धूप का सोंटा


खिली धूप है बहुत दिनों पर,
नाच रहा कलुआ का बेटा।
लड़ता जाता है जाड़े से,
लिए हाथ में धूप का सोंटा।
गाँती-वाँती फेंक बदन से,
चला खेलने लेकर डंडा।
आज विरोधी दल पर निश्चित,
गाड़ेगा वह जीत का झंडा।
ठिठुर रही थी जाड़े से जो
मुनिया,वह भी खेल रही है।
नहीं झेलना उसे पड़ेगा,
कबसे जिसको झेल रही है।
पीट रहा है इधर धान भी,
देखो कलुआ खुश हो होकर।
उधर प्रसन्न हो धनिया बोली,
'अब न रहेगा जाड़े का डर।'
भुवनभास्कर,कहाँ छिपे थे,
इस वसंत में भी तुम अबतक?
पता नहीं था इन दुखियों को,
रूठे रहोगे इनसे कबतक?
अब जाना तुम नहीं कहीं,
बस इनके दुख को हरते रहना।
बहुत दिनों तक सहा कष्ट है,
पड़े नहीं अब इनको सहना।
-मिथिलेश कुमार मिश्र 'दर्द'
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