त्याग
त्याग, समर्पण, अर्पण की भावना हमें विरासत में मिली है,
मर्यादा पुरुषोत्तम की कर्तव्य गाथा चौदह बरस वनवास से निकली है।
स्वदेशी अपनाने एक वस्त्र धारण किया राष्टपिता ने,
अमन की आंधी की हवा गांधी के चरखे से निकली है।
आजादी मुमकिन हुई आवाम में, आजाद के त्याग समर्पण से,
बदले में नौजवान भगत को मूंछ सम्हालते फांसी मिली है।
बर्चस्व बचाने झांसी की रानी कूंदी थी समर में,
कभी तलवार फिरंगियों पर तो कभी तलवार खुद पर चली है।
कोरोना संक्रमण के खात्मे का बिगुल रोज सुबह से बज उठता है,
कोरोना वारियर्स की टोली फिर जान हथेली पर ले निकली है।
मिग-21 को लेकर दुश्मन के घर घुस गया था एक नौजवान,
बैरी डरते-डरते कहते हैं, अभिनंदन की मूछें असली हैं।
त्याग, समर्पण, अर्पण की भावना हमें विरासत में मिली है,
मर्यादा पुरुषोत्तम की कर्तव्य गाथा चौदह बरस वनवास से निकली है।
राजेश लखेरा, जबलपुर, म.प्र.।
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