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पुरोवाच प्रजापतिः


पुरोवाच प्रजापतिः।
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नियतं कुरु कर्म त्वं
कर्मज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते
न प्रसिद्धयेदकर्मणः।।

शास्त्रोक्त कर्म ही प्रधान हैं।अकर्मण्य होकर बैठ रहने से श्रेष्ठ होता है कर्म में निरत रहना।
इससे दूसरों का भला तो होता ही है साथ साथ आत्म निर्वहन भी होता है और शारीरिक शुद्धि तो अवश्यमेव होती है।सिर्फ आत्मकल्याण या स्वकल्याण के निमित्त किये जाने वाले कर्म हमारे जन्म मृत्यु के बंधन का कारण बनते हैं इसीलिये शास्त्रविहित कर्म करने को प्रोत्साहित किया गया है।इसे यज्ञ की संज्ञा दी गई है।आत्मार्थ किये गये कर्म आसक्तियुक्त होते हैं और परार्थ किये गये कर्म आसक्ति रहित।अतः कर्म करते समय मानव मात्र को तीन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिये...
**अपने मैं तत्व को अपने से अलग रखना चाहिये।यह शरीर सहित मेरा कुछ भी नहीं का भावबोध होना चाहिये।
**मैं सिर्फ कर्म का अधिकारी हूँ।
**स्वार्थ मुझे कुछ भी नहीं चाहिये।
यदि इन भावों से सन्नद्ध होकर हम कर्मरत होते हैं तो उपरोक्त तीनों बातें क्रमवार हमारे भीतर प्रविष्ट होकर हमें परहित कर्म की ओर अवश्यमेव उन्मुख करेंगी।फिर नारायण की यह उद्घोषणा....
सहयज्ञाः प्रजाःसृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोस्त्विष्टकामधुक्।।
पूर्णतःसत्य होगी कि परहितार्थ निष्कामभाव युक्त कर्म अन्य के साथ ही आत्मकल्याण के कारक भी होते हैं।यदि इससे विमुख हम कोई भी कर्म करते हैं तो एक ओर जहाँ परहित बाधित होता है वहीं आत्महित सर्वनाश को प्राप्त होता है।इसका कारण स्पष्ट है "ईश्वर अंश जीव अविनाशी"।फिर हम अलग कहाँ।शायद इसीलिये वे देवता कहे जाते हैं।क्योंकि उन्होंने कभी लेना स्वीकार नहीं किया ।सदैव देने का ही भाव रखते हैं।हमें भी यह शरीर कल्याण प्राप्ति के निमित्त ही मिला है।अतेव स्वकल्याणार्थ किसी नवीन कृत्य को करने की अपेक्षा जो हमारे द्वारा किये जा रहे कृत्य हैं हम उन्हें ही फलेच्छा और आसक्ति रहित होकर परहितार्थ करते रहें ।अपना भी कल्याण सुनिश्चित है,क्योंकि हमारा यह कारण शरीर पांचभौतिक सृष्टि का एक क्षुद्रांश है।इसके तीन रूप स्थूल सूक्ष्म तथा कारण इस नाशवान जगत के लिये ही बने हैं।जिस शरीर को हम अपने काम का समझते हैं वस्तुतः वह हमारे किसी काम का नहीं।यदि इसका सदुपयोग हम परहितार्थाय करते हैं तो ही यह हमारे काम आता है।अतः"परहितसरिस धरम नहीं भाई ,परपीड़ा सम नहीं अधमाई"की उक्ति को सार्थक करते हुये हमें सदैव "परोपकाराय सतां विभूतयः"का पालन कर चौरदंड से बचने का प्रयास करना चाहिये।यही मानव जीवन की सार्थकता है।
.....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।
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