(हिन्दी ग़ज़ल)
चाहे जो रहा है
विश्वास खो रहा है।
इसलिए रो रहा है।१।
समझ नहीं आता
ये क्या हो रहा है।२।
कहकर फूल-
शूल बो रहा है।३।
लगाकर आग-
चैन खो रहा है।४।
दागदार दामन को,
दनादन धो रहा है।५।
मंशा जानने को-
हर दिल टो रहा है।६।
कर्म से मुंह मोड-
सिद्धांत ढो रहा है।७।
संभालो 'मिश्रअणु'
वह चाहे जो रहा है।८।
--:भारतका एक ब्राह्मण.
✒️©संजय कुमार मिश्र 'अणु'
वलिदाद अरवल (बिहार)
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