कूद समर में

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सेवा , त्याग और समर्पण की भाव हो,
समाज में कुछ नया करने की चाव हो ।
मिटा दे कुल परंपरा की छाया काली,
कर्तव्य परायणता की मिशाल निराली l
सुर्यांश हो,अपरिमित बल के पोषक हो,
करदे धराशाई जो समाज का शोषक हो l
आप तो मग कुल के रत्न अनमोल हो ,
बल ,बुद्धि ,वैभव सभी से परिपूर्ण हो l
अब अपार संभावनायें दिख रही है,
सूर्य की भाँति संचित रश्मि कर प्रकट l
मिटा कर रख दे अभिशाप, सदियों का,
ध्यान रहे अभी परिस्थितियां हैं बिकट l
मानवता की पुजारी बहुत बने तुम,
समाजवाद की भावना हो न पाए गुम l
सदियों की लब्ध प्रतिष्ठा हो रही तार तार ,
रणभेरी बज गया है फैसला हो आर पार l
वो दिन अब दूर नहीं प्रतिष्ठा हो जाय गुम,
तुच्छ - जात के पीछे डोलाना पड़ेगा दुम l
हे रक्षक संसार के दिमाग के बंद ताले खोल,
कूद समर में मग - मंडल की जय जय बोल l
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