मातृ दिवस पर वात्सल्यमयी ,ममतामयी माँ के लिए
माँ
***
माँ नहीं है मेरे पास
फिर भी करता हूँ
महसूस उसकी आहत
राह से गुजरते हुए
कभी-कभार
मैं हो जाता हूँ
इस बात से भ्रमित
कि जैसे कोई पुकार रहा है मुझे
मेरे बचपन का नाम लेकर
मैं चौंककर पीछे देखता हूँ
तो पाता हूँ
कोई महिला पुकार रही है
अपने बच्चे को
उसी नाम से
मेरा भ्रम दूर होते ही
मैं आगे बढ़ जाता हूँ
पर उस महिला की आवाज
गूंजती रहती है कानों में
कुछ देर तक
होता है ऐसा प्रतीत
जैसे मेरी माँ
मुझे पुकार रही है l
-- वेद प्रकाश तिवारी
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