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बटुकेश्वर दत्त भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रन्तिकारी

बटुकेश्वर दत्त भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रन्तिकारी

पुण्यतिथि पर विशेष: उन्हें फांसी न मिलने का था मलाल, बटुकेश्वर दत्त से जुड़ी 7 खास बातें

संकलन  नीरज पाठक

इस देश का दुर्भाग्य है जिसने देश के लिए यातना झेली उसे आजादी के बाद भी यातना मिली और जिसने देश से गद्दारी की वो आज तक राज भोग रहा है | वैसे ही एक क्रन्तिकारी थे बटुकेश्वर दत्त आज इस  महान क्रांतिकारी की पुण्यतिथि है, परन्तु किसे याद है देश यह लाडला सपूत?। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जब भी शहीद भगतसिंह का नाम आता है तो उनके साथी बटुकेश्वर दत्त को भी गर्व से याद किया जाता है। बटुकेश्वर दत्त भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रन्तिकारी थे। भले ही इस जांबाज क्रांतिकारी को भुला दिया गया हो लेकिन देश की आजादी में दिए गए उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज हम आपको बता रहे हैं बटुकेश्वर दत्त की जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बातें:

 


बंगाल में जन्में थे बटुकेश्वर

 18 नवम्बर, 1910 को तत्कालीन बंगाल में बर्दवान जिले के ओरी गांव में बटुकेश्वर दत्त का जन्म हुआ था। इनकी स्नातक स्तरीय शिक्षा पी.पी.एन.कॉलेज कानपुर में सम्पन्न हुई।  कानपुर में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात भगत सिंह से हुई। 1924 में पढ़ाई के दौरान भगत सिंह से प्रभावित होकर बटुकेश्वर दत्त उनके क्रांतिकारी संगठन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसिएशन से जुड़ गए थे। ‌जिनके साथ उन्होंने बम बनाना भी सीखा। साथी क्रांतिकारियों द्वारा आगरा में एक बम फैक्ट्री बनाई गई थी जिसमें बटुकेश्वर दत्त ने अहम भूमिका निभाई।

ऐसे बनाई गई थी असेंबली बम फेंकने की योजना

बम बनाने के लिए बटुकेश्वर दत्त ने खास ट्रेनिंग ली थी और इसमें महारत हासिल किया। एचएसआरए की कई क्रांतिकारी गतिविधियों में वो सीधे तौर पर शामिल थे। जब भगत सिंह ने उसी तरह से सेंट्रल असेंबली में बम फोड़ने का इरादा व्यक्त किया,तो एचएसआरए की मीटिंग हुई। तय हुआ कि बटुकेश्वर दत्त असेंबली में बम फेंकेंगे और सुखदेव उनके साथ होंगे। भगत सिंह उस दौरान सोवियत संघ की यात्रा पर होंगे, लेकिन बाद में भगत सिंह के सोवियत संघ का दौरा रद्द हो गया और दूसरी मीटिंग में ये तय हुआ कि बटुकेश्वर दत्त बम प्लांट करेंगे, लेकिन उनके साथ सुखदेव के बजाय भगत सिंह होंगे। भगत सिंह को पता था कि बम फेंकने के बाद असेंबली से बचकर निकल पाना, मुमकिन नहीं होगा, ऐसे में क्यों ना इस घटना को बड़ा बनाया जाए, इस घटना के जरिए बड़ा मैसेज दिया जाए।

..और असेंबली में उछाल दिए बम

8 अप्रैल, 1929 का दिन था, पब्लिक सेफ्टी बिल पेश किया जाना था। बटुकेश्वर बचते-बचाते किसी तरह भगत सिंह के साथ दो बम सेंट्रल असेंबली में अंदर ले जाने में कामयाब हो गए। जैसे ही बिल पेश हुआ, विजिटर गैलरी में मौजूद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त उठे और दो बम उस तरफ उछाल दिए जहां बेंच खाली थी। जॉर्ज सस्टर और बी.दलाल समेत थोड़े से लोग घायल हुए लेकिन बम ज्यादा शक्तिशाली नहीं थे। सो धुआं तो भरा, लेकिन किसी की जान को कोई खतरा नहीं था। बम के साथ-साथ दोनों ने पर्चे भी फेंके, गिरफ्तारी से पहले दोनों ने इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद जैसे नारे भी लगाए। दस मिनट के अंदर असेंबली फिर शुरू हुई और फिर स्थगित कर दी गई।

फांसी की सजा न मिलने पर हुए थे दुखी

इस घटना के बाद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी हुई जबकि बटुकेश्वर दत्त को काला पानी की सज़ा दे दी गई। फांसी की सजा न मिलने से वे दुखी और अपमानित महसूस कर रहे थे। बताते हैं कि यह पता चलने पर भगत सिंह ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी। इसका मजमून यह था कि वे दुनिया को यह दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते बल्कि जीवित रहकर जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते हैं।

 

पटना की सड़कों पर टूरिस्ट गाइड के रूप में किया काम

 

काला पानी की सजा के तहत बटुकेश्वर दत्त को अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा गया। वहां से 1937 में वे बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना लाए गए। सन‍् 1938 में उनकी रिहाई हो गई। कालापानी की सजा के दौरान ही उन्हें टीबी हो गई थी जिसमें वे मरते-मरते बचे। जल्द ही वे महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया गया। चार साल बाद 1945 में वे रिहा हुए। 1947 में देश आजाद हो गया। नवम्बर, 1947 में बटुकेश्वर दत्त ने शादी कर ली और पटना में रहने लगे,यहां उनकी जिंदगी का संघर्ष जारी रहा। कभी सिगरेट कंपनी एजेंट तो कभी टूरिस्ट गाइड बनकर उन्हें पटना की सड़कों की धूल छाननी पड़ी।

किताब में किया गया है उनके जीवन का जिक्र

क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त पर किताब लिखने वाले लेखक अनिल वर्मा बताते है कि आजादी के बाद भी बटुकेश्वर दत्त को कोई सम्मान नहीं दिया गया स्वाधीनता के बाद। निर्धनता की ज़िंदगी बिताई उन्होंने। उनकी पत्नी मिडिल स्कूल में नौकरी करती थीं जिससे उनका घर चला।वह बताते हैं कि एक बार पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे तो इसके लिए बटुकेश्वर दत्त ने भी आवेदन किया। परमिट के लिए जब पटना के कमिश्नर के सामने पेशी हुई तो कमिश्नर ने उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लाने को कहा। हालांकि बाद में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जब यह बात पता चली तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर से माफ़ी मांगी थी।

आज ही के दिन अलविदा कह गया यह क्रांतिकारी

कुछ समय तक लंबी बीमारी से जूझने के बाद अंततः 20 जुलाई 1965 को नई दिल्ली के AIIMS हॉस्पिटल में उनका निधन हो गया। पंजाब में फिरोजपुर के पास हुसैनीवाला बाग़ में उनका अंतिम संस्कार किया गया। यहां उनके साथी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का भी अंतिम संस्कार उनकी मृत्यु के कुछ वर्षो पहले किया गया था। ऐसे महानुभावों को कृतज्ञ राष्ट्र हमेशा याद करता है और प्रेरणा प्राप्त करता है। ऐसे ही स्मरणीय व्यक्तित्वों में शहीद भगत सिंह के साथी स्व. बटुकेश्वर दत्त का नाम आदर, श्रद्धा और सम्मान से लिया जाता है।

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