जिसने जुल्म न ढाया हो
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जीने का आधार न हो तो
जीना मुश्किल होता है।
ऊपर-ऊपर हँसता व्यक्ति
भीतर-भीतर रोता है।
कोई तो हो इस जग में
जो दर्द बाँटनेवाला हो।
इस जग की निर्ममता का
जो पाश काटनेवाला हो।
जग-संगर में लगनेवाले
घाव को भरनेवाला हो।
खुशी-खुशी वह मन की
गहरी पीड़ा हरनेवाला हो।
मन की तपन मिटानेवाली
वट की शीतल छाया हो।
कोई तो हो ऐसा साथी
जिसने जुल्म न ढाया हो।
-मिथिलेश कुमार मिश्र 'दर्द'
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