नियति हमारी
मन एकाकी, तन एकाकी,
जीवन का हर क्षण एकाकी।
कहने को तो लोग हमारे
साथ-साथ चलते हैं।
पर उनमें कितने ऐसे,
जो हमें नहीं छलते हैं!
अपनों का छलना सचमुच,
जीना मुश्किल कर देता।
यों समझो, छलना अपनों का,
खींच प्राण ही लेता।
पर कैसे जीया जा सकता है
जीवन एकाकी-
मन एकाकी, तन एकाकी,
जीवन का हर क्षण एकाकी।
छला जाना जब निश्चित ही है,
तब क्यों सोच करें हम?
एकाकी जब चलना मुश्किल,
क्यों नहीं साथ चलें हम?
तारे होते साथ-साथ,
पर रहता नील गगन एकाकी-
मन एकाकी, तन एकाकी,
जीवन का हर क्षण एकाकी।
कोई कष्ट नहीं होगा,
जब सीख लिया रहना एकाकी।
चाहे जैसी भी हो विपदा,
सीख लिया सहना एकाकी।
एकाकीपन नियति हमारी,
जीवन और मरण एकाकी-
मन एकाकी, तन एकाकी,
जीवन का हर क्षण एकाकी।
-मिथिलेश कुमार मिश्र 'दर्द'

