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मैं रात भर!(कविता)

मैं रात भर!(कविता)


         मैं रात भर जागता रहा-
         पर,
         नहीं मिली चाँदनी!
       निहारता रहा आकाश-
     अपने आसपास,
   और अंततः रहा-
  उदास-उदास
कट गई रजनी!!
  नहीं मिली चाँदनी!!
   आकाश खुला था-
     दुध सा धुला था,
        परती धरती,
           सिलसिला था,
             आत्ममुग्ध सजनी!!
               कट गई चाँदनी!!
            यदि मिले कहीं तो-
          मेरा हाल कहना,
        हम राह तकते रहे-
     गहना कह गह'ना,
   रह गई बात-
 बिन बोहनी!!
कट गई चाँदनी!!
        ---:भारतका एक ब्राह्मण.
         संजय कुमार मिश्र"अणु"