जीवित पिता को एक गिलास पानी नहीं, मृत्यु के बाद श्राद्ध और तर्पण!
-डॉ. राकेश दत्त मिश्र
आज पितृ अमावस्या है। सुबह से ही अनेक पुत्रों को अपने पितरों के लिए तर्पण करते, श्राद्ध करते और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते देखा। किसी ने नदी के तट पर बैठकर जल अर्पित किया, किसी ने ब्राह्मणों को भोजन कराया, तो किसी ने अपने पूर्वजों की स्मृति में दान-पुण्य किया। यह हमारी संस्कृति, परंपरा और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का प्रतीक है। लेकिन इन धार्मिक कर्मकांडों के बीच मन में एक सवाल बार-बार उठता है-क्या अपने माता-पिता के प्रति प्रेम और सम्मान का सबसे बड़ा प्रमाण उनकी मृत्यु के बाद ही दिया जा सकता है?
जिन माता-पिता ने अपनी संतान को उँगली पकड़कर चलना सिखाया, जिनकी रातें बच्चों की बीमारी में जागते हुए बीतीं, जिन्होंने अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर बच्चों के सपनों को पंख दिए, जिन्होंने अपनी भूख छिपाकर संतान का पेट भरा और अपनी जरूरतें कुर्बान करके बच्चों का भविष्य सँवारा, क्या उन्हीं माता-पिता को वृद्धावस्था में एक गिलास पानी के लिए भी तरसना चाहिए? क्या उनकी जिंदगी का प्रतिदान यही है कि जब वे जीवित हों, तब उनकी आवाज सुनने वाला कोई न हो, और जब वे दुनिया से विदा हो जाएँ, तब उनकी तस्वीर के सामने दीपक जलाने वालों की कमी न रहे?
कितनी विचित्र है यह दुनिया! पिता जीवित रहते हैं तो उनकी बातें पुरानी लगती हैं, उनकी सलाह बोझ लगती है, उनकी जरूरतें जिम्मेदारी नहीं, परेशानी लगती हैं। उनकी दवाइयों का खर्च भारी लगता है, उनके साथ कुछ पल बैठना समय की बर्बादी लगता है और उनकी बार-बार कही जाने वाली बातें चिड़चिड़ाहट पैदा करती हैं। लेकिन जैसे ही वही पिता मृत्यु की गोद में समा जाते हैं, घर के वातावरण में अचानक श्रद्धा उमड़ पड़ती है। उनकी तस्वीर पर माला चढ़ाई जाती है, उनके नाम पर भोज होता है, पंडितों को दान दिया जाता है और विधि-विधान से श्राद्ध किया जाता है। तब वही पिता याद आते हैं, जिनकी उपस्थिति में कभी उनके हालचाल पूछने की फुर्सत नहीं थी।
मन पूछता है-जिस पिता को जीवन भर सम्मान की दो बातें नसीब नहीं हुईं, उनकी मृत्यु के बाद सम्मान का यह प्रदर्शन किसके लिए है? जिस माँ ने अपने आँचल में पूरी दुनिया समेटकर बच्चों को बड़ा किया, यदि उसी माँ के बुढ़ापे में उसके आँसू पोंछने वाला कोई न हो, तो मृत्यु के बाद उसके नाम पर किए गए दान-पुण्य का वास्तविक अर्थ क्या रह जाता है?
मैं श्राद्ध, तर्पण या धार्मिक परंपराओं का विरोध नहीं करता। हमारे संस्कार हमें अपने पूर्वजों को याद करना सिखाते हैं। पितृ तर्पण हमारी सांस्कृतिक आस्था का हिस्सा है और अपने दिवंगत माता-पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक माध्यम भी। लेकिन प्रश्न परंपरा का नहीं, हमारी प्राथमिकताओं का है। प्रश्न कर्मकांड का नहीं, हमारे कर्मों का है। प्रश्न श्रद्धा का नहीं, उस श्रद्धा की सच्चाई का है।
यदि पितरों के प्रति हमारी श्रद्धा सच्ची है, तो उसका सबसे सुंदर रूप उनके जीवित रहते दिखाई देना चाहिए। उनके काँपते हाथों को सहारा देने में, उनकी दवाइयाँ समय पर लाने में, उनके अकेलेपन को बाँटने में, उनकी बातों को धैर्य से सुनने में और उनके आत्मसम्मान की रक्षा करने में। वृद्ध पिता को महँगे उपहारों की आवश्यकता नहीं होती; कभी-कभी उनके पास बैठकर दो प्रेमपूर्ण बातें कर लेना ही उनके लिए संसार की सबसे बड़ी संपत्ति बन जाता है। माँ को बड़े-बड़े आयोजनों की नहीं, अपने बच्चों के स्नेह की जरूरत होती है। उन्हें यह विश्वास चाहिए कि वे अब भी अपने परिवार के लिए महत्वपूर्ण हैं, कि उनकी उपस्थिति किसी पर बोझ नहीं है।
याद रखिए, माता-पिता की सबसे बड़ी पीड़ा हमेशा अभाव नहीं होता, बल्कि अपनों के बीच रहते हुए भी अकेला हो जाना होता है। भरे-पूरे घर में उनका कोई हाल पूछने वाला न हो, मोबाइल और व्यस्तताओं की दुनिया में उनके लिए कुछ मिनट भी न बचें, तो यह अकेलापन किसी भी आर्थिक अभाव से अधिक कष्टदायक हो सकता है।
हम मृत्यु के बाद आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं, लेकिन क्या हमने कभी सोचा कि हमारे व्यवहार से जीवित माता-पिता की आत्मा कितनी बार आहत होती है? हम पितरों को जल अर्पित करते हैं, लेकिन क्या घर में बैठे प्यासे पिता को पानी दिया? हम पूर्वजों के नाम पर भोजन कराते हैं, लेकिन क्या कभी अपनी वृद्ध माँ को प्रेम से अपने हाथों से भोजन कराया? हम उनकी मुक्ति की कामना करते हैं, लेकिन क्या उन्हें जीवन भर की उपेक्षा, अपमान और अकेलेपन से मुक्ति दिलाने का प्रयास किया?
पितृ अमावस्या केवल दिवंगत पूर्वजों को याद करने का दिन नहीं, अपने जीवित माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों का आत्ममंथन करने का अवसर भी है। आज यदि आपके माता-पिता जीवित हैं, तो उनके पास बैठिए। उनका हाथ थामिए। उनकी आँखों में झाँककर पूछिए-आप कैसे हैं? आपको किसी चीज की जरूरत तो नहीं? और यदि वे इस दुनिया में नहीं हैं, तो उनके नाम पर किए जाने वाले प्रत्येक धार्मिक कार्य के साथ उनके जीवन से मिली सीख को अपने आचरण में उतारिए। उनकी स्मृति में किसी जरूरतमंद वृद्ध की सहायता कीजिए, किसी अकेले बुजुर्ग का सहारा बनिए और अपने बच्चों को सिखाइए कि माता-पिता की सेवा कोई एहसान नहीं, बल्कि कृतज्ञता और मानवीय संवेदना का स्वाभाविक रूप है।
अंततः एक दिन हम सबको इसी संसार से विदा होना है। हमारे जाने के बाद भी लोग हमारे नाम पर दीप जलाएँगे, फूल चढ़ाएँगे, तर्पण करेंगे और श्राद्ध करेंगे। लेकिन जीवन की असली कसौटी यह नहीं होगी कि हमारी मृत्यु के बाद कितने लोगों ने हमारे लिए आँसू बहाए, बल्कि यह होगी कि हमारे जीवित रहते कितने लोगों ने हमारे चेहरे पर मुस्कान लाने का प्रयास किया।
क्योंकि मृत्यु के बाद की श्रद्धा स्मृति बन सकती है, लेकिन जीवित रहते दिया गया प्रेम ही जीवन को सुंदर बनाता है।
इसलिए, जब तक माता-पिता जीवित हैं, उनके चरणों में बैठना ही सबसे बड़ी पूजा है, उनकी सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, उनके चेहरे पर मुस्कान लाना ही सबसे बड़ा पुण्य है और उनकी आँखों में आँसू न आने देना ही सबसे सच्चा तर्पण है।
कहीं ऐसा न हो कि हम जीवन भर अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ते रहें और मृत्यु के बाद कर्मकांडों के सहारे अपने अपराधबोध को शांत करने की कोशिश करें। पितरों के लिए तिल और जल अर्पित करने से पहले अपने भीतर संवेदना का दीप जलाइए। क्योंकि जिस घर में जीवित माता-पिता उपेक्षित हों, उस घर में पूर्वजों के सम्मान का वास्तविक अर्थ अधूरा रह जाता है।
जीवित पिता को एक गिलास पानी पिलाइए-शायद यही वह तर्पण है, जिसकी प्रतीक्षा में उनकी आँखें जीवन भर दरवाजे पर लगी रहती हैं।
लेखक डॉ. राकेश दत्त मिश्र, दिव्य रश्मि के सम्पादक है |
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