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पृथ्वी दिवस अब संवाद नहीं , संकल्प की आवश्यकता

पृथ्वी दिवस अब संवाद नहीं , संकल्प की आवश्यकता


                                     -- वेद प्रकाश तिवारी

पृथ्वी दिवस एक वार्षिक आयोजन है, जिसे 22 अप्रैल को दुनिया भर में पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्थन प्रदर्शित करने के लिए आयोजित किया जाता है।
इसकी स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 में एक पर्यावरण शिक्षा के रूप की थी। अब इसे 192 से अधिक देशों में प्रति वर्ष मनाया जाता है। यह तारीख उत्तरी गोलार्द्ध में वसंत और दक्षिणी गोलार्द्ध में शरद का मौसम है। हर वर्ष किसी न किसी देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए बैठकें होती हैं । कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष कार्यक्रम में शामिल होकर पर्यावरण बचाने का संकल्प लेते हैं । पर सच तो यह है कि पर्यावरण के प्रति विश्व के सभी देश उदासीन दिखाई देते हैं । यह साक्ष्य है कि विश्व के सभी महानगर आज प्रदूषण की चपेट में है , जहां लोगों का सांस लेना दुश्वार हो गया है । रासायनिक गैसों का उत्सर्जन एक बड़ी समस्या बनी हुई है । 
विश्व की जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा पर्यावरण संरक्षण के बजाय  प्रकृति का दोहन करता आ रहा है । 
आज कोरोना वैश्विक महामारी की वजह से पूरा विश्व त्राहि -त्राहि कर रहा है । क्या यह सच नहीं है कि मनुष्य ने धरती पर वनस्पतियों , जीवों के साथ इतनी क्रूरता दिखाई है कि जिससे मानवता शर्मसार हो गई है । 
इतिहास में पहली बार मानव प्रजाति का भविष्य अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। मानव समाज ने धरती को अब तक बहुत घायल कर दिया है। यह सच है किन अनेक वर्षों से धरती पर हो रहे वनों की कटाई , नदियों के उत्खनन, रसायनिक गैसों के उत्सर्जन और सबसे बड़ी पीड़ा जीव- जंतुओं की निर्मम हत्या, जिसे कुछ लोगों ने अपना आहार बना लिया है , इसकी वजह से धरती पर पर्यावरण का खतरा उत्पन्न हो गया है । विश्व के देशों के लगभग सभी शहर भयंकर प्रदूषण की चपेट में हैं । अब प्रकृति में संतुलन स्थापित करने हेतु एक मात्र विकल्प यह है कि हमने इस धरती को जो घाव दिये हैं, उनकी भरपाई कर पृथ्वी की आरोग्यता को बढ़ाया जाएं और सृष्टि के इस ग्रह को चिरायु बनाए रखने के लिए हर सम्भव प्रयास किए जाएं। 
ऐसा करने के लिए मानव समाज में एकता का संचार और भविष्य के प्रति एक सकारात्मक आश बनाए रखना परम आवश्यक है। देश का नागरिक होने के नाते हमारा कर्तव्य है कि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण कर इस धरती की रक्षा करें। 
धरती हमारी मां है और उसकी रक्षा में ही हम सबकी भलाई और हमारा भविष्य सुरक्षित है।
पृथ्वी के सरोकार व्यापक हैं। अतः सावधानियाँ भी व्यापक ही रखनी होगी। यदि पृथ्वी की चिन्ता करनी है, तो सृष्टि के हर अंश की चिन्ता करनी होगी। 
हम परस्पर सहभागिता और स्वस्थ लोकतंत्र में विश्वास करते हैं और अपने लाभ के लिए लोकतंत्र से छेड़खानी का हम प्रबल विरोध करते हैं। हम पृथ्वी तथा उसके प्राणियों के कल्याण हेतु साझेदारी और विविधता में एकता के सिद्धांत को अपना आदर्श मानते हैं। हम हिंसा और अधःपतन के दुष्चक्र को तोड़ने और सभी लोगों और सभी प्रजातियों की भलाई के लिए अहिंसा और उत्थान के आधार पर सद्भाव बढ़ाने हेतु प्रतिबद्ध हैं। हम घृणा और द्वेष के आधार पर बंटने की अपेक्षा एक धरती और एक मानवता के रूप में बंधने में विश्वास रखते हैं। हम गांधी जी की उस शिक्षा में विश्वास रखते हैं जो कहती है, ’जब नियम और कानून मानवता के प्रति नैसर्गिक नियमों का उलंघन करने लगे तब एकजुट होकर असहयोग प्रारम्भ कर दीजिए । हम पुनः ’वसुधैव कुटुम्बकम’ यानी धरती में लोकतंत्र स्थापित करेंगे। ऐसा करने से मनुष्य में सभी प्राणियों के प्रति सद्भावना जगेगी और हमारी धरती चिरायु रहेगी। जब मानव में सभी के प्रति सद्भावना प्रकट होगी तभी मानवता से भरा-पूरा संसार खिल उठेगा और हमारे द्वारा अपनी मां यानी इस भूमि को कोई भी कष्ट नहीं मिलेगा और सच्चे अर्थों में धरती चिरायु हो सकेगी। तब सभी को भोजन, हवा, पानी, और सम्मान पूर्वक जीने का अधिकार मिलेगा। सही मायने में यही वास्तविक स्वतंत्रता है । 
कुछ बातें जो शास्त्रों  में वर्णित हैं इन्हें भी जानिये-
जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है। माता ने जन्म देकर, दूध पिलाकर हर प्रकार से सुख देकर जिस प्रकार हमें पाला-पोसा है उसी प्रकार धरती मां अपने फल-फूल, अन्न, जल, वायु आदि से सारे मानव जगत को सदियों से पालती-पोसती आ रही है। 
ऐसा शास्त्र वचन है कि मनुष्यों के कुल भार से 20 गुना अधिक भार पशुओं जलचर नभचर सांप आदि का होना चाहिए तभी मनुष्य पृथ्वी पर रह सकता है। 
यह अनुपात असंतुलित होते ही प्रकृति आपदा द्वारा मनुष्य का विनाश रच देती है। इसलिए पशु हिंसा पृथ्वी को बहुत ही गहरा आघात पहुंचाती है। 
पृथ्वी को गौ कहा गया है, क्योंकि गौ पर अत्याचार सीधा पृथ्वी पर अत्याचार है। गाय की हत्या कितनी घातक होती है यह बताने की जरूरत नहीं है। हत्या किए जा रहे पशु की आह से सारी समष्टि चेतना चीत्कार करती है, शास्त्रों में साफ साफ आया है कि यह आह ही भूकम्प तूफान महामारी बनकर अपना बदला लेती है। 
सारे देवी देवताओं के वाहन भी पशु हैं और पशुओं के प्रति अपनत्व सिखाते हैं।
सर्पों का इस संसार की रचना में बहुत ही गहरा योगदान होता है, इन्हीं विषधर नागों से पृथ्वी स्थिर है, महादेव यूँ ही सर्पों को गले में लिपटाकर नहीं रखते, विष्णु जी यूँ ही शेषनाग की छाया में नहीं रहते, इसलिए पुराण पृथ्वी को शेषनाग के फण पर टिका बताता है। 
नाग धर्म को स्थिर बनाए रहता है, इसलिए सारे देवमन्दिरों की रक्षा का भार भी नागों पर ही होता है। पद्मनाभस्वामी मन्दिर का खजाना भी इन्हीं की छत्रछाया में है। नाग की हत्या जन्म जन्मांतर तक वर्ष तक भी पीछा नहीं छोड़ती, जिसके नागदोष होता है उसे असहनीय कष्ट होता है।
मनुष्य के जीवन को इसीलिए ज्योतिष "कुण्डली" कहती है जो सर्प का कठोर बंधन होती है। इसलिए सर्प को पूजने का हमेशा हिंदुओं ने यत्न किया है। जबकि चीन जैसा देश सर्पों की हत्या कर उन्हें खा रहा था, सारा यूरोप गौमांस खा कर अपनी बर्बादी को निमंत्रण दे रहा था। सर्पहत्या, गौहत्या और पशुवध के वीभत्स पाप का घड़ा भरता है तो बिना आहट किए काल बनकर निगल जाता है। इससे स्पष्ट प्रमाण पृथ्वी नहीं दे सकती, जागरूक बनिये। मांसाहार त्यागिये, मन में जीव जन्तुओं के प्रति करुणा रखिये। धरती मां के अधिकार और मानव अधिकार किसी भी तरह से एक दूसरे से अलग नहीं हैं। धरती के साथ हिंसा और मानवता के प्रति अन्याय में कोई अंतर नहीं है। न्याय, शांति मानवता और मानव अधिकार की निरंतरता को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता।