
"जो निशा में ढूंढते हो,वह मिलेगा कल सवेरे"
व्यग्रता से उग्रता ने
कर दिया आघात सा
शीघ्रता से स्नेह औषधि
ने किया उपचार सा
क्यों तुम्हारी दृष्टि आहत
आज के हो तुम चितेरे
जो निशा में ढूंढते हो।
वह मिलेगा कल सवेरे।
आज जीवन ज्योति का ही
हो रहा उपहास है
क्रूरतम तम काल काला
कर रहा परिहास है
अब क्षितिज की चाह में
उड़ते पपीहों लो बसेरे
जो निशा में ढूंढते हो।
वह मिलेगा कल सवेरे।
तीव्रतम लय ताल की गति
सुर की माला में पिरोकर
आज फिर नटराज बनकर
नृत्य में उतरेंगे शंकर
फिर गगन में छा रहे हैं
घन घटा बादल घनेरे
जो निशा में ढूंढते हो।
वह मिलेगा कल सवेरे।
इष्ट का प्रतिबिम्ब बन कर
रूप का प्रतिरूप होना
चित्त के अंतस कलश में
शान्ति के दो बीज बोना
उर्वरक डालेंगे वो ही
जो हैं फसलों के लुटेरे
जो निशा में ढूंढते हो।
वह मिलेगा कल सवेरे।
प्रेम का प्याला लबालब
या निवाला विष का हो
शीत लहरी चल रही हो
या धधकती अग्नि हो
लक्ष्य सम्मुख दिख रहा है
अब पथिक न डाल डेरे
जो निशा में ढ़ूढ़ते हो।
वह मिलेगा कल सवेरे।
भाव की तृष्णा वितृष्णा
में समाहित हो गयी
स्मृति में प्रीति की
विद्युत प्रवाहित हो गयी
साँझ फिर लेने लगी है
रात के संग सात फेरे
जो निशा में ढूंढते हो।
वह मिलेगा कल सवेरे।
उल्लसित किलकारियाँ भरती
हुई बहकी दिशाएँ
रूपसी के केश सम
लहरा रही ठंडी हवाएँ
भोर की अनुपम छटा में
सौंप दे जो पास तेरे
जो निशा में ढ़ूढते हो।
वह मिलेगा कल सवेरे।
काल चिंतन देश चिंतन
और चिंतन विश्व का
आत्म चिंतन तत्व चिंतन
और चिंतन सृष्टि का
चित्त में चिंतन की चिंता
कर गयी घर आज मेरे
जो निशा में ढूंढते हो।
वह मिलेगा कल सवेरे।
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(रवि प्रताप सिंह,कोलकाता)दिव्य रश्मि केवल समाचार पोर्टल ही नहीं समाज का दर्पण है |www.divyarashmi.com

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