं बल्कि पहाड़ की जनता के जो मुद्दे आजतक पूरे नहीं हुए उन्हें ही पूरा करने का काम यूकेडी करेगी। उत्तराखंड क्रांति दल के अध्यक्ष काशीसिंह ऐरी ने कहा कि पिछले पांच साल भाजपा सरकार ने मौज मस्ती में काट दिये। सरकार में अनुभवहीनता, दिशाहीनता और अहंकार भरा दम्भ दिखाई दिया। जहां प्रचंड बहुमत से सरकार को जनहित के काम करने थे, वहीं सरकार ने अहंकार से भरे होने के कारण जनता की भावनाओं और हितों पर कुठाराघात किया। जनता की मूलभूत आवश्यकतओं की घोर अनदेखी, अवहेलना की है। एक के बाद एक गलत निर्णय लिये गये और अब चुनावों में हार के डर से वे निर्णय वापस लिये जा रहे हैं।
काशीसिंह ऐरी कहते हैं कि बिना व्यापक विचार विमर्श व आम राय के जिला विकास प्राधिकरण, गैरसैण कमिश्नरी बनाना, भारी विरोध के बाद भी देबस्थानम बोर्ड बनाना और भूकानून बदलना ये सभी कार्य जन विरोधी तो थे ही साथ ही इसमें करोड़ों रुपये खर्च हुए। बहुमूल्य पांच वर्ष बर्बाद किए गए और अंत में सभी वापस लेने पड़े हैं। ऐरी ने कहा कि इस सरकार का सबसे घातक कार्य उत्तराखंड के भूकानून में बदलाव करना था, जिसने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया है। उत्तराखंड की वेश कीमती जमीनों को धनाढ्य लोगों के हाथ बेचने का कुचक्र इस भाजपा सरकार ने रचा है वह अभी भी बदस्तूर जारी है। जनता का भारी विरोध होने के बाबजूद बाहरी धनाढ्य लोगों को भूमि बेचने की खुली छूट जारी रखना उत्तराखंड के हितों पर कुठाराघात करना है।
इस प्रकार 2022 के विधानसभा चुनाव में उक्रांद भी मजबूती से डटा है। (हिफी)
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