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पूण्यतिथि पर विशेष

वैश्विक वेदना के अतिसंवेदनशील कवि रहे हैं जनार्दन प्र.'द्विज': संजय कु.मिश्र "अणु"


      पूण्यतिथि पर विशेष

हिंदी भाषा साहित्य को अपने अलौकिक विद्या,बुद्धि और विवेक से सुश्री संपन्न करने वाले श्री जनार्द प्र.'द्विज' को लोग प्रखर वक्ता,कर्मठ प्रशासक, सहृद कवि और सुयोग्य गुरू के रूप में आज भी याद करते हैं।इनका जन्म भागलपुर जिले के 'रामडीह' में चौबीस जनवरी उन्नीस सौ पांच को हुआ था।इनके पिता श्री उचित लाल झा एक सुयोग्य शिक्षक तथा विद्वान के रूप में समादृत थे।माता सुशिक्षित कुशल गृहणी थी। 
           इनकी प्रारंभिक शिक्षा पिता के संरक्षण में प्रारंभ हुई।तदंतर भागलपुर और फिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी और हिंदी कला साहित्य से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की।इसी समय इनको महामना मदन मोहन मालवीय, कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद आदि विद्वत वरेण्य जनों का संसर्ग और आशीर्वाद मिलता रहा।
               शिक्षा समाप्ति के बाद ये देवघर हिंदी विद्यापीठ के कुल सचिव बने।इसके बाद राजेंद्र कालेज छपरा में हिंदी विभागाध्यक्ष के पद को सुशोभित किये।अपनी कर्तव्य निष्ठा और लगन से वे उतरोत्तर अग्रसर होते हुए एस.एन.सिंहा कालेज औरंगाबाद में प्राचार्य बने।इनके नेतृत्व में शिक्षा, संरक्षण में साहित्य और निर्देशन में समाज सदैव अग्रसर होते रहा।
          इन्हीं दिनों जब लब्धप्रतिष्ठ साहित्यकार और बिहार विधानसभा अध्यक्ष डा.लक्ष्मी नारायण 'सुधांशु' जी पूर्णिया में महाविद्यालय का निर्माण किये तो उसके प्राचार्य पद सादर प्रदान किये।
             इनकी रचनाधर्मिता अनुपम है।दृष्टि पक्षपात रहित  वाणी वैदुष्यपूर्ण।'किसलय' 'मृदुदल',और 'मधुमयी' नामक कथा संग्रह में ये सब दर्शनीय है।
"अनुभूति" तथा "अंतर्ध्वनि" में इनके भावुकतापूर्ण प्रभावोत्पादकता का परिचय मिलता है।विद्वतापूर्ण वाक् विलास और निष्पक्ष उदात उद्गार के लिए "साहित्यालोचन" नामक निबंध संग्रह सर्वथा द्रष्टव्य है।
        इनकी कविताओं में विश्व वेदना मुक्त कंठ से मुखरित हुई। वे अपनी बात को सीधे और सपाट रूप में परोसने के लिए भी जाने जाते रहे हैं।'विश्व वेदना' से उद्विग्न हृदय जब व्यथित होता है तब वह उसके लिए अपने हीं लोगों को दोषी ठहराने से भी नहीं चुकता है।यही तो निष्पक्ष दृष्टि है।'विश्व वेदना' शीर्षक कविता की ये पंक्ति आज के संदर्भ में और भी सटिक तथा सप्रमाण है---
"दानवता की विजय पराजय मानवता की घोर अनय है।
बात पराये की मत पुछो हमें हाय अपनों का भय है।।"
        अपनी बात को इतनी स्पष्टता से कहने और स्वीकारने वाले लोग विरले हीं होते है।ऐसे विरले और विलक्षण साहित्यसेवी पूण्यात्मा के पूण्य तिथि पर हम श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं।
          ---:भारताका एक ब्राह्मण.
            संजय कुमार मिश्र"अणु"