
कब होता है बिहार का महापर्व छठ , क्या है इसका नियम और कौन कर सकता है ? जाने छठ व्रत से जुडी जानकारियाँ |

हिन्दू धर्म का महापर्व छठ पूजा है. बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का सबसे प्रमुख त्योहार छठ पूजा होत है. इस बार छठ पूजा 20 नवंबर को पड़ रहा है. ऐसे में छठ पूजा का पर्व 18 नवंबर से शुरू हो जाएगा. क्योंकि यह त्योहार 4 दिनों का होता है. छठ पूजा को लेकर लोगों के बीच में अभी से चर्चा शुरू हो गई है. छठी माई की पूजा का महापर्व छठ दीपावली के 6 दिन बाद मनाया जाता है. छठ पूजा में सूर्य देवता की पूजा का विशेष महत्व होता है. मान्यता है कि छठ माता सूर्य देवता की बहन हैं. सूर्य देव की उपासना करने से छठ माई प्रसन्न होती हैं और मन की सभी मुरादें पूरी करती हैं. छठ की शुरुआत नहाय खाय से होती है और 4 दिन तक चलने वाले इस त्योहार का समापन उषा अर्घ्य के साथ होती है. आइए जानते हैं छठ पूजा से संबंधित पूरी जानकारी...
इस
वर्ष यह त्योहार 18 नवंबर से 21 नवंबर तक मनाया जाएगा. 18 नवंबर को नहाय खाय, 19 नवंबर को खरना, 20 नवंबर को संध्या अर्घ्य और 21 नवंबर को उषा अर्घ्य
के साथ इसका समापन होगा, इन 4 दिनों तक
सभी लोगों को कड़े नियमों का पालन करना होता है. इन 4 दिनों
में छठ पूजा से जुड़े कई प्रकार के व्यंजन, भोग और प्रसाद
बनाया जाता है.
छठ का त्यौहार सूर्योपासना का पर्व होता है. छठ
का त्यौहार सूर्य की आराधना का पर्व है, प्रात:काल में
सूर्य की पहली किरण और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण को अघ्र्य देकर दोनों का
नमन किया जाता है. सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है, सुख-स्मृद्धि तथा मनोकामनाओं की पूर्ति का यह त्यौहार सभी समान रूप से
मनाते हैं. प्राचीन धार्मिक संदर्भ में यदि इस पर दृष्टि डालें तो पाएंगे कि छठ
पूजा का आरंभ महाभारत काल के समय से देखा जा सकता है. छठ देवी सूर्य देव की बहन
हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की आराधना कि जाती है तथा
गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर के किनारे पानी में खड़े होकर यह पूजा
संपन्न कि जाती है.
छठ पूजा
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी से शुरू हो जाती है. इस व्रत को छठ पूजा, सूर्य षष्ठी पूजा और डाला छठ के नाम से भी जाना जाता है. इसकी शुरुआत
नहाय खाय से होती है, जो कि इस बार 18
नवंबर को है. इस दिन घर में जो भी छठ का व्रत करने का संकल्प लेता है वह, स्नान करके साफ और नए वस्त्र धारण करता है. फिर व्रती शाकाहारी भोजन
लेते हैं. आम तौर पर इस दिन कद्दू की सब्जी बनाई जाती है.
नहाय खाय
के अगले दिन खरना होता है. इस दिन से सभी लोग उपवास करना शुरू करते हैं. इस बार
खरना 19
नवंबर को है. इस दिन छठी माई के प्रसाद के लिए चावल, दूध के पकवान, ठेकुआ (घी, आटे
से बना प्रसाद) बनाया जाता है. साथ ही फल, सब्जियों से पूजा
की जाती है. इस दिन गुड़ की खीर भी बनाई जाती है.
हिंदू
धर्म में यह पहला ऐसा त्योहार है जिसमें डूबते सूर्य की पूजा की जाती है. छठ के
तीसरे दिन शाम यानी सांझ के अर्घ्य वाले दिन शाम के पूजन की तैयारियां की जाती
हैं. इस बार शाम का अर्घ्य 20 नवंबर को है. इस दिन नदी, तालाब में खड़े होकर ढलते
हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. फिर पूजा के बाद अगली सुबह की पूजा की
तैयारियां शुरू हो जाती हैं.
चौथे
दिन सुबह के अर्घ्य के साथ छठ का समापन हो जाता है. सप्तमी को सुबह सूर्योदय के
समय भी सूर्यास्त वाली उपासना की प्रक्रिया को दोहराया जाता है. विधिवत पूजा कर
प्रसाद बांटा जाता है और इस तरह छठ पूजा संपन्न होती है. यह तिथि इस बार 21 नवंबर को
है.
छठ
पूजा तिथि
छठ पूजा चार दिनों का अत्यंत कठिन और महत्वपूर्ण
महापर्व होता है. इसका आरंभ कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होता है और समाप्ति कार्तिक
शुक्ल सप्तमी को होती है इस लम्बे अंतराल में व्रतधारी पानी भी ग्रहण नहीं करता.
बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों में छठ पर्व पूर्ण श्रद्धा के साथ मनाया
जाता है. छठ त्यौहार के समय बाजारों में जमकर खरीदारी होती है लोग इसके लिए खासकर
फल,
गन्ना, डाली और सूप आदि जमकर खरीदते हैं.
छठ पूजा व्रत आरंभ
नहाय-खाय – 18
नवंबर
खरना । लोहंडा - 19 नवंबर
सांझा अर्घ्य- 20
नवंबर (संध्या अर्घ्य) सूर्यास्त का समय : 17:25:26
सूर्योदय अर्घ्य - 21
नवंबर (उषा अर्घ्य) सूर्योदय का समय : 06:48:52
छठ
पूजन
छठ पूजा का आरंभ कार्तिक शुक्ल चतुर्थी से होता
है तथा कार्तिक शुक्ल सप्तमी को इसका समापन्न होता है. प्रथम दिन कार्तिक शुक्ल
चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है नहाए-खाए के दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल
पंचमी को खरना किया जाता है. पंचमी को दिनभर खरना का व्रत रखने वाले व्रती शाम के
समय गुड़ से बनी खीर,
रोटी और फल का सेवन प्रसाद रूप में करते हैं.
व्रती 36 घंटे का निर्जला
व्रत करते हैं व्रत समाप्त होने के बाद ही व्रती अन्न और जल ग्रहण करते हैं. खरना
पूजन से ही घर में देवी षष्ठी का आगमन हो जाता है. इस प्रकार भगवान सूर्य के इस
पावन पर्व में शक्ति व ब्रह्मा दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है.
षष्ठी के दिन घर के समीप ही की सी नदी या जलाशय के किनारे पर एकत्रित होकर पर
अस्ताचलगामी और दूसरे दिन उदीयमान सूर्य को अर्ध्य समर्पित कर पर्व की समाप्ति
होती है.
छठ
पर्व महत्व
छठ पूजा का आयोजन बिहार व पूर्वी उत्तर प्रदेश
के अतिरिक्त देश के कोने-कोने में देखा जा सकता है. देश-विदेशों में रहने
वाले लोग भी इस पर्व को बहुत धूम धाम से मनाते हैं. मान्यता अनुसार सूर्य देव और
छठी मइया भाई-बहन है,
छठ व्रत नियम तथा निष्ठा से किया जाता है भक्ति-भाव से किए गए
इस व्रत द्वारा नि:संतान को संतान सुख प्राप्त होता है. इसे करने से धन-धान्य की
प्राप्ति होती है तथा जीवन सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहता है. छठ के दौरान लोग
सूर्य देव की पूजा करतें हैं , इसके लिए जल में खड़े होकर
कमर तक पानी में डूबे लोग, दीप प्रज्ज्वलित किए नाना प्रसाद
से पूरित सूप उगते और डूबते सूर्य को अर्ध्य देते हैं और छठी मैया के गीत गाए जाते
हैं.
छठ पर्व बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गु़ड़, चावल और
गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर
मिठास का प्रसार करता है।
छठ पूजा से जुडी पौराणिक और लोक कथाएं
छठ पूजा की परंपरा और उसके
महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएं प्रचलित हैं। पूजा का
सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से
परिपूर्ण इस पर्व के लिए न विशाल पंडालों और भव्य मंदिरों की जरूरत होती है न
ऐश्वर्ययुक्त मूर्तियों की।
एक पौराणिक लोककथा के अनुसार लंका विजय के
बाद राम राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता
ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान
कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की
शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा
शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े
होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्घा बना था। आज भी
छठ में अर्घ्य दान की यही पद्घति प्रचलित है।
कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का
उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए
नियमित सूर्य पूजा करती थीं।
एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी
पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र
हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में
प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि
सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती
हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा
से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा
कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी।
मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में
दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल
पक्ष षष्ठी पर मनाए जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर
मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्घि तथा
मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है।
इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं। छठ पूजा चार दिवसीय
उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी
को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36
घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।
षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ पूजा सूर्य
उपासना का अनुपम लोकपर्व है। यह मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी
उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है।
कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है। यह
दिन भगवान सूर्य को समर्पित है। बिहार और पूर्वांचल के निवासी इस दिन जहां भी होते
हैं सूर्य भगवान की पूजा करना और उन्हें अर्घ्य देना नहीं भूलते।
यही कारण
है कि आज यह पर्व बिहार और पूर्वांचल की सीमा से निकलकर देश विदेश में मनाया जाने
लगा है। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है।
इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है इसलिए इसे पर्व को
हठयोग भी माना जाता है। इस कठिन पर्व की शुरुआत कैसे हुई और किसने इस पर्व को शुरु
किया इस विषय में अलग-अलग मान्यताएं हैं।
भगवान राम
सूर्यवंशी थे और इनके कुल देवता सूर्य देव थे। इसलिए भगवान राम और सीता जब लंका से
रावण वध करके अयोध्या वापस लौटे तो अपने कुलदेवता का आशीर्वाद पाने के लिए
इन्होंने देवी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा और सरयू नदी में डूबते सूर्य को
फल,
मिष्टान एवं अन्य वस्तुओं से अर्घ्य प्रदान किया।
सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव
का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज संभालना शुरु किया। इसके बाद से आम जन
भी सूर्यषष्ठी का पर्व मनाने लगे।
महाभारत का
एक प्रमुख पात्र है कर्ण जिसे दुर्योधन ने अपना मित्र बनाकर अंग देश यानी आज का भागलपुर
का राजा बना दिया। भागलपुर बिहार में स्थित है।
अंग राज
कर्ण के विषय में कथा है कि, यह पाण्डवों की माता कुंती और
सूर्य देव की संतान है। कर्ण अपना आराध्य देव सूर्य देव को मानता था। यह नियम
पूर्वक कमर तक पानी में जाकर सूर्य देव की आराधना करता था और उस समय जरुरतमंदों को
दान भी देता था। माना जाता है कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी और सप्तमी के दिन कर्ण सूर्य
देव की विशेष पूजा किया करता था।
अपने राजा
की सूर्य भक्ति से प्रभावित होकर अंग देश के निवासी सूर्य देव की पूजा करने लगे।
धीरे-धीरे सूर्य पूजा का विस्तार पूरे बिहार और पूर्वांचल क्षेत्र तक हो गया।
सास बहू ने
की थी पहली सूर्य पूजा
छठ पर्व को
लेकर एक कथा यह भी है कि साधु की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए जब महाराज पांडु
अपनी पत्नी कुंती और मादरी के साथ वन में दिन गुजार रहे थे।
उन दिनों पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महारानी कुंती ने सरस्वती नदी
में सूर्य की पूजा की थी। इससे कुंती पुत्रवती हुई। इसलिए संतान प्राप्ति के लिए
छठ पर्व का बड़ा महत्व है। कहते हैं इस व्रत से संतान सुख प्राप्त होता है।
कुंती की पुत्रवधू और पांडवों की पत्नी द्रापदी ने उस समय सूर्य देव
की पूजा की थी जब पाण्डव अपना सारा राजपाट गंवाकर वन में भटक रहे थे।
उन दिनों द्रौपदी ने अपने पतियों के स्वास्थ्य और राजपाट पुनः पाने
के लिए सूर्य देव की पूजा की थी। माना जाता है कि छठ पर्व की परंपरा को शुरु करने
में इन सास बहू का भी बड़ा योगदान है।
कौन हैं
छठी मैया और किसने की इनकी पहली पूजा
पुराण की
कथा के अनुसार प्रथम मनु प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। प्रियव्रत ने कश्यप ऋषि
से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने पुत्रेष्ठि यज्ञ करने को कहा। इससे
उनकी पत्नी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन यह पुत्र मृत पैदा हुआ। मृत
शिशु को छाती से लगाकर प्रियव्रत और उनकी पत्नी विलाप करने लगी। तभी एक आश्चर्यजनक
घटना घटी।
एक ज्योतियुक्त विमान पृथ्वी की ओर आता दिखा। नजदीक आने पर सभी ने
देखा कि उस विमान में एक दिव्याकृति नारी बैठी है। देवी ने प्रियव्रत से कहा कि
मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री हूं। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वालों संतान प्रदान
करती हूं। देवी ने मृत बालक के शरीर का स्पर्श किया और बालक जीवित हो उठा।
महाराज प्रियव्रत ने अनेक प्रकार से देवी की स्तुति की। देवी ने कहा
कि आप ऐसी व्यवस्था करें कि पृथ्वी पर सदा हमारी पूजा हो। राजा ने अपने राज्य में
छठ व्रत की शुरुआत की। ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी छठ व्रत का उल्लेख किया गया है।
छठ पर्व की शुरुआत नहाय खाय के साथ हो चुकी है।
चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व का आज दूसरा दिन है। इस दिन व्रती चावल और गुड़ का
खीर बनाकर छठी मैया को प्रसाद अर्पित करते हैं।व्रती इसी प्रसाद को खाते हैं और
यही प्रसाद लोगों में बांटा भी जाता है। इस प्रसाद को खाने के बाद अगले दो दिनों
तक व्रती कुछ भी नहीं खाएंगे। इसलिए सूर्य षष्ठी व्रत को बड़ा ही कठिन और सभी
व्रतों में सबसे उत्तम माना गया है।
इस व्रत में चावल और गुड़ का खीर बनाने की परंपरा के पीछे धार्मिक
और वैज्ञानिक कारण दोनों ही शामिल है। धार्मिक कारण यह है कि शास्त्रों में बताया
गया है कि सूर्य की कृपा से ही फसल उत्पन्न होते हैं, इसलिए
सूर्य को सबसे पहले नए फसलों का प्रसाद अर्पण करना चाहिए।
छठ पर्व के समय चावल और गन्ना तैयार होकर घर आता है इसलिए गन्ने से
तैयार गुड़ और नए धान के चावल का प्रसाद सूर्य देव को भेंट किया जाता है।
गुड़ को चीनी से शुद्घ माना गया है। यही कारण है कि छठ पर्व में
चीनी की बजाय गुड़ की खीर बनाई जाती है।
जबकि वैज्ञानिक कारण यह है कि गुड़ की तासीर गर्म होती है और यह
सुपाच्य होता है। इसलिए गुड़ का उपयोग औषधि बनाने में भी किया जाता है। गुड़ के
सेवन से व्रती को अंदर से उर्जा और उष्मा प्राप्त होती है जिससे दो दिनों के व्रत
को पूरा करने का बल मिलता है।
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