नेता जी।
न खरीददार न विक्रेता जी
निःस्वार्थ भाव से
आजीवन करते रहे
राष्ट्र की सेवा "नेता जी"।
राष्ट्रोन्नति ही धर्म रहा
नर सेवा नारायण सा
कर्म रहा
छल छद्म कपट स्वार्थ
का मर्म न जाना
नहीं लगे कभी अभिनेता जी
ऐसे थे प्यारे न्यारे सब
जनमानस के "नेता जी"।
सुभाष भाषते थे सु भाष
श्रवण को कर्ण लिये रहते थे आश
कितना भी सुन लो
मिटती नहीं थी प्यास
जिनकी वाणी में थी ओज
गीता के पन्नों में की आजादी की खोज
जन मन के थे दिलजेता जी
इसीलिये सब बोल पड़े थे
अमर रहेंगे "नेता जी"।।
....मनोज कुमार मिश्र "पद्मनाभ"।
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