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झूठ की औकात क्या

झूठ की औकात क्या

झूठ की औकात क्या, जानता हूँ,
बोलबाला उसका यहाँ, मानता हूँ।
छुप रहा क्यों झूठ, सच के सामने?
बस इसी बात से, मैं रार ठानता हूँ।


है यही औकात झूठ की, जान लो,
रात का नीरव अन्धेरा, दीप थाम लो।
शान्त सरोवर मे, एक पत्थर फैंकिये,
हलचलें होंगी शान्त जल में, मान लो।


पल भर में झूठ, बेनक़ाब हो जायेगा,
इतिहास को कुरेदो, सच सामने आयेगा।
किसने मारा गाँधी को, किसकी सियासत,
अब तक पढ़ा इतिहास, झूठा हो जायेगा।


लाल बहादुर जैसे नेता, ताशकंद में मौत हुई,
डॉक्टर- ख़ानसामा की, क्यों नहीं जाँच हुई?
किसको लाभ हुआ मौत से, प्रश्न खड़ा सामने,
आज तलक भी हत्यारों की, नहीं पहचान हुई?

अ कीर्ति वर्धन
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