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जातीय राजनीति से बढ़ रहा सामाजिक वर्ग संघर्ष रावेन्द्र

जातीय राजनीति से बढ़ रहा सामाजिक वर्ग संघर्ष रावेन्द्र 

पंडित रावेन्द्र तिवारी ,  अध्यक्ष,समानता परिषद

देश की आजादी के साथ देश की सभ्यता और संस्कृति भी बदल गई ।

एक तरफ जहाँ  आरक्षित सीटों पर भी चुनाव लड़ने वाले दलित व पिछड़ा वर्ग के नेताओं को कभी  इस बात की चिंता नहीं होती है कि सवर्ण समाज वोट देगा  अथवा नहीं देगा इन विंदुओं को दरकिनार करते हुए दलित पिछड़ा वर्ग के नेता सिर्फ अपने समाज की बात करते हैं फिर चाहे वह पार्टी के फोरम के भीतर रह कर करने की बात हो या फिर पार्टी फोरम से बाहर निकल कर  इनके लिए  इनका समाज ही  सर्वोपरि हैं ।
किन्तु दुर्भाग्य से सवर्ण समाज जो खुद को पढ़ा लिखा बुद्धिमान समझता है वह आज तक कभी  अपने समाज के लिए बोलने की हिम्मत नहीं कर पाया  उल्टा सदैव ही सवर्ण नेता यह साबित करने में ब्याकुल रहते हैं कि दलित व पिछड़ा वर्ग सोषण का सिकार हुआ है  अतः  इन्हें  आरक्षण तथा दलित एक्ट की सुविधा मिलनी चाहिए आखिर क्यों  सवर्ण नेता ऐसा मानते हैं कि सवर्णो ने ही दलितों व पिछड़ोका  सोषण किया है  जब्कि  हिंन्दुओं का पवित्र ग्रंथ मनु स्मृति में  कर्मों के आधार पर  सृष्टि के संचालन के लिए वर्ण व्यवस्था का प्रावधान किया गया था  किन्तु यह हमारे सनातन संस्कृति की  घोर विडम्बना है कि  आज कुछ दलित पिछड़ा वर्ग के नेताओं के द्वारा मनु स्मृति को ही जलाया जा रहा है गाहे वगाहे  ऐसी घटनाओं को  बड़े ही  आसानी से  आज सोसल मीडिया के युग में देखा जा सकता है 
इस तरह के घटनाओं से समानता की कल्पना करना दिन में तारे गिनने जैसा ही है  सामाजिक वर्ग संघर्ष के कुछ हासिल नहीं किया जा सकता है ।

जब देश आज 21वीं सदी और विश्व गुरु की बात करता है तो  मन में ढेरों पश्न  खड़े हो जाते हैं कि  क्या देश की प्रतिभा को मार कर  कोई देश विश्व गुरु बन सकता है  क्या  70 वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ लेने वाले जिस देश में  अभी भी  दलित सोषित पिछड़ा वंचित रह रहे हैं वह देश  21वीं सदी की कल्पना कर सकता है  जिस देश के  सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को ही  तब  पलट दिया जाए जब  देश का एक बहुत बड़ा  तबका निर्णय को समर्थन करता हो शायद  मेरे  इन प्रश्नों के उत्तर  समाज में  विभिन्न प्रकार से मिले किन्तु सत्य तो यही है कि  एक तरफ जहाँ दलित व पिछड़ा वर्ग के नेताओं को   पार्टी गाइड लाइन या फिर सवर्ण समाज के बोट बैन्क की कोई परवाह नहीं है तो वही दूसरी तरफ सवर्ण समाज के नेताओं को  अपने ही समाज की कोई परवाह नहीं है  परंतु संभवतः  अब ज्यादा दिनों तक  यह  राजनीतिक खेल न चल सके और  सवर्ण समाज भी  अपने  अधिकारों के प्रति सचेत हो जाए 


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