नया साल मुबारक हो साहब!
गुलामी का ग्रेगोरियन संस्करण
आज सुबह नींद खुली तो लगा मानो कोई अंतरराष्ट्रीय पर्व आ गया हो। मोबाइल उठाया तो देखा—
व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एसएमएस—सब एक सुर में गा रहे थे:
“Happy New Year!”
इतनी शुभकामनाएँ तो जीवन में कभी अपने नववर्ष पर भी नहीं मिलीं।
न चैत्र शुक्ल प्रतिपदा याद आई,
न विक्रम संवत का आरंभ,
न गुड़ी पड़वा,
न युगाब्द,
न नवसंवत्सर।
मन ठिठक गया।
क्या सचमुच हमारा नववर्ष अब अनाथ हो चुका है?
आज़ादी के 75 वर्ष और मानसिक गुलामी का अमृतकाल
देश आज़ाद हुए 75 वर्ष हो गए,
लेकिन दिमाग अब भी 31 दिसंबर की रात को ही आज़ाद होता है।
उस रात घड़ी के 12 बजते ही
मानो कोई मानसिक स्विच ऑन हो जाता है—
“अब नया साल शुरू हुआ!”
बाक़ी 364 दिन?
वो शायद अभ्यास के दिन होते हैं।
राजनीतिक गुलामी तो इतिहास बन गई,
लेकिन मानसिक गुलामी अब भी जिंदा है—
बल्कि कहें कि वह और भी स्मार्ट हो गई है,
अब वह मोबाइल ऐप्स, सोशल मीडिया ट्रेंड और स्टेटस अपडेट में रहने लगी है।
कैलेंडर विदेशी, उत्साह देसी—तर्क पूरी तरह गायब
अजीब बात है—
जिस देश ने
अपना गणित दिया,
अपना ज्योतिष दिया,
अपना कालगणना तंत्र दिया,
वही देश आज पूछता है—
“हमारा नववर्ष कब होता है?”
और मज़े की बात देखिए—
जो व्यक्ति नवसंवत्सर का नाम सुनकर भौंहें चढ़ा लेता है,
वही 31 दिसंबर को केक काटते समय
बिल्कुल वैज्ञानिक मुद्रा में खड़ा रहता है।
नाम से हिन्दू, भीतर से ‘फुल्ली अपडेटेड’
लोग नाम से तो पूरे हिन्दू लगते हैं—
नाम में राम, श्याम, सीता, गीता, शिव सब मिलेगा,
पर चेतना में—
पूरा ग्रेगोरियन पैकेज इंस्टॉल है।
धार्मिक कैलेंडर पूछो तो कहते हैं—
“अरे यार, ये सब पुरानी बातें हैं।”
लेकिन विदेशी त्योहार आए तो—
“भाई, ट्रेंड में रहना चाहिए!”
लगता है संस्कार अब भी पेंडिंग में हैं
और पश्चिमी संस्कृति का अपडेट ऑटोमैटिक डाउनलोड हो रहा है।
उत्सव मनाइए, पर आत्मविस्मृति क्यों?
यह आलेख किसी उत्सव के विरोध में नहीं है।
1 जनवरी मनाना अपराध नहीं,
पर केवल 1 जनवरी को ही सब कुछ मान लेना—
यह तो आत्मविस्मृति है।
जब अपने त्योहार ‘बोरिंग’ लगने लगें
और विदेशी त्योहार ‘क्लासी’,
तो समझ लीजिए
समस्या कैलेंडर की नहीं,
चेतना की है।
शुभकामनाओं से पहले शुभबुद्धि ज़रूरी
काश!
जितनी बार “Happy New Year” फॉरवर्ड किया जाता है,
उतनी बार कोई यह भी लिख दे—
“हमारा नववर्ष कब होता है, यह भी जान लें।”
क्योंकि
नया साल हर साल आता रहेगा,
पर अपनी पहचान लौटाने का अवसर
हर साल नहीं आता।
और हाँ,
अगर अगली बार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर
दो लोग भी “नवसंवत्सर की शुभकामनाएँ” भेज दें—
तो समझिए,
गुलामी की जड़ में पहली दरार पड़ गई।
✍️ लेखक : डॉ. राकेश दत्त मिश्र
(यह आलेख व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक आत्ममंथन हेतु लिखा गया है। इसका उद्देश्य किसी धर्म, व्यक्ति या समुदाय को आहत करना नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना को झकझोरना है।)
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