दुष्ट की है यही पहचान
~ डॉ रवि शंकर मिश्र "राकेश"
बातें करता
कभी नब्ज का
तो कभी कब्ज का
जिसे नब्ज, कब्ज का
ज्ञान नहीं।
कफ,पित्त,वात
पथ्य-कुपथ्य जो है
बीमारियों की उसूल
देता सलाह बिन मांगे
जो जानता नहीं
आयुर्वेद का मूल।
फिर भी,
बनता फिरता वैद्य महान।
दुष्ट की है यही पहचान।।
न कहीं शिक्षक
न कहीं व्याख्याता
देता फिरता व्याख्यान
कभी कर्म का
तो कभी धर्म का
जिसे धर्म, कर्म का
थोड़ा भी नहीं भान ।
श्रधा, समर्पण, संयम
धर्म की है परिभाषा मूल
व्यभिचार और कदाचार
में लिप्त वो क्यों जाता भूल।
एक जेब में धूप रखता
दूसरे में रखता लोहमान
कभी धर रूप संयासी का
बाबा बनता महान
कभी मुल्लाओं संग पढ़ता
मजलिश में कुरान।
स्वार्थ में बनता कभी बाबा
तो कभी भाईजान।
दुष्ट की है यही पहचान।।
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