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'जगदंब अहीं अवलंब हमर' गीत के रचयिता मिथिलांचल के मैथिली पुत्र के नाम से प्रसिद्ध कवि प्रदीप का दरभंगा में निधन

'जगदंब अहीं अवलंब हमर' गीत के रचयिता मिथिलांचल के मैथिली पुत्र के नाम से प्रसिद्ध कवि प्रदीप का दरभंगा में निधन आज सुबह हुआ अंतिम संस्कार|

प्रभुनारायण झा 'प्रदीप' ने कई किताबें लिखी थीं. साथ ही उन्हें मिथिला रत्न, सुमन साहित्य सम्मान, वैदेही सम्मान, मिथिला रत्न सम्मान, भोगेंद्र झा सम्मान सहित दर्जनों पुरस्कार मिल चुके थे.

चर्चित लोककवि, साहित्यकार और मैथिली पुत्र के नाम से पहचान बनाने वाले मैथिली गीत लिखने को लेकर प्रसिद्ध हुए प्रभुनारायण झा 'प्रदीप' का कल शनिवार को उनके आवास लहेरियासराय के बेलवागंज स्थित पर  सुबह 6 बजकर 30 मिनट पर निधन हो गया ,  वे 84 वर्ष के थे. उनका लिखा हुआ गीत 'जगदंब अहीं अवलंब हमर, हे माई अहां बिनु आस केकर' ने उन्हें मिथिलांचल में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण  बिहार में सदा के लिए अमर कर दिया.
मैथिली पुत्र प्रभुनारायण झा 'प्रदीप' का जन्म दरभंगा जिला के तारडीह प्रखंड के कैथवार गांव में 30 अप्रैल 1936 को हुआ था. बिहार सरकार के अधीन शिक्षा विभाग में बतौर शिक्षक के रूप में उन्होंने अपनी सेवा दी. 1999 में दरभंगा के गौरी शंकर मध्य विधायलय से सेवानिवृत्त हुए. उनके निधन की खबर से पुरे दरभंगा क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ पड़ी उनके अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग उनके आवास पर पहुंचे और शोक संवेदना व्यक्त की।
उनका अंतिम संस्कार आज रविवार सुबह में उनके पैतृक घर तारडीह प्रखंड के कैथवार में किया गया । वहां भी उनके अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे। मुखाग्नि उनके एकमात्र पुत्र राम कुमार झा ने दी। वे अपने पीछे चार पुत्रियों व एक पुत्र को छोड़ गए हैं। उनकी धर्मपत्नी गुलाब देवी का निधन पूर्व में ही हो चुका है।
मैथिली शिक्षा के लिए रहे प्रयासरत :- मैथिली गीतों के लिए प्रसिद्ध प्रदीप का नाम पूरा नाम प्रभुनारायण झा था। लेकिन वे मैथिली गीतकार के रूप में प्रदीपनाम से विख्यात हुए। उनका जन्म 30 अप्रैल 1936 को कैथवार में हुआ था। उन्होंने बिहार सरकार के शिक्षा विभाग में शिक्षक के रूप में सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की थी। वर्ष 1999 में वे दरभंगा नगर के गौरी शंकर मध्य विद्यालय, कोतवाली चौक से सेवानिवृत्त हुए थे। शिक्षक के रूप में नौकरी करते हुए ही उन्होंने मैथिली की सेवा शुरू कर दी थी। स्कूलों में प्रारंभिक शिक्षा मैथिली में हो इसके लिए वे हमेशा प्रयासरत रहे।
आस्था के साथ गाए जाते हैं गीत:- भगवती गीत जगदंब अहीं अवलंब हमर, हे माई अहां बिनु आस केकरने मैथिली पुत्र को अलग पहचान दिलायी। यह गीत आज भी मिथिला के घर-घर में गाया जाता है। उन्हें मिथिला रत्न, सुमन साहित्य सम्मान, वैदेह सम्मान, भोगेंद्र झा सम्मान सहित दर्जनों पुरस्कार मिल चुके थे। उनकी 24 रचनाएं अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं।
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