उष्ण में शीत
सुंदर दिखने वाला मोर,
हृदय रखता है कठोर।
सर्पों का करता भक्षण-
ये है सत्य वचन।।
होती कोयल बेहद काली,
मिठी वाणी आंखों में लाली।
शोभित करती है वन कानन-
ये हैं सत्य वचन।।
बहुत किमत्ती होता हीरा,
प्राण घातक पड़े गर गिरा।
फिर भी करते सब संरक्षण-
ये हैं सत्य वचन।।
ग्राह्य है सब कभी गुण से कभी स्वभाव से।
मानव मन शंकित है हमेशा दुर्भाव से।।
जिसका रूप अच्छा, वाणी मिठी है।
उसका स्वभाव समझ लो अंगीठी है।।
यहां लोग चाहते हैं विपरीत।
शीत में उष्ण और उष्ण में शीत।।
---:भारतका एक ब्राह्मण.
✒️©संजय कुमार मिश्र 'अणु'
वलिदाद अरवल (बिहार)
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