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हिंदी हैं हम वतन है

हिंदी हैं हम वतन है

डॉ सच्चिदानंद प्रेमी
 प्राचीन काल में संस्कृत एक ऐसी भाषा की जो भारत की एकता का ख्याल रखती थी। यानी भारत की एकता की दृष्टि से संस्कृत सर्वमान्य था, परंतु पढ़े लिखे लोगों तक सीमित रह जाने के कारण यह सर्वमान्य की भाषा नहीं बन सकी। जबकि, मूल आर्यभाषा में वेद  जैसा साहित्य प्रकट हो गया था। फिर भी जन आकांक्षा से उत्पन्न लौकिक संस्कृत जन सामान्य की भाषा, सामान्य बोलचाल की भाषा बनी ।कहा जाता है कि राजा भोज के काल में राज्य कार्य के अतिरिक्त सभी प्रजा संस्कृत में ही बात करते थे। यहां तक कि जुलाहे और लकड़हारे भी संस्कृत बोलते थे। शंकराचार्य, रामानुजाचार्य की रचना संपूर्ण भारत को जोड़ते हुए भी संस्कृत में ही हुई है। लेकिन वंचितों को ध्यान में रखकर आगे के संतों ने संस्कृत को परिमार्जित  कर प्राकृत भाषा प्रकट की। यानी मूल आर्य भाषा  जन व्यवहार की भाषा बनी।  प्राकृत को आगे चलकर पाली -पालि -प्राकृत भाषाओं में ग्रंथ लिखे गए ।।उसी समय पाली या पालि, प्राकृत को दूसरी रुप भाषा हो गई ।यह भी  संपूर्ण राष्ट्र की भाषा नहीं हो सकी।  पाली यानी पल्ली यानी गांव की भाषा ।पाली यानी पल्ली, गांव की भाषा भी गांव की भाषा नहीं हो सकी ।इसमें क्षेत्रीयता का प्रभाव रहा और क्षेत्रानुसार भाषाएं चुन ली गई या विकसित कर ली गई ।
        संस्कृत में यह शक्ति थी जो वह संपूर्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बांधकर रख सकता था, परंतु गांव गांव की भाषा बन जाने से भाषा के नाम पर क्षेत्रवाद का भी श्रीगणेश हो गया, जिसमें अंग्रेजों की कूटनीति ने उर्वरक का काम किया।  स्वतंत्र भारत की  एक अहम समस्या हो गई यह राष्ट्रभाषा  की। गांधीजी ने स्वतंत्र भारत को अंग्रेजी से मुक्त कराने की योजना बनाई थी ।वह अपने राष्ट्र की भावना एवं अंग्रेजों की कूटनीति से पूर्णतः परिचित थे । मैकाले की संस्कृति -संघार नीति के कारण हमारी संस्कृति भाषा, भाषण, भूषण, भोजन,भेषज  सभी प्रभावित हुए। अंग्रेजी की गुलामी ने हमें पूर्णतः और जीवन पर्यंत गुलाम बना दिया ।अंग्रेजों ने इस संघार कारक हथियार से हमारा  पुरुषार्थ भी समाप्त कर दिया । हम अपनी संवेदना अंग्रेजी भाषा में व्यक्त करने से वंचित हो गए  ।यथा, एक शब्द है आत्मरक्षा। इसकी सीधी अंग्रेजी होगी सेल्फ डिफेंस ।सेल्फ डिफेंस, पर यहां यही तो भाषा का अंतर है ।आत्मरक्षा की अंग्रेजी सेल्फ डिफेंस कभी हो ही नहीं सकती ।आत्म, आत्मा शरीर नहीं और सेल्फ डिफेंस यानी शरीर की रक्षा ।आत्मा की भाषा सर्वत्र समान होती है । सर्वत्र समान होती है । पक्षी की  भाषा ,पक्षी की भाषा  आत्म भाषा है। जिस प्रकार उनका चहचहाना  बिहार में  होता है उसी प्रकार वे महाराष्ट में भी चहचहाते हैं। वे जिस तरह गुजरात में बोलते हैं उसी तरह चेन्नई में एवं हिमालय में भी बोलते हैं ।सभी पक्षियों की, जंतुओं की भाषा सर्वत्र एक समान होती है ।यही तो आत्म भाषा है ।जो आत्म भाव उपनिषद् में है वही ईसप  की कहानियों में भी है। यानी आत्मा की भाषा के प्रचार में राष्ट्रभाषा का प्रचार पहला कदम है, यह तो सर्वमान्य है कि देश के लिए अपनी एक भाषा हो ,वह राष्ट्रभाषा संज्ञा से परिचित हो ,पर यह भाषा कौन सी हो? पूर्व में तो भारत की राष्ट्रभाषा संस्कृत हुआ करता था ।संस्कृत की अपनी मर्यादा है। वह सभी के लिए आदरणीय हैं ।संस्कृत की महिमा हिंदुस्तान में दूसरी भाषा को उपलब्ध नहीं है। परंतु संपूर्ण भारत को मान्य हों यह आवश्यक नहीं। इसीलिए विनोबा जी ने कहा था ,भारत को  संस्कृत भाषा जो संस्कार पूर्ण हो  एवं सबके लिए सुलभ हो और इस पर विचार करने पर यह हिंदी ही हो सकती है  ।हमारी भाषा का आधार  शब्द साधनिका है ।इसमें एक शब्द के अनेक शब्द बनाए जा सकते हैं ।यथा -यूज् धातु से योग, उयोग ,संयोग, वियोग, प्रयोग, प्रतियोग बने,  योग्य,अयोग्य विशेषण बने।मूल कृदन्त रूप में  युक्त ,अयुक्त , प्रयुक्त, आयुक्त ,नियुक्त, संयुक्त,  उद्युक्त  बने।  इसी तरह  योगी,वियोगी, संयोगी  रूप बने। में पूज्य पूजनीय शब्द बने ।इसी प्रकार के शब्द बनते रहते हैं ।यह सभी शब्द हिंदी में प्रयुक्त होते हैं ।यहीं है हिंदी की विशालता । 
           हिंदी का व्यापक रूप -हिन्दी  भाषा का अर्णब है इसमें कई भाषाई नदियां मिलती हैं। कई नदियों के मिलने से समुद्र की गरिमा बढ़ती है ।सरदार वल्लभभाई पटेल हिंदी बोलते थे ,उसमें  बहुत सारे शब्द गुजराती डालते थे।   स्वामी दयानंद सरस्वती काठियावाड़ के थे। उनकी हिंदी काठियावाड़ी थी ।कुछ ऐसे शब्द जो अंग्रेजी के होकर भी हिंदी में अपना स्थान बना लिए हैं और यह संपूर्ण भारत में समस्त स्थानों में सुबोपली  ( सुनना बोलना पढ़ना लिखना )मैं समर्थ है। कुछ शब्द जैसे पर्व सभी राज्यों में एक समान बोला जाता है ।यही है हिंदी की व्यापकता  ।
    हिंदी वैज्ञानिक भाषा है ।
       हिंदी विज्ञान सम्मत है ।इसकी सबसे बड़ी विशेषता है इसमें जो बोला जाता है वही  पढ़ा जाता है।,वही लिखा जाता है ।इसके वर्ण सभी जगह एक ही तरह के होते हैं। क बस क, अंग्रेजी की तरह सी, सीएच, क्यू यु ,के का  अंतर भेद नहीं है  ।
अंतर प्रांतीय भाषाओं के प्रति प्रेम 
  सिंधी सेवा और संस्कृति के प्रचार के उद्देश्य के कारण सभी भाषाओं का आदर करती है ।यह प्रचार की भाषा है, शासन करने वाली नहीं है । प्रायः  प्रांतों में हिंदी बेअटक- बेखटक बोली -समझी  जाती है ।जहां इसका विरोध होता है वहां भी यह 40 प्रतिशत  के द्वारा समझी जाती है।  यही कारण है कि हिंदी चलचित्र  सभी प्रदेशों में लिखे जाते हैं ।
 मातृभाषा के समान मिठास  
सभी प्रदेशों की अपनी मां की भाषा होती है ।आवश्यक नहीं कि भाषा को समानता से माने,। परंतु सभी प्रदेशों में हिंदी अपनी मिठास के कारण धीरे-धीरे स्थान बनाती जा रही है ।किसानों की भाषा निश्चित रूप से मातृभाषा ही होगी ।इसीलिए बाबा विनोबा  ने कहा था -अखिल भारतीय संस्कृति की दृष्टि से हिंदी में ही  सार्वभौमिकता है। सार्वभौमिक साहित्य का विकास तभी होगा और अच्छे अच्छे लेखक दक्षिण से भी आएंगे।  सभी भाषाओं को एक साथ सूत्र में बांधकर रखने की शक्ति हिंदी में ही है। अन्य भाषाएं मणियों के समान है परंतु सबको पिरोकर एक माला बनाने का सामर्थ सिर्फ हिंदी में है। अतः तभी न्याय पूर्ण,विवेकपूर्ण निर्णय ही हो सकता है जब उत्तर के लोग दक्षिण की सभी भाषाएं यथा तमिल तेलुगू मलयालम कन्नड़ सीखें और दक्षिण के लिए पूर्वी भाषाओं का ज्ञान बढ़ाएँ। और हिंदी संपूर्ण देश की संपर्क भाषा बने,  इसे राष्ट्रभाषा होने का गौरव प्राप्त हो और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाकर राष्ट्र भी गौरवान्वित हो ।
                       जय हिंद !जय हिंदी  !
                                             आनंद विहार कुंज
                                        मारनपुर, गया -823001   
                                                   अध्यक्ष, 
     अखिल भारतीय मगही प्रचारनी सभा, गया।
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