कोरोना वायरस
आज पूरी दुनिया कोरोना वायरस की चपेट में आ चुकी है। चीन से लेकर अमेरिका, रूस, इटली, फ्रांस सब इस वायरस के सामने लाचार साबित हो रहे हैं। भारतीयों की जीवन पद्धति तथा सरकार द्वारा समय पर लिए गए कुछ निर्णयों के कारण यद्यपि भारत इस महा विनाशक बीमारी से कुछ कम प्रभावित हुआ है तथापि स्थिति भयंकर ही कहीं जाएगी। परंतु विचारणीय यह है की बीमारी के आरंभिक दौर में भारत में फरवरी-मार्च में जब सरकार द्वारा सुरक्षात्मक कदम उठाते हुए कुछ जगह धारा 144 लगाकर भीड़ के इकट्ठा होने पर रोक लगाई गयी तब दिल्ली के निजामुद्दीन क्षेत्र में तबलीगी जमात मरकज ने लॉकडाउन और धारा 144 का उल्लंघन कर भीड़ का जमावड़ा किया। और जमात के नेता मौलाना साद द्वारा सरकारी सुरक्षात्मक कदमों का विरोध कर भीड़ को भड़काया गया। वह भीड जिसमें दुनिया के उन देशों के प्रतिनिधि भी थे जहां कोरोना प्रमुखता से फैला था। परिणामत भारत में बड़े पैमाने पर कोरोना का फैलाव जमातियों द्वारा किया गया। यह भी विचारणीय बिंदु निकल कर आया है कि तबलीगी जमात का संबंध तालिबानी संगठनों तथा अलकायदा से भी है। यहां हमारा मकसद किसी धर्म पर चर्चा करना नहीं अपितु गैर जिम्मेदार लोगों पर ध्यान आकर्षित करना है। मूल प्रश्न यह है कि दुनिया भर में कुख्यात कोरोना है क्या? वैज्ञानिकों के अनुसार कोरोना कोई बिमारी नहीं अपितु एक वायरस समूह है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार ब्रिटिश बायरोलॉजीस्ट डा अल्मेडा ने 1964 मे इस वायरस की खोज की थी। इन वायरसों का प्रकोप/ संक्रमण नाक की श्लेष्मकला यानी झिल्ली से शुरू होकर गले से होते हुए फेफड़ों तक पहुंचकर गंभीर रूप धारण कर लेता है। इस रोग में नाक बहना, छींके आना, हल्का ज्वर, बदन दर्द आदि पीड़ायें होती हैं। सामान्यतः इसे फ्लू एनफ्लुएंजा या सर्दी जुकाम कहते हैं। संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या थूकने से दूसरे व्यक्तियों तक इसका फैलाव होता जाता है। संक्रमित व्यक्तियों द्वारा प्रयोग की गई वस्तुओं से भी इसका फैलाव पाया जाता है। डॉक्टर्स के अनुसार इसके वायरस तीन श्रेणियों ए बी वह सी में बांटे गए हैं। जिसमें ए टाईप वायरस पशु पक्षियों तथा बी व सी टाइप वायरस मनुष्य में होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना में ए टाइप के वायरस पाए गए हैं। जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने नोबेल कोरोना कोविड 19 नाम दिया है।
इस वायरस की शुरुआत चीन के वुहान से दिसंबर 2019 में हुई और मात्र दो-तीन माह में ही यह संपूर्ण विश्व में अपने पैर फैला चुका था। वर्तमान समय यानी अगस्त तक संपूर्ण विश्व में इस वायरस से लगभग ढाई करोड़ लोग प्रभावित हुए तथा मरने वालों की संख्या साढ़े आठ लाख के लगभग हो चुकी है। भारत के संदर्भ में यह बात की जाए तो प्रभावित लो 35 लाख तथा मरने वाले 62000 हो चुके हैं। डॉक्टर के अनुसार भारत में कोविद 19 से प्रभावित 70% लोग सर्दी जुकाम खांसी जैसे सामान्य लक्षण वाले पाए जा रहे हैं जो सामान्यतः आराम करने और पेरासिटामोल या बुखार की अन्य हल्की दवा लेने से ठीक हो जा रहे हैं। लगभग 20% लोगों को निमोनिया की शिकायत पाई जा रही है। 10% लोग इस वायरस के कारण गंभीर रूप से बीमार हैं।
आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों में इस बीमारी के लक्षण वह निदान का विस्तार से वर्णन मिलता है या यूं कहें यह कोई नया रोग नहीं है। आयुर्वेद में इसे जनपदोंध्वंस कहा गया है। इसके निदान के लिए आयुर्वेद में गृह ग्राम धूपन व उपासना चिकित्सा का उल्लेख है। गूगल, जटामांसी, भोजपत्र, कदम्ब फल, कमल पुष्प, नीम पत्ते, मधु, गुड और कपूर मिलाकर नित्य धूपन यानी धुंआ करने की चर्चा है। शरीर, घर, ग्राम की स्वच्छता पर विशेष जोर दिया गया है। आयुर्वेद में वात पित्त कफ के असंतुलित होने पर ही रोग के फैलने की संभावना को माना जाता है। कफ प्रकृति के लोगों में इसका प्रभाव होने की संभावना अधिक रहती है। आयुर्वेद मे इसकी अनेकों औषधियां है जिन्हें किसी योग्य चिकित्सक की सलाह से लेना चाहिए।
प्रश्न यह है कि क्या कोरोना के डर से जीना ही छोड़ दें, शायद नहीं--
कोरोना जाएगा यह तो तय है,
प्रकोप भी घटेगा यह तो तय है।
नियम संयम से जी कर तो देखो,
सदा स्वस्थ रहेंगे यह तो तय है।
भारतीय संस्कृति में नियम संयम का बड़ा महत्व है। साफ सफाई रखना, नमस्कार करना हमारी संस्कृति है। जैन धर्म में मुनियों द्वारा मुख पर पट्टीका बांधना भी संभवत प्राचीन काल में संक्रमण से बचने का उपाय ही रहा होगा। जिसे वर्तमान विज्ञान मुख पर मास्क लगाने को प्रचारित कर रहा है।
आयुर्वेद के शास्त्रों में कहा गया है कि उपचार से बेहतर बचाव होता है यानि अगर हम अभी से आयुर्वेद के निर्देशानुसार बचाव करें तो उपचार की जरूरत ही नहीं होगी। पानी में फिटकरी, नींबू का रस वह कपूर डालकर प्रयोग करना श्रेष्ठ सैनिटाइजर है। दवा के रूप में कुटकी, वासावलेह, सितोपलादि चूर्ण, कफकुठार जैसी औषधियां अति लाभदायक है। अमृतधारा यानी भीमसेनी कपूर, पिपरमेंट या सत पुदीना वह सतअजवाईन इन तीनों को समान मात्रा में कांच की शीशी में डाल दें। कुछ घंटों में यह अमृतधारा बन जाएगा। यह बहुत तीखा होता है।
बचाव हेतु घी तेल चिकनाई तथा ठंडे पदार्थों का सेवन न करें। हाथ मुंह को बचा कर रखें। तथा समय-समय पर फिटकरी नींबू पानी से हाथ धोते रहें। मुख नाक पर कपड़ा रखें तथा बात करते समय दूरी का पालन करें। जीवन शक्ति बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थ व औषधियों का सेवन करें। देर रात्रि भोजन से बचें, नही करें तो और भी बेहतर। आंवला, अमरूद, संतरा, नींबू, पपीता, अनानास का सेवन करें।
करुणा से एक और जहां जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया है तो वहीं दूसरी ओर अनेक लाभ भी हुए हैं। प्रकृति से प्रदूषण बहुत कम हो गया है। नदियों का जल शुद्ध हुआ, लुप्त हो चुके पशु पक्षी नजर आने लगे। और इन सब से भी अधिक लगभग 50 से 60 वर्ष पश्चात ऐसा वातावरण बना कि परिवार एक साथ बैठने लगे जो कि जीवन की भागदौड व्यस्तता के कारण छूट गया था। इस संकट काल में यह भी ज्ञात हुआ कि मनुष्य की वास्तविक आवश्यकतायें हैं क्या और कितनी हैं? पूनह् चर्चा करता हूं कि कोशिश 19 क्या है? वस्तुतः कोविड-19 इसके वायरस को नाम दिया गया है और कोरोना इस वायरस के कारण होने वाली बीमारी को। इससे पूर्व भी अनेक प्रकार के वायरस खोजे जा चुके हैं। प्रश्न यह है कि कैंसर एड्स जैसी लाइलाज रोगों के रहते इस कोरोना से डर कैसा? ऐसा लगता है कि कोरोना
से डर का कारण इसके बारे में फैलाए गए मिथक अधिक हैं। जिसके सम्मुख चिकित्सा में प्रथम माने जाने वाले फ्रांस और इटली से लेकर 37 वें पायदान पर रहने वाले अमेरिका तक बेबस नजर आए। एक बड़ी भ्रांति कि यह लाईलाज बीमारी है, ने विश्व को चिंतित कर दिया। प्रचार किया गया कि इस वायरस का कोई इलाज नहीं है। आयुर्वेद कहता है कि रोग से नहीं लड़ना है अपितु शरीर को स्वस्थ बनाना हैं, जिससे रोग आ ही न पाए। और यही पद्धति भारत में ठीक होने वालो की दर 78% तक ले जाती है।
आयुर्वेद में स्वस्थ रहने के लिए तीन आधार दिनचर्या, ऋतुचर्या और रोगचर्या पर ध्यान देने की बात की गई है। स्वस्थ दिनचर्या में समय से जागना और सोना सम्मलित है। दिन में सोना और रात में जागना अस्वास्थ्यकर बताया गया है। दिन और रात के आहार-विहार पर भी ध्यान देना आवश्यक है। आयुर्वेद के अनुसार रात्रि में दही का प्रयोग वर्जित है। भोजन के बाद आइसक्रीम भी अखाद्य मानी जाती है। ऋतु संधि काल में भोजन का विशेष ध्यान रखना जरूरी है जैसे सर्दी में तरबूज, खरबूजा नहीं खाना चाहिए। गर्मियों में गरिष्ठ भोजन से बचना चाहिए। रोगचर्या के अंतर्गत अगर ध्यान दिया जाए तो अधिकतर मामलों में अस्पताल जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। उदाहरण के लिए हल्का बुखार जुखाम होने पर थोड़ा आराम व हल्का सुपाच्य भोजन लेना चाहिए। पनीर, गैर मौसमी सब्जियां, फल अपथ्य माने जाते हैं इनके सेवन से बचें। यानी मौसमी फल सब्जियों का ही प्रयोग करें। आचार्य चरक ने कहा था आप का जन्म जिस देश जलवायु में हुआ उसी जलवायु में पैदा फल सब्जी आपके लिए उचित हैं। दक्षिण भारत के फल सब्जी उत्तर भारत के लिए उचित नहीं है तो विदेशी धरती के फल आपके लिए कैसे लाभप्रद हो सकते हैं?
चर अचर इस जगत मे
जीवन क्या और मृत्यु क्या है
गीता मे वृणित किया है
वस्त्र मैले हो गये जो
आज नव धारण किया है|
क्यों डरूँ किससे डरूँ
सब काल के आधीन हैं
कर्म करना धर्म अपना
फल की इच्छा हीन है|
बस यही तो सार कान्हा
कुरूक्षेत्र मे समझा रहे
बुद्धि को भी कर्म के संग
लेकर चलना बतला गये|
हे कोरोना हम भारतीय
डरते नही हूँ मौत से
संस्कारों मे जिया है
कैसे बचें प्रकोप से|
विनम्र हो प्रणाम करना
यह हमारी संस्कृति है
यज्ञ हवन की अवधारणा
यह हमारी प्रवृति है
कोई अगर बिमार हो
अथवा गन्दगी धारण करे
दूर उससे बचकर चलना
यह हमारी सन्मति है|
हो कहीं पर मृत्यु अगर
या नव शिशु का आगमन
हम लगाते सूतक वहाँ
इतना हमको ज्ञान है|
जानते हैं कीटाणुओं से
मुक्त कैसे हम रहें
शमसान मे हम नीम चाबें
फिर स्नान कर वस्त्र बदलें|
हाथ धोना मुख प्रक्षालन
बचाव की अवधारणा है|
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
53 महालक्ष्मी एन्क्लेव
मुजफ्फरनगर 251001 उत्तर प्रदेश
8265821800
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