महाराणा प्रताप की जयंती पर विशेष -दिवेर का युद्ध
- मनोज मिश्र
हल्दीघाटी का युद्ध समाप्त हो चुका था । महाराणा के पास कुल 7000 सैनिक बचे थे। शेष अपनी मातृभूमि पर न्योछावर हो चुके थे। ज़्यादातर किले महाराणा के हाथो से निकल चुके थे। पर अकबर उन्हे परास्त न कर पाया था न ही बंदी बना पाया था। महाराणा के ललाट पर चिंता की लकीरें थीं। आगे का मार्ग अत्यंत कठिन जान पड़ता था। पर धमनियों मे रक्त का उबाल कम नहीं होता था। मेवाड़ के भविष्य मे यूं अंधेरा नहीं छा सकता था। पर भोजन के लिए अन्न और लड़ने के लिए वीर एवं हथियार की आवश्यकता थी। यूं तो एकलिंग जी सभी कुछ कर सकते हैं पर इस समय की विषम परिस्थिति मे उनके सिवाय कोई अन्य सहारा भी न था। निराशा के इस घोर अंधेरे से बाहर निकालना ही होगा। कुँवर अमर प्रताप भी मदद के लिए आस पास के रजवाड़ों के यहाँ गए हुए थे पर मदद की विशेष आशा न थी। मुग़ल सल्तनत से कोई बैर लेना नहीं चाहता था एवं जागीरदारों के लिए ये अवसर लगान न देने के लिए स्वर्णिम था। महाराणा की धाक मे कमी जरूर आ गयी थी, कुंभलगढ़ गोगुंदा, उदयपुरऔर आस पास के ठिकाने अब मुगलों के अधिकार मे थे, पर उनसे सीधे सीधे उलझने का साहस किस मे न था। फिर मुगलिया फौजों के अत्याचारों से भी आम जन मानस उद्वेलित था। हल्दीघाटी युद्ध के बाद 40000 निर्दोष राजपूतों की हत्या कर दी गयी थी। वो भी उनकी जो कभी फौज का हिस्सा भी न थे।
महाराणा की जय हो, भामाशाह आपके दर्शनों की आज्ञा चाहते हैं- एक सैनिक ने आकर सूचना दी। महाराणा की सात फुट दो इंच की काठी आशा निराशा के बादल आ जा रहे थे। उन्हे आदर सहित ले आओ – महाराणा ने इंगित किया। भामाशाह ने उनके राज में काफी धन अर्जन किया था, वो उनके राज के प्रतिष्ठित व्यापारी अभिन्न मित्र थे। उनके पुरखे महाराणा के राज मे मंत्री और खजांची रह चुके थे।भामाशाह का परिवार अकूत धन का स्वामी था। महाराणा ने उठकर अपने मित्र का स्वागत किया। इधर उधर के हाल समाचार के बाद भामा ने महाराणा को अपनी सारी संपत्ति भेंट कर दी। कुल 2.25 लाख स्वर्ण मुद्राएँ लेकर वे महाराणा की सेवा में उपस्थित थे। यह रकम 25000 की फौज के बारह वर्ष के रख रखाव के लिए काफी थी। महाराणा की आँखें भर आयीं। भामाशाह हाथ जोड़े खड़े थे। सभा ने हर हर महादेव के नारे से उनका अभिनंदन किया। एकलिंगलिंग जी ने महाराणा की सुन ली थी।
महाराणा ने इस धन से 40000 की सेना का गठन किया। सिर्फ मरजीवड़ों को ही शामिल किया। अकबर अक्सर अपनी सेना लेकर उन्हे पकड़ने के लिए अपने सेनापति भेजते रहता था। पर अब राणा का लक्ष्य साफ था। वे अरावली के घुमावदार पहाड़ियों के भूल भुलैया वाले रास्ते पर छापामार युद्ध करने लगे और मुगलों का रसद और हथियार लूटने लगे। सन 1576 से 1581 तक अकबर ने सात बार राणा को परास्त करने के लिए विभिन्न सेनापतियों को भेजा एक बार तो स्वयं भी आया पर लगातार छह महीने के बाद वापस लौट गया। राणा की पूंजी उनकी हिम्मत थी। अपने से चार गुना बड़ी फौज से भी लड़ने मे उनको भय न था। फिर उनके मरजीवड़े हमेशा केशरिया बांध के निकलते थे, प्राणों का उत्सर्ग या विजय यही उनका नारा था। अकबर ने इन सालों में कुल 1.50 लाख भेजे जिसमे से ज़्यादातर सैनिक खेत रहे थे। पर मेवाड़ का शेर अभी भी स्वतंत्र था।
महाराणा और भामाशाह ने युद्ध की तैयारियों का जायजा लिया। भामाशाह ने बताया कि मुगल समझ रहे हैं कि महाराणा धीरे धीरे अपने कदम मेवाड़ से पीछे खींच रहे हैं। अतः यह उचित अवसर है जब धावा बोला जाय। महाराणा कुमार अजय और भामाशाह ने मिलकर तय किया कि वे दिवेर पर धावा बोलेंगे। कुँवर अजय सिंह ने बताया - दिवेर की सुरक्षा अभी सुल्तान खान के पास है जो अकबर का चाचा है। वहाँ हजारों की संख्या में मुगलों की शाही सेना तैनात है। वो कभी सोच भी न सकेंगे कि हम उनपर यहाँ हमला कर सकते हैं।
महाराणा ने कुँवर से पूछा – क्या इडर और सिरोही के शासक हमारी मदद करेंगे? मत भूलो कि जालोर , नाडोल और बूंदी के शक्तिशाली शासक अकबर को कर देते हैं। उनका खुलकर विद्रोह करना संभव न होगा।
कुँवर ने जबाब दिया कि उन्होने इन सभी रियासतों को टटोला है और कोई भी अकबर से खुश नहीं है। अकबर के हरम की 7000 स्त्रियॉं मे से ज़्यादातर इसी भूभाग से हैं। अतः उनमे काफी क्रोध है। जबाब से संतुष्ट होकर दिवेर युद्ध की योजना बनी विजयदशमी के दिन धावा डालने की सहमति बनी। सुल्तान खान को हराना कठिन अवश्य था पर अगर हरा पाये तो राजस्थान की भूमि से अकबर के प्र्भुत्व को उखाड़ा जा सकता था।
सेना को दो भागों मे विभक्त किया गया, एक टुकड़ी का नेतृत्व स्वयं राणा और दूसरे का नेतृत्व कुँवर अजय सिंह के हाथ सौंपा गया। विजयदशमी के दिन 1582 ईस्वी मे महाराणा ने पूरी शक्ति से हमला किया। तब तक जालोर , नाडोल और बूंदी खुलकर महाराणा के समर्थन मे आ गए थे। इडर और सिरोही ने भी अपना समर्थन दे दिया था। इस हमले से सुल्तान खान जो अय्याश हाकिम था और अपनी काबिलियत के बजाय भतीजे अकबर के दम पर दिवेर मे कबीज था, के पैर उखड़ गए। मुगलों की संख्या यूं तो महाराणा के सैनिकों से काफी ज्यादा थी पर बिजली की गति से टूट पड़ी इस मेवड़ी सेना ने शाही सेना को गाजर मुली की तरह काटना शुरू कर दिया। हर हर महदेव एकलिंग महाराज की जय के नारों से आकाश गुंजायमान हो उठा। सुल्तान खान अपनी विशाल सेना के साथ मैदान छोडकर भागने लगा। महाराणा और कुँवर अमर सिंह ने आमेट तक उनका पीछा किया और सेना समेत उसे घेर लिया। कुँवर अमर सिंह का भला इतना तेज चला कि उसने उसके घोड़े और शरीर को चीरता हुआ जमीन मे गड गया। सुल्तान खान एक मूर्ति की तरह जमीन में गड गया। उधर एक अन्य टुकड़ी के नायक बहलोल खान पर राणा की तलवार ऐसी चली कि वो घोड़े समेत दो टुकड़ों में कट गया। युद्ध का यह भयावह रूप देखकर मुगल सैनिक भाग खड़े हुए। महाराणा ने पूरी शाही सेना को नष्ट कर दिया। हल्दी घाटी का यह दूसरा युद्ध मुग़ल बादशाह के लिए करारी हार बन गया और युद्ध के इतिहास में थर्मोपल्ली ऑफ मेवाड़ के नाम से जाना जाता है जिसमे कर्नल टौड ने राणा के योद्धाओं की तुलना स्पार्टा के वीरों से की है।
इस युद्ध के बाद महाराणा ने चित्तौड़ को छोडकर करीब करीब पूरे मेवाड़ पर कब्जा कर लिया और फिर अकबर की हिम्मत न हुई कि वो इस ओर देख सके। यही नहीं अब मुगल व्यापारियों ने भी अपने लश्कर को सुरक्षित गुजरने देने के लिए महाराणा को कर देना आरंभ कर दिया। पिता पुत्र की बहादुरी के चर्चों से और भूमि के गर्व से पूरा मेवाड़ महक उठा।
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