कैकेई सम मातु न कोई
पौराणिक कथाएं प्रागैतिहासिक काल की धरोहर मानी जाती हैं, जिनकी यथार्थता साहित्यिक शैली के कारण लुप्त सी हो गई हैं। पुराणों से हटकर प्रागैतिहासिक दृष्टि से विचार करने पर हम पाते हैं कि 'ससकाकेसस' पर्वत क्षेत्र में रहने वाले लोगों को काकसाइड प्रजाति का माना जाता है। प्राचीन काल में उस क्षेत्र को कैकेय देश के नाम से जाना जाता था। कैकेय के तत्कालीन राजा अश्वपति थे जिनका एक पुत्र युद्धजीत एवं एक ही पुत्री कैकेई थी। केकेई विश्व सुंदरी थी जिसकी सुंदरता पर मुग्ध होकर राजा दशरथ ने उससे परिणय का प्रस्ताव रखा। कैकेई के पिता द्वारा उसके पुत्र को ही सूर्यवंश का उत्तराधिकार मिलने की शर्त रखी गई तथा उसे स्वीकार कर लेने के पश्चात् महाराज दशरथ का उससे विवाह करा दिया गया।
अनिंद्य सुंदरी कैकेई में सरलता, कोमलता, बुद्धिमत्ता, पातिव्रत्य, युद्ध कौशलता, निर्भीकता,सहनशीलता, व्यवहार कुशलता इत्यादि विविध गुण भरे पड़े थे परंतु, सर्वप्रथम वह वीर पत्नी के रूप में दृष्टिगोचर होती है। देवासुर संग्राम में शत्रुओं द्वारा अपने पति को आहत देखकर स्वयं रथ-संचालन करके मायावी शम्भरासुर के माया प्रभाव को नष्ट कर अपने पति के प्राणों की रक्षा कर उसने पातिव्रत्य एवं युद्ध-कौशल का परिचय दिया था। द्विपद रामायण के अनुसार युद्ध में दशरथ के रथ का अक्ष टूट जाने पर उसने अपना हाथ उसके पहिए में लगाकर सहनशीलता एवं बुद्धि-कौशलता का अद्भुत नमूना पेश किया था। समयोचित कर्तव्य पर खुश होकर महाराज उसे मुंहमांगा वरदान देने को उत्सुक हो गये परंतु कैकेई ने उसे थाती रूप में स्वीकार कर लिया। विभिन्न कवियों द्वारा कैकेई का चरित्र-चित्रण भिन्न-भिन्न रूपों में किया गया है। रामायण काल से आज तक के काव्यों का अवलोकन करने पर तो ऐसा लगता है कि कैकेई का चरित्र स्वार्थपरक एवं ईर्ष्यालु था परंतु तत्वत: अवलोकन करने पर हम पाते हैं कि कैकेई का चरित्र उदात्त एवं श्लाघ्य है। वह एक साधारण स्त्री नहीं बल्कि एक महान राजनीतिज्ञा, लोक कल्याण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाली वीरांगना एवं वात्सल्यमयी माता भी थी।
राम-राज्याभिषेक की तैयारी की सूचना पाकर मंथरा तिलमिला उठती है। वह भड़काती हुई कैकेई से कहती है - " यह जानकर मैं दुख के समुद्र में डूबती जा रही हूं कि महाराज कल ही राम का राज्याभिषेक करने वाले हैं, कौशल्या राजमाता बनने वाली है, तुझ पर दु:ख का पहाड़ टूटने वाला है फिर भी तुझे अपनी इस विपत्ति का बोध नहीं होता। तुम्हारे पुत्र को तो उन्होंने तुम्हारे मायके भेज दिया है तथा अवध के निष्कंटक राज्य के लिए राम का वरण किया है।"
यह जानती हुई कि राज्य का वास्तविक अधिकारी भरत ही है क्योंकि उसके पिता द्वारा महाराज दशरथ से कैकेई पुत्र का ही राज्य का उत्तराधिकारी होने की शर्त करा ली गई थी, कैकई मंथरा द्वारा भड़काये जाने पर भी विचलित नहीं होती। वह इस सुखद समाचार को पाकर शरद पूर्णिमा की भांति उद्दीप्त हो उठती है। राम और भरत में भेद न करके अत्यंत खुशी व्यक्त करती हुई वह मंथरा से कोई श्रेष्ठ वर मांगने को कहती है-
"न मे परं किंचिदितो वरं पुनः,
प्रियं प्रियार्हे सुवचं वचोमृतम्।
तथा ह्यवोचस्त्वमत: प्रियोत्तरं,
वरं परं ते प्रददामि तं वृणु।।"
वा०रा०- २/८/३६
अर्थात् तू मुझसे प्रिय वस्तु पाने योग्य है। मेरे लिए श्रीराम के राज्याभिषेक से बढ़कर अमृत तुल्य कोई दूसरा समाचार नहीं हो सकता। तूने प्रिय वचन कहा है, अतः तुम मुझसे कोई श्रेष्ठ वर मांग ले, मैं तुझे अवश्य दूंगी।
उपर्युक्त बात से कैकेई के हृदय की विशालता, विनम्रता, राम के प्रति अगाध प्रेम एवं अटूट श्रद्धा की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है। 'को न कुसंगति पाई नसाई' के आधार पर देवताओं के कुचक्र में पड़कर वह अपने माथे पर कलंक का टीका तो ले लेती है, पर वास्तव में उसका चरित्र अत्यंत ही उद्दात एवं श्लाघ्य है। कैकेई किसी भी प्रकार श्रीराम के विमल यश में अपकीर्ति की काली छाया नहीं पड़ने देना चाहती थी। ऐसा आनंद रामायण के इस श्लोक से भी स्पष्ट हो जाता है -
"भू तनया तव पत्नी, तस्या: परिग्रहो मातु:।
असमंजसमिति मत्वा, कैकेई निवारयामास।।"
पृथ्वी तनया सीता आपकी पत्नी है, आप भूपति बनने जा रहे हैं। इसमें आपकी अपकीर्ति होगी। इसलिए ऐसा करने से कैकेई उन्हें मना कर देती है।
श्रीराम के वन गमन में कैकेई का रंचमात्र भी दोष नहीं था। वहां देवताओं का या यूं कहा जाए कि श्रीराम (विष्णु) की प्रेरणा ही प्रभावी थी तो ज्यादा उपयुक्त होगा। अध्यात्म रामायण के अनुसार राम ने ही कैकेई से कहा था-"मयैव प्रेरिता वाणी तव वक्त्राद् विनिर्गता।" अर्थात् मेरी प्रेरणा से ही वाणी आपके मुख से निकली थी। रामलिंगामृत के अनुसार देवेंद्र की प्रेरणा से ही कैकेई राम को वन भेजती है। विमल सूरी ने कहा है कि भरत का वैराग्य दूर करने के लिए राज्य की मांग की गई थी। बाल्मीकि रामायण में भारद्वाज ऋषि ने कहा है - "राम के बनवास से देवताओं, दानवों तथा भावितात्मा ॠषियों के हित ही होंगे। इसमें कैकेई का कोई दोष नहीं है।
कैकेई नियति के निर्मम चक्र में पड़कर ही ऐसा कुकृत्य करने में प्रवृत्त हुई तथा रामायण की अभागिन पात्रा के रूप में सदा उपेक्षिता बनी रही। मंथरा द्वारा भड़काये जाने पर भी अपने विशाल हृदय एवं राम के प्रति अटूट श्रद्धा का अवलोकन कराती हुई कैकेई ने उसे समझाते हुए कहा-
यदा वै भरतो मान्यस्तया भूयोऽपि राघव:।
कौशल्यातोतिरिक्तं च, मम शुश्रुयते बहु।।
राज्यं यदि हि रामस्य भरतस्यापि तत् तथा।
मन्यते हि यथात्मानं तथा भ्रातृंस्तु राघव:।।
राम भी मेरे लिए भरत के समान ही आदर के पात्र हैं, वे कौशल्या से अधिक मेरी सेवा करते हैं। राम के राज्याभिषेक को भरत का ही समझो क्योंकि राम अपने भाइयों को अपने समान ही समझते हैं। रामावतार का प्रयोजन जानने वाले महा बुद्धिमान महर्षि भारद्वाज ने कैकेई के दोष को खारिज करते हुए भरत से कहा है-
"न दोषेणावगन्तव्या कैकेयी भरतव्यया।
राम: प्रवाजनं ह्येतत् सुखोदर्कं भविष्यति।।
बा०रा०-२/९२/३०
भरत तुम कैकेई में दोषदृष्टि ना करो। श्री राम का यह बनवास भविष्य के लिए शुभकारी होगा।
महारानी कैकेई के वरदानों से महान लोक-मंगल कार्य की सृष्टि की गयी। उसके द्वारा उक्त समय पर दो वरदानों की मांग नहीं की जाती तो उसके दो महान उद्देश्य- 'भरत चरित्र का प्राकट्य तथा रावण आदि विविध राक्षसों का संहार नहीं हो पाता।' महाराज के मृत्युपरांत भी कैकेयी मर्माहत नहीं होती। वह सदैव मानती रही कि मैंने अपने ऊपर कलंक का बोझ लेकर भी महाराज के निर्मल यश का विस्तार ही किया है। इतिहास सदा महाराज दशरथ को एक ऐसे महापुरुष के रूप में याद करेगा जो सत्य के रक्षार्थ अपने जीवन को बलिदान करने में भी संकोच नहीं किया। उसे अटल विश्वास था कि यह यश उन्हें उसी की दृढ़ता से प्राप्त हुआ है।
एक प्रसंग ऐसा भी आया है कि उपर्युक्त कार्यों की सिद्धि हेतु स्वयं को वन-प्रेषण का प्रस्ताव लेकर श्रीराम माता कौशल्या तथा सुमित्रा के पास जाते हैं परंतु दोनों माताएं पुत्र-प्रेम तथा संभावित कलंक के डर से ऐसा करने से इन्कार कर देती हैं। राम जब अपने अवतार का कारण माता केकेई से बतलाते हैं तथा इस कार्य को करने का निवेदन करते हैं तो लोककल्याण के लिए वह इस दुरूह एवं जटिल कार्य करने को तैयार हो जाती है।
रामचरितमानस के इन चौपाइयों से स्पष्ट हो जाता है कि कैकेई अपने पुत्र भरत से अधिक श्रीराम से स्नेह करती है-
कौशल्या सम सब महतारी।
रामहि सहज सुभाय पियारी।।
मो पर करहि सनेह विशेषी।
मैं करि प्रीत परीक्षा देखी।।
जो विधि देई जनम कर छोहू।
होहुं राम सिय पूत पुतोहू।।
अंततः रामायण काल से आज तक के विभिन्न काव्यों पर तत्वत: विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि कपट नीतिज्ञा मंथरा या देवी-देवताओं की ओछी नीति के कारण कैकेई अपने स्वामी, पुत्र या परिजनों से तिरस्कृत तो होती है परंतु वास्तव में अपने कर्तव्य-परायणता, तेजस्विता, उदारता आदि गुणों से सबके मन को आकृष्ट कर लेती है। उसके उज्ज्वल चरित्र में चार चांद लगाते हुए मैथिली शरण गुप्तजी ने लिखा है -
"पागल सी प्रभु के साथ सभा चिल्लाई।
सौ बार धन्य वह एक लाल की माई।।"
सम्पर्क:-
प्राचार्य लॉर्ड कृष्णा मॉडल स्कूल सुंदरगंज, औरंगाबाद, बिहार
दिव्य रश्मि केवल समाचार पोर्टल ही नहीं समाज का दर्पण है |www.divyarashmi.com


0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews