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संविधान के प्रति दायित्व

संविधान के प्रति दायित्व

(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
हम सभी को यह बात मालूम है कि 26 नवम्बर 1949 को हमारी संविधान सभा ने संविधान को अंतिम रूप दिया था। इस संविधान को हमने 26 जनवरी को स्वयं पर लागू किया था। इसीलिए 26 नवम्बर को संविधान दिवस और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता है। संविधान हमें उसी तरह बांधे हुए है जैसे संस्कार, इसलिए संविधान दिवस पर हम सभी को विचार मंथन करना चाहिए कि हमने इसका कितना उल्लंघन किया है और कितना पालन किया है। इस वर्ष 72वें संविधान दिवस पर जब कांगे्रस समेत कई विपक्षी दलों ने संविधान दिवस कार्यक्रम का बहिष्कार किया तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि विपक्षी दल संविधान के प्रति अपने दायित्व को क्यों नहीं समझ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह सवाल सामयिक उठाया है लेकिन राजनीति की चाशनी भी लगी थी, जो उचित नहीं कहा जा सकता।
भारत के इतिहास में 26 नवंबर का दिन काफी महत्व रखता है। इस दिन ही संविधान सभा ने संविधान को अपनाया था। हर साल इस दिन को संविधान दिवस के तौर पर मनाया जाता है। साल 2015 में भारत सरकार ने 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में घोषित किया था। तभी से 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाया जाने लगा। भारत ने औपचारिक रूप से 26 नवंबर, 1949 को संविधान को अपनाया था। वहीं 26 जनवरी, 1950 में सविधान को देश में लागू किया गया था। हमारे देश के संविधान को बनाने में डॉ. भीमराव अंबेडकर का सबसे अहम रोल रहा है।कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस सहित देश की 14 विपक्षी पाटियों ने संसद में संविधान दिवस कार्यक्रम से दूरी बनाए रखी, अगले सप्ताह से प्रारंभ हो रहे संसद के शीतकालीन सत्र के लिए यूनाइटेड फ्रंट के रूप में एकजुटता दिखाने के लिए विपक्षी दलों ने यह कदम उठाया। केंद्र सरकार पर निशानासाधते हुए हुए कांग्रेस के मनिकेम टैगोर ने कहा कि यह सरकार, संविधान का सम्मान नहीं करती। कांग्रेस सांसद मल्लिकार्जन खडगे ने विपक्षी नेताओं से बात की थी। पार्टी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, सभी 14 विपक्षी पार्टियां संसद के शीत सत्र में एकजुट रहने पर सहमत हैं। संसद के सेंट्रल हाल में हुए कार्यक्रम में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, लोकसभा स्पीकर ओम बिरला और पीएम नरेंद्र मोदी ने शिरकत की। 14 विपक्षी पार्टियों की ओर से संविधान दिवस कार्यक्रम से दूरी बनाने के मामले में पीएम ने कांग्रेस पार्टी पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि परिवार के लिए पार्टी, परिवार के द्वारा पार्टी.... क्या मुझे और कुछ कहने की जरूरत है? यदि एक पार्टी कल पीढ़ियों से एक ही परिवार द्वारा चलाई जा रही है तो यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान की एक-एक धारा को भी चोट पहुंची है जब राजनीतिक दल अपने आप में अपना लोकतांत्रिक कैरेक्टर खो देते हैं।
पीएम ने कहा कि हमारा जो रास्ता है, वह सही है या नहीं है, इसका मूल्यांकन करने के लिए भी संविधान दिवस मनाना चाहिए। बाबा साहब अंबेडकर ने हमें और देश को जो तोहफा दिया है, यह उसे याद करने का दिन है। सदन को प्रणाम करने का दिन है। पीएम मोदी ने कहा कि हमारा संविधान सिर्फ अनेक धाराओं का संग्रह नहीं है, बल्कि यह सहस्त्रों वर्ष की महान परंपरा, अखंड धारा की आधुनिक अभिव्यक्ति है। पीएम ने कहा कि बाबासाहेब अंबेडकर की 125वीं जयंती थी, ऐसे में हम सबको लगा इससे बड़ा और पवित्र अवसर क्या हो सकता है कि बाबासाहेब ने इस देश को जो नजराना दिया है, उसको हम हमेशा एक स्मृति ग्रंथ के रूप में याद करते रहें। देश एक ऐसे संकट की ओर बढ़ रहा है, जो संविधान को समर्पित लोगों के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के प्रति आस्था रखने वालों के लिए चिंता का विषय है संविधान की एक-एक धारा को तब चोट पहुंची है, जब राजनीतिक दल अपने आप में अपना लोकतांत्रिक कैरेक्टर खो देते हैं। जो दल स्वयं लोकतांत्रिक कैरेक्टर खो चुके हों, वो लोकतंत्र की रक्षा कैसे कर सकते हैं? प्रधानमंत्री ने कहा कि महात्मा गांधी ने आजादी के आंदोलन में आधिकारों को लिए लड़ते हुए भी, कर्तव्यों के लिए तैयार करने की कोशिश की थी। अच्छा होता अगर देश के आजाद होने के बाद कर्तव्य पर बल दिया गया होता आजादी के अमृत महोत्सव में हमारे लिए आवश्यक है कि कर्तव्य के पथ पर आगे बढ़ें ताकि अधिकारों की रक्षा हो।
आजादी के बाद संविधान सभा ने एक समिति का गठन किया था और इस समिति को संविधान का मसौदा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इस समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर थे। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने साल 1948 में भारतीय संविधान का मसौदा पूरा किया था और इसे प्रस्तुत किया था। संविधान में कुछ संशोधन करने के बाद इसे 26 नवंबर, 1949 को अपनाया गया था। हमारे देश के संविधान को हाथों से लिखा गया था और इसे बनाने में 2 साल 11 महीने और 18 दिनों का समय लगा था। हमारे देश का संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। हमारे देश के संविधान को अमेरिका, जर्मनी, आयरलैंड, यूके, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान के संविधान की मदद से बनाया गया है।
संविधान भारत सरकार के लिखित सिद्धांतों और उदाहरणों का एक समूह है जो मूलभूत राजनीतिक सिद्धांतों, प्रक्रियाओं, अधिकारों, निर्देश सिद्धांतों, प्रतिबंधों और सरकार और देश के नागरिकों के कर्तव्यों को पूरा करता है। यह भारत को एक संप्रभु, धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करता है और अपने नागरिकों की समानता, स्वतंत्रता और न्याय का आश्वासन देता है। 26 नवंबर को भारत की संविधान सभा ने भारत के संविधान को अपनाया, जो 1950 से लागू हुआ। 19 नवंबर, 2015 को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने नागरिकों के बीच संविधान मूल्यों को बढ़ावा
देने के लिए भारत सरकार द्वारा हर साल 26 नवंबर को संविधान दिवस के रूप में मनाने के निर्णय को अधिसूचित किया।
संविधान हमारे देश की राजनीति को तौलने का अतुल्य मापदंड रहा है। 70 सालों बाद भी यह संविधान प्रासंगिक रहेगा, 1949 में इसकी कल्पना कोई अति-आशावादी ही शायद कर पाया होगा। आखिरकार, अमेरिकी प्रोफेसर गिन्सबर्ग, एल्किन्स और मेल्टन ने विश्वव्यापी संविधानों के सर्वेक्षण में पाया कि एक संविधान की औसतन उम्र केवल 19 साल होती है। उनकी रिसर्च ने यह भी पाया की उम्रदार संविधान संवैधानिक मूल्यों (जैसे कि लोकतंत्र और मौलिकाधिकार) की सुरक्षा नए संविधानों के मुकाबले बेहतर करते हैं। संविधानों के विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि संवैधानिक स्थिरता का सीधा सम्बन्ध सामाजिक स्थिरता से है- संवैधानिक क्रांति अक्सर राजनीतिक उथल-पुथल और व्यापक सामाजिक हिंसा प्रोत्साहित करती है। इस संदर्भ में भारतीय संविधान का बुजुर्गपन एक अपवाद है।
इसलिए विपक्षी दलों का संविधान पर सरकार के साथ चर्चा न करना विपक्ष पर भी सवाल उठाता है। (हिफी)

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