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कूद समर में

कूद समर में

      ~ डॉ रवि शंकर मिश्र 'राकेश'
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सेवा , त्याग और समर्पण की भाव हो,
समाज में कुछ नया करने की चाव हो ।
मिटा दे कुल परंपरा की छाया काली, 
कर्तव्य परायणता की मिशाल निराली l
सुर्यांश हो,अपरिमित बल के पोषक हो, 
करदे धराशाई जो समाज का शोषक हो l
आप तो मग कुल के रत्न अनमोल हो , 
बल ,बुद्धि ,वैभव सभी से परिपूर्ण हो l 
अब अपार  संभावनायें दिख रही है, 
सूर्य की भाँति संचित रश्मि कर प्रकट l 
मिटा कर रख दे अभिशाप, सदियों का, 
ध्यान रहे अभी परिस्थितियां हैं बिकट l
मानवता  की  पुजारी  बहुत बने तुम, 
समाजवाद की भावना हो न पाए गुम l
सदियों की लब्ध प्रतिष्ठा हो रही तार तार , 
रणभेरी बज गया है फैसला हो आर पार l
वो दिन अब दूर नहीं प्रतिष्ठा हो जाय गुम, 
तुच्छ - जात के पीछे डोलाना पड़ेगा दुम l
हे रक्षक संसार के दिमाग के बंद ताले खोल, 
कूद समर में मग - मंडल की जय जय बोल l
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