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महर्षि अगस्त की शिक्षा नीति

महर्षि अगस्त की शिक्षा नीति

डॉ सच्चिदानान्द प्रेमी

भारतीय प्राचीन शिक्षा प्रणाली के एक महत्वपूर्ण वैदिक ऋषि हैं  महर्षि अगस्त्य।। इनका प्रादुर्भाव काशी के गोदौलिया मोहल्ले में आज के  3000 ईसा पूर्व श्रावण शुक्ल पंचमी को  हुआ था ।वह स्थान आज अगस्त कुण्ड के नाम से विख्यात है ।महर्षि अगस्त्य ऋषि पुलस्त्य के पुत्र और पराक्रमी रावण के पिता विश्रवा के भाई माने जाते हैं ।इनका विवाह विदर्भ देश की राजकुमारी लोपामुद्रा के साथ हुआ था जो अति ही विदुषी एवं वैदग्य थी ।देवताओं के अनुरोध पर इन्होंने काशी छोड़कर दक्षिण की यात्रा की। कहा जाता है कि यात्रा में बाधक बने समुद्र और विंध्याचल पर्वत को इन्होंने झुका दिया था ।विंध्याचल को अपनी ऊंचाई का गर्व था। अपनी श्रेणी को उसने इतना ऊंचा उठा दिया था कि सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर नहीं आ सकता था। देवताओं की प्रार्थना पर महर्षि अगस्त्य ने दक्षिण की यात्रा का कार्यक्रम बनाया। विंध्याचल द्वारा मार्ग-वाधा उत्पन्न करने पर इन्होंने विंध्य को झुका दिया था ।उसकी प्रार्थना पर उसे धैर्य यह कह कर दिया था कि जब वह लौटकर आएंगे तब वह पुनः खड़ा हो जाएगा। तब से विंध्य पर्वत उसी प्रकार झुका हुआ है और उनकी आगमन की प्रतीक्षा में रत है। वही विंध्य पर्वतमाला है ।दक्षिण कि यात्रा मे ही मार्ग में पड़ने वाले मणिमति नगरी के इल्वह तथा वातापी नामक दुष्ट दैत्यों की शक्ति को नष्ट कर दिया था ।इसी काल में राजा श्रुतर्वा,बृहदस्थ और त्रस्यदस्यु से मिलकर दैत्यराज इत्वल को झुका कर उनसे धन-संपत्ति मांग ली थी ,जिससे समाज के लिए शोध कार्य सम्पन्न कराया ।महर्षि अगस्त्य राजा दशरथ के राजगुरु थे ।
   महर्षि अगस्त्य ऋग्वेद के दृष्टा हैं ।इन्होंने ऋग्वेद के प्रथम मंडल के 165 वें सूत्र से 191 वें सूत्रों तक को प्रकाशित किया था ।भारत ने जिन्हें भुलाकर और नकली सभ्यता को अंगीकृत कर प्रगति की डींग हाँक रहा है वह हमारी संस्कृति पर कठोर आघात है।भारत की शिक्षा आर्षशोध पर आधारित है। भारत के ऋषि यों की शिक्षा का लोहा विदेशों में सदैव माना है और आज जो भी कुछ अनुसंधान या खोज हुआ है वह भारत की शिक्षा नीति की ही देन है ।महर्षि अगस्त्य को विदेशी देशों ने भी काफी माना है। कई देशों ने इंडोनेशिया आदि में महर्षि अगस्त की मूर्तियां मंदिर बनाकर स्थापित की गई हैं। इंडोनेशिया का प्रंबनन संग्रहालय जावा में 9वीं शताब्दी से उपलब्ध कुछ मूर्तियां आज भी दर्शनीय हैं ।अंग्रेजो के द्वारा लिखे गए इतिहास के अनुसार प्रायः लोग जानते हैं कि बिजली का आविष्कार माईको फ्रायड ने किया था, परंतु यह सत्य है कि बिजली की खोज महर्षि अगस्त्य ने की थी ।ऋषि अगस्त ने अगस्त्य संहिता नामक ग्रंथ की रचना की है। इस ग्रंथ की बहुत चर्चा होती है ।इसकी प्राचीनता पर कई शोध किए गए हैं और इसे अति प्राचीन माना गया है ।आश्चर्यजनक रूप से इस ग्रंथ में विद्युत उत्पादन से संबंधित सूत्र मिलते हैं।
॥ संस्थाप्य मृणम्ये पात्रे ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम् ॥ 
छादयोच्छिखिग्रीवेन चादामि  काष्ठापांसुभि॥
॥दस्तालोष्ठोनिदात्वय पारदाच्छादितस्तत।
संयोगज्जायते तेजो मित्रा वरुणसंज्ञितम्॥
संयोगज्जायते तेजो मित्रा वरुणसंज्ञितम्॥
अर्थात एक मिट्टी के पात्र में ताम्र पट्टिका (कॉपर सीट )डालकर और शिखि ग्रीवा (कॉपर सल्फेट) डालकर बीच में गीली कास्ठपांसु (वेट सा डस्ट) लगाया जाए और ऊपर पारा (मरकरी) तथा जस्ता (जिंक )डालकर फिर तारों को मिलाया जाए तो उससे मित्रा वरुण शक्ति (इलेक्ट्रिसिटी )का उदय होता है। अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रो प्लेटिंग के लिए करने का भी विवरण मिलता है ।उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली थी ।इसीलिए महर्षि अगस्त्य को कुंभोद्भव (बैटरी वाह )भी कहा जाता है।
पर सीट )डालकर और शिखि ग्रीवा (कॉपर सल्फेट) डालकर बीच में गीली कास्ठपांसु (वेट सा डस्ट) लगाया जाए और ऊपर पारा (मरकरी) तथा जस्ता (जिंक )डालकर फिर तारों को मिलाया जाए तो उससे मित्रा वरुण शक्ति (इलेक्ट्रिसिटी )का उदय होता है। अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रो प्लेटिंग के लिए करने का भी विवरण मिलता है ।उन्होंने बैटरी द्वारा तांबा या सोना या चांदी पर पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली थी ।इसीलिए महर्षि अगस्त्य को कुंभोद्भव (बैटरी वाह )भी कहा जाता है।
ऐसा भ्रामक प्रचार फैलाया गया कि बिजली बल्ब का अविष्कार थॉमस एडिसन ने किया था।परन्तु यह असत्य है।सत्य तो यह है कि बल्ब का अविष्कार एडिसन ने इनकी सहायता से किया था ।थॉमस एडिसन ने अपनी किताब में लिखा है -मैं एक दिन संस्कृत का एक श्लोक पढ़ते -पढ़ते सो गया।सपने में एक ॠषि ने मुझे बुलाकर उस श्लोक का अर्थ बिग्रह सहित समझाया।इसी से बल्ब बनाने की तरकीव की जानकारी मुझे मिली।
इस प्रकार सम्पूर्ण संसार में प्रकाश भारत के ॠषियों ने ही फैलाया।
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