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गजब अंधेर है!

गजब अंधेर है!

     संजय कुमार मिश्र"अणु"
                गजब अंधेर है!!१!!
सडकों पर आजकल,
इकट्ठे होकर भेडिये-
दे रहा टेर है!!२!!
            जहां हमसब रहते हैं,
             वह भी वहीं रहता है।
             हम से भिन कौन सा-
             वह काम करता है।
             क्या कमी इधर-
             और उधर ढेर है!!३!!
एक यही न कि वह-
मेरा बाजा बजवाता है।
बस इतनी सी बात पर-
वनराज कहलाता है।
           ये तो केवल-
            समय का फेर है!!४!!
हमारी बडी संख्या है,
उसके पास क्या है।
वह बिल्कुल अकेला है-
बात खास क्या है।
               अलग थलग वह-
               इधर सरमेर है!!५!!
हां दिखता है अंतर-
बस बोली और पुंछ में।
बिलकुल समानता है-
पेट,पीठ और मूंछ में।
              न हम गरीब
              न वो कुबेर है!!६!!
शेर की बराबरी कब कर सकती भेडिया?
ये सब तो समझता है अनपढ गडेरिया,
            होना कुछ नहीं-
            करना बस ऐर है!!७!!
    ---:भारतका एक ब्राह्मण.
      संजय कुमार मिश्र"अणु"