पत्रकारिता की अनमोल धरोहर थे पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’.jpeg)
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(पुण्यतिथि 29 अक्टूबर पर विशेष)
- लेखनी की निर्भीकता, इतिहास की गहरी समझ, सांस्कृतिक विरासत के प्रति अटूट अनुराग और सामाजिक समरसता के प्रति समर्पण ने बनाया था उन्हें अद्वितीय व्यक्तित्व
भारतीय पत्रकारिता का इतिहास केवल समाचारों के संकलन, घटनाओं के विवरण और सत्ता के गलियारों की गतिविधियों तक सीमित नहीं है। यह इतिहास उन तपस्वी पत्रकारों की साधना, संघर्ष, निष्ठा और वैचारिक प्रतिबद्धता का भी साक्षी है, जिन्होंने अपनी लेखनी को समाज की चेतना जगाने का माध्यम बनाया, इतिहास की विस्मृत कड़ियों को जोड़ने का दायित्व निभाया और पत्रकारिता को जनसेवा का सशक्त उपकरण सिद्ध किया। ऐसे ही विलक्षण, बहुआयामी और ज्ञानसमृद्ध व्यक्तित्व थे वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं इतिहासवेत्ता पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’। उन्होंने अपने जीवन के लगभग पाँच दशकों को पत्रकारिता, साहित्य, इतिहास-अन्वेषण, सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनकी लेखनी गंगा की अविरल धारा की तरह निरंतर प्रवाहित होती रही और उनकी वाणी ज्ञान, विवेक तथा अनुभव की ऐसी त्रिवेणी बनकर सामने आती थी, जिसमें श्रोता और पाठक सहज ही अभिभूत हो जाते थे।
29 अक्टूबर उनकी पुण्यतिथि है। यह तिथि केवल एक महान पत्रकार की स्मृति को नमन करने का अवसर नहीं, बल्कि उस पत्रकारिता-दृष्टि का पुनर्स्मरण करने का दिन भी है, जिसमें समाचार के साथ समाज, सूचना के साथ इतिहास, विचार के साथ संस्कार और लेखनी के साथ लोकमंगल की भावना जुड़ी हुई थी। पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा पत्रकार केवल अपने समय की घटनाओं का साक्षी नहीं होता, बल्कि वह अपने समय का इतिहासकार, समाज का सजग प्रहरी और आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान का संरक्षक भी होता है।
पत्रकारिता की विरासत में जन्मी एक विलक्षण प्रतिभा
पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ का जन्म रामनवमी, 1927 ई. में पटना सिटी के विश्वेश्वरदत्त मिश्र मार्ग पर हुआ था। रामनवमी जैसे पावन पर्व पर जन्म लेने के कारण उनका नाम रामजी मिश्र रखा गया और आगे चलकर ‘मनोहर’ उनके व्यक्तित्व तथा लोकप्रिय परिचय का अभिन्न अंग बन गया। वे अपने नाम के अनुरूप ही सहज, आकर्षक, मिलनसार और प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी बातचीत में आत्मीयता, व्यवहार में विनम्रता, अध्ययन में गंभीरता और अभिव्यक्ति में अद्भुत प्रवाह दिखाई देता था।
उनके पिता स्वर्गीय डॉ. विश्वेश्वरदत्त मिश्र होमियोपैथ चिकित्सक होने के साथ-साथ ‘बिहार बंधु’ समाचारपत्र के प्रकाशक भी थे। इस प्रकार उनके घर में चिकित्सा, साहित्य, समाज और पत्रकारिता का एक विशिष्ट वातावरण विद्यमान था। उनकी माता स्वर्गीय किशोरी देवी थीं। पारिवारिक संस्कारों और बौद्धिक वातावरण ने उनके व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी धर्मपत्नी दमयन्ती जी ने पारिवारिक जीवन में उनका साथ दिया। उनके पारिवारिक जीवन में उनकी धर्मपत्नी दमयन्ती जी का महत्वपूर्ण स्थान था। उनके तीन पुत्र हुए-ज्ञानवर्द्धन मिश्र, नवीन मिश्र और पंकज मिश्र। मनोहर जी का पत्रकारिता के प्रति समर्पण उनके व्यक्तित्व की विशिष्ट पहचान थी। उनके परिवार का समाचारपत्रों एवं पत्रकारिता जगत से जुड़ाव भी इस परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है। उनके लिए पत्रकारिता केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व, ज्ञान के प्रसार और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का माध्यम थी। इस प्रकार उनका जीवन और कार्य पत्रकारिता के प्रति समर्पण की ऐसी विरासत प्रस्तुत करते हैं, जिसे आने वाली पीढ़ियाँ भी प्रेरणा के रूप में ग्रहण कर सकती हैं।उनके दो पुत्र ज्ञानवर्द्धन मिश्र और पंकज कुमार मिश्र भी समाचारपत्रों से संबद्ध रहे। इस प्रकार पत्रकारिता के प्रति उनका समर्पण केवल व्यक्तिगत उपलब्धि बनकर नहीं रहा, बल्कि पारिवारिक परंपरा के रूप में भी आगे बढ़ा।
रामजी मिश्र ‘मनोहर’ को पत्रकारिता का संस्कार पारिवारिक वातावरण से मिला, लेकिन इस संस्कार को जीवन की साधना में परिवर्तित करने का श्रेय उनकी अपनी लगन, अध्ययनशीलता और कर्मठता को जाता है। उनके मामा पुण्यश्लोक पं. प्रमोदशरण पाठक, जो स्वयं संपादक थे, उनके प्रमुख प्रेरणास्रोत और मार्गदर्शक बने। उन्होंने मनोहर जी के भीतर पत्रकारिता के प्रति रुचि को दिशा दी और उन्हें लेखन तथा संपादन की बारीकियों से परिचित कराया।
मनोहर जी की विश्वविद्यालयी शिक्षा राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेने के कारण अधूरी रह गई। किंतु शिक्षा का वास्तविक अर्थ केवल विश्वविद्यालय की उपाधि प्राप्त करना नहीं है। ज्ञान के प्रति जिज्ञासा, निरंतर अध्ययन, अनुभव से सीखने की क्षमता और समाज को समझने की दृष्टि भी शिक्षा के महत्वपूर्ण आधार हैं। मनोहर जी ने अपने जीवन में इन्हीं गुणों के सहारे ज्ञान का ऐसा संसार निर्मित किया कि वे आगे चलकर पटना के चलते-फिरते पुस्तकालय और इतिहास के जंगम शब्दकोश के रूप में प्रसिद्ध हुए।
1945 में आरंभ हुई पत्रकारिता की अविराम यात्रा
पत्र-पत्रिकाओं के प्रति उनका लगाव छात्र जीवन से ही था। समाचारों को पढ़ना, घटनाओं के पीछे छिपे कारणों को समझना, समाज के विविध पक्षों का अध्ययन करना और तथ्यों को व्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत करना उनकी रुचि का विषय था। वर्ष 1945 में उन्हें दैनिक ‘आर्यावर्त’ में पटना सिटी के संवाददाता के रूप में नियुक्ति मिली। यही वह महत्वपूर्ण पड़ाव था, जहाँ से उनकी पत्रकारिता यात्रा ने पूर्ण गति प्राप्त की।
उस समय पत्रकारिता आज की तरह तकनीकी संसाधनों, त्वरित संचार और डिजिटल माध्यमों से संपन्न नहीं थी। समाचार जुटाने के लिए संवाददाताओं को स्वयं घटनास्थल तक पहुँचना पड़ता था। लोगों से मिलना, दस्तावेजों का अध्ययन करना, प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त करना और फिर समाचार को समाचारपत्र तक पहुँचाना एक कठिन प्रक्रिया थी। ऐसी परिस्थितियों में पत्रकारिता के प्रति निष्ठा, शारीरिक परिश्रम, धैर्य और तथ्यों की विश्वसनीयता अत्यंत आवश्यक थी।
मनोहर जी ने इन सभी चुनौतियों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। उनके लिए पत्रकारिता केवल नौकरी अथवा आजीविका का साधन नहीं थी। वह जनजीवन को समझने, समाज की समस्याओं को सामने लाने, सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा करने और ऐतिहासिक तथ्यों को सुरक्षित रखने का माध्यम थी। यही कारण था कि उन्होंने अपने पेशेवर जीवन में समाचार-संकलन से आगे बढ़कर इतिहास, साहित्य, धर्म, संस्कृति और समाजसेवा के अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया।
उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक प्रतिष्ठित समाचारपत्रों और समाचार एजेंसियों के साथ कार्य किया। हिंदी पत्रकारिता में ‘आर्यावर्त’, ‘राष्ट्रवाणी’, ‘प्रदीप’, ‘विश्वमित्र’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘सन्मार्ग’, ‘आज’, ‘भारत’, ‘अमृत पत्रिका’ और ‘हिन्दुस्तान’ जैसे समाचारपत्रों से उनका जुड़ाव रहा। अंग्रेजी पत्रकारिता के क्षेत्र में ‘सर्चलाइट’, ‘द इंडियन नेशन’, ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ तथा समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) से भी वे संबद्ध रहे।
इन विविध संस्थानों में अलग-अलग दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने पत्रकारिता के अनेक आयामों को निकट से समझा। हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं की पत्रकारिता से जुड़ाव ने उनकी दृष्टि को व्यापक बनाया। वे स्थानीय घटनाओं को राष्ट्रीय संदर्भ में देखने और ऐतिहासिक विषयों को सामान्य पाठकों के लिए सरल तथा रोचक ढंग से प्रस्तुत करने में सक्षम थे।
उनकी पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि वे पटना और बिहार की घटनाओं को केवल स्थानीय महत्व की सामग्री मानकर नहीं चलते थे। वे जानते थे कि किसी नगर की गलियों, मंदिरों, गुरुद्वारों, स्मारकों, पुराने बाजारों, ऐतिहासिक भवनों और जनजीवन में ऐसे अनेक तथ्य छिपे रहते हैं, जो पूरे देश की सांस्कृतिक यात्रा को समझने में सहायक हो सकते हैं। उन्होंने अपने लेखन और संवाददाता के दायित्व के माध्यम से इन तथ्यों को सामने लाने का प्रयास किया।
‘दास्ताने पाटलिपुत्र’ : इतिहास को जीवंत करने वाली अमर कृति
पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ का नाम आते ही उनकी प्रसिद्ध कृति ‘दास्ताने पाटलिपुत्र’ की स्मृति सहज रूप से जाग उठती है। यह पुस्तक उनके ऐतिहासिक अध्ययन, स्थानीय विरासत के प्रति गहरे लगाव और अतीत को वर्तमान से जोड़ने की अद्भुत क्षमता का परिचायक है। इस कृति ने उन्हें इतिहासप्रेमियों तथा साहित्यिक जगत में एक विशिष्ट पहचान प्रदान की।
पाटलिपुत्र केवल एक नगर का प्राचीन नाम नहीं है। यह भारतीय इतिहास की उन महान परंपराओं का प्रतीक है, जिनमें राजनीतिक वैभव, बौद्धिक उत्कर्ष, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सामाजिक विकास की अनेक धाराएँ एक साथ प्रवाहित हुईं। इस नगर ने विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों में भारतीय सभ्यता की यात्रा को निकट से देखा है। इसकी मिट्टी में इतिहास की अनेक परतें समाई हुई हैं। इसके प्राचीन स्थलों, पुराने मोहल्लों, धार्मिक केंद्रों, स्मारकों और लोकपरंपराओं में अतीत की अनेक कहानियाँ आज भी जीवित हैं।
मनोहर जी ने पाटलिपुत्र के इतिहास को केवल तिथियों, राजवंशों और घटनाओं के संकलन के रूप में नहीं देखा। उनके लेखन में ऐतिहासिक स्थानों से जुड़ी मानवीय अनुभूतियों और सांस्कृतिक स्मृतियों का महत्व भी दिखाई देता था। यही विशेषता उनके इतिहासबोध को विशिष्ट बनाती थी। वे अतीत को संग्रहालय की किसी निर्जीव वस्तु की तरह नहीं, बल्कि वर्तमान समाज की जीवंत चेतना के रूप में देखते थे।
‘दास्ताने पाटलिपुत्र’ जैसी कृति का महत्व इस दृष्टि से और बढ़ जाता है कि नगरों का इतिहास केवल बड़े राजाओं, युद्धों और राजनीतिक निर्णयों से निर्मित नहीं होता। उसे आम नागरिकों, धार्मिक परंपराओं, बाजारों, सामाजिक संस्थाओं, भाषाओं, साहित्य, स्थापत्य और लोकजीवन की निरंतरता भी आकार देती है। इन विविध पहलुओं को समझने के लिए व्यापक अध्ययन और स्थानीय समाज के साथ गहरा जुड़ाव आवश्यक होता है। मनोहर जी के व्यक्तित्व में ये दोनों विशेषताएँ मौजूद थीं।
वे पटना के ऐतिहासिक स्थलों के संबंध में इतनी विस्तृत जानकारी रखते थे कि लोग उन्हें चलते-फिरते पुस्तकालय और इतिहास का जंगम शब्दकोश कहने लगे थे। उनके पास केवल पुस्तकीय जानकारी ही नहीं, बल्कि स्थानीय परिवेश, परंपराओं और स्मारकों से जुड़ा अनुभवजन्य ज्ञान भी था। यही कारण था कि इतिहास से संबंधित किसी विषय पर उनसे चर्चा करना अपने आप में एक ज्ञानवर्धक अनुभव बन जाता था।
उनकी ऐतिहासिक दृष्टि का महत्व आज और अधिक प्रासंगिक है। आधुनिक विकास की दौड़ में अनेक नगर अपनी पुरानी पहचान खोते जा रहे हैं। पुरानी इमारतें, ऐतिहासिक मार्ग, धार्मिक स्थल और सांस्कृतिक केंद्र उपेक्षा के शिकार होते हैं। ऐसे समय में मनोहर जी की कृतियाँ हमें यह स्मरण कराती हैं कि विकास का अर्थ अपनी जड़ों को काट देना नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करना है।
उनका लेखन आने वाली पीढ़ियों के लिए यह संदेश छोड़ता है कि यदि हम अपने नगर, अपनी भाषा, अपने साहित्य और अपने सांस्कृतिक परिवेश का इतिहास स्वयं सुरक्षित नहीं करेंगे, तो समय के साथ अनेक महत्वपूर्ण स्मृतियाँ विलुप्त हो जाएँगी।
एक हजार से अधिक लेखों में समाहित ज्ञान-साधना
मनोहर जी की प्रतिभा किसी एक पुस्तक अथवा समाचारपत्र तक सीमित नहीं थी। उन्होंने विभिन्न विषयों पर पत्र-पत्रिकाओं में एक हजार से अधिक लेख लिखे। यह संख्या केवल उनकी लेखन-क्षमता का प्रमाण नहीं है, बल्कि उनकी निरंतर अध्ययनशीलता और विषयों की विविधता का भी परिचायक है।
इतने व्यापक लेखन के लिए केवल भाषा पर अधिकार पर्याप्त नहीं होता। लेखक को विषयों का अध्ययन करना पड़ता है, संदर्भों को समझना होता है, तथ्यों की पुष्टि करनी होती है और पाठकों की रुचि के अनुरूप अपनी बात प्रस्तुत करनी होती है। मनोहर जी ने अपने लंबे पत्रकारिता जीवन में इन सभी पक्षों पर काम किया।
वे इतिहास, धर्म, संस्कृति, साहित्य, सामाजिक जीवन और विभिन्न संस्थाओं से जुड़े विषयों पर गंभीरता से लिखते थे। उनकी लेखनी में जानकारी के साथ विवेचन का महत्व था। वे किसी स्थान अथवा परंपरा का उल्लेख करते समय उसके व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ को भी सामने लाने का प्रयास करते थे। यही कारण था कि उनके लेख पाठकों के लिए केवल तत्कालीन सूचना नहीं, बल्कि ज्ञान के स्थायी स्रोत भी बनते थे।
उन्होंने मासिक हिंदी पत्रिका ‘नानकवाणी’ का प्रकाशन भी किया। इस प्रयास से उनके व्यक्तित्व का एक और पक्ष सामने आता है। वे केवल स्थापित समाचारपत्रों के लिए लिखने वाले पत्रकार नहीं थे, बल्कि अपनी रुचि और वैचारिक उद्देश्य के अनुरूप प्रकाशन के माध्यम से भी पाठकों तक पहुँचना चाहते थे।
पत्रकारिता में नियमित लेखन के साथ किसी पत्रिका का प्रकाशन करना अतिरिक्त परिश्रम, संगठन और संपादकीय विवेक की माँग करता है। मनोहर जी ने इस दिशा में भी अपना योगदान दिया। उनके लिए पत्र-पत्रिकाएँ समाज में विचारों के आदान-प्रदान और ज्ञान के प्रसार का महत्वपूर्ण माध्यम थीं।
आकाशवाणी से दूरदर्शन तक : बहुआयामी अभिव्यक्ति
मनोहर जी का व्यक्तित्व केवल मुद्रित शब्दों तक सीमित नहीं था। उनकी विद्वत्ता और अभिव्यक्ति की क्षमता का लाभ आकाशवाणी तथा दूरदर्शन जैसे माध्यमों को भी मिला। उन्होंने आकाशवाणी, पटना से सौ से अधिक विभिन्न विषयों पर वार्ताएँ प्रस्तुत कीं। रेडियो के माध्यम से उन्होंने उन श्रोताओं तक अपने विचार पहुँचाए, जिनके लिए पुस्तकें अथवा समाचारपत्र हमेशा सुलभ नहीं होते थे।
रेडियो वार्ता के लिए विषय का ज्ञान होने के साथ-साथ उसे बोलचाल की भाषा में प्रस्तुत करने की कला भी आवश्यक होती है। वक्ता को सीमित समय में विषय का सार सामने रखना पड़ता है, ताकि श्रोता बिना किसी दृश्य सहायता के भी बात को समझ सकें। मनोहर जी की भाषण-कला, स्मरणशक्ति और विषय पर पकड़ ने इस कार्य को प्रभावशाली बनाया।
वे दूरदर्शन के राष्ट्रीय नेटवर्क पर प्रसारित टेलीफिल्म ‘तहि प्रकाश हमारा भयो’ के पटकथा लेखक भी थे। यह तथ्य उनके रचनात्मक व्यक्तित्व के एक और आयाम को उजागर करता है। समाचार लेखन, ऐतिहासिक विवेचन, रेडियो वार्ता और पटकथा लेखन—इन सभी विधाओं में योगदान देना उनकी व्यापक साहित्यिक क्षमता का परिचायक है।
उनकी अभिव्यक्ति में तथ्य और संवेदना का संतुलन था। वे गंभीर विषयों को भी इस प्रकार प्रस्तुत करते थे कि श्रोता और पाठक उनसे जुड़ाव अनुभव कर सकें। उनके धाराप्रवाह भाषणों में ज्ञान की गहराई, भाषा की सहजता और प्रसंगानुकूल उदाहरणों की प्रचुरता रहती थी। किसी भी सभा में उनकी उपस्थिति कार्यक्रम की गरिमा बढ़ा देती थी।
धर्मों के अध्ययन में व्यापक दृष्टि और सामाजिक समरसता का संदेश
पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ के व्यक्तित्व की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक थी विभिन्न धर्मों, परंपराओं और धार्मिक स्थलों के प्रति उनकी गहरी जानकारी तथा आत्मीयता। उनकी धार्मिक समझ किसी एक परंपरा तक सीमित नहीं थी। वे हिंदू धर्म, सिख धर्म, इस्लाम और जैन धर्म से संबंधित ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक विषयों का अध्ययन करते थे।
हिंदू धर्म के प्रति उनकी अटूट आस्था थी। पटना की बड़ी पटनदेवी और छोटी पटनदेवी जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों से उनका विशेष लगाव था। इन मंदिरों के धार्मिक महत्व के साथ-साथ वे उनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूमिका को भी समझते थे। उनके लिए मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थान नहीं थे, बल्कि सामाजिक जीवन, लोकविश्वास और सांस्कृतिक निरंतरता के महत्वपूर्ण केंद्र भी थे।
इसके साथ ही उन्हें इस्लामी परंपरा और सूफियाना विरासत से भी गहरा परिचय था। शाद अजीमाबादी की मजार के प्रति उनका सम्मान इस बात का उदाहरण था कि वे धार्मिक और साहित्यिक धरोहरों को व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ में देखते थे। शाद अजीमाबादी उर्दू साहित्य की महत्वपूर्ण शख्सियतों में गिने जाते हैं। ऐसे साहित्यकारों की स्मृतियों से जुड़ाव मनोहर जी की बहुआयामी रुचि को दर्शाता है।
सिख धर्म के प्रति उनकी विशेष श्रद्धा और अध्ययन ने उन्हें बिहार से बाहर भी पहचान दिलाई। वे तख्त श्री हरिमंदिर जी, पटना साहिब में प्रतिदिन मत्था टेकने जाते थे। यह स्थान सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी की जन्मभूमि होने के कारण विश्वभर के सिख समुदाय के लिए अत्यंत पवित्र है। मनोहर जी के लिए यह धार्मिक आस्था के साथ-साथ इतिहास, संस्कृति और मानवीय एकता का भी केंद्र था।
उन्होंने बिहार, पंजाब, बंगाल, उत्तर प्रदेश और हरियाणा सहित विभिन्न राज्यों के गुरुद्वारों तथा सार्वजनिक सभाओं में सिख गुरुओं के जीवन, विचारों और योगदान पर विद्वतापूर्ण भाषण दिए। उनके व्याख्यानों का उद्देश्य केवल ऐतिहासिक जानकारी देना नहीं था, बल्कि विभिन्न समुदायों के बीच परस्पर सम्मान और सांस्कृतिक समझ को बढ़ाना भी था। इस प्रकार उन्होंने हिंदू-सिख एकता को मजबूत करने की दिशा में अविस्मरणीय योगदान दिया।
उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, जो स्वयं सिख परंपरा और गुरुद्वारा संस्कृति से गहरा संबंध रखते थे, पटना साहिब में मनोहर जी के सिख धर्म संबंधी ज्ञान से अत्यंत प्रभावित हुए थे। उपलब्ध संस्मरण के अनुसार, मनोहर जी का स्वागत भाषण सुनकर ज्ञानी जैल सिंह ने उन्हें गले लगाया और पंजाबी में प्रशंसा करते हुए कहा, “साडे बल्लों तुसी सिक्खी ज्यादा जानदे हो। तुसी सच्चे सिख हो।” अर्थात, हमारे विचार से आप सिख धर्म को बहुत अच्छी तरह जानते हैं; आप सच्चे सिख हैं।
यह प्रसंग मनोहर जी के अध्ययन की गहराई और धार्मिक विषयों पर उनकी विद्वत्ता का परिचायक है। किसी दूसरे धर्म की परंपराओं का अध्ययन करना, उसके इतिहास को समझना और उसके अनुयायियों के बीच सम्मान अर्जित करना केवल जानकारी का विषय नहीं है। इसके लिए विनम्रता, गंभीर अध्ययन और खुले मन की आवश्यकता होती है।
जैन धर्म के प्रति भी उनकी विशेष रुचि थी। पटना सिटी के गुलजारबाग स्थित महास्थविर स्थूलिभद्र की साधना-भूमि के संबंध में गुजरात की तत्कालीन मंत्री उर्मिला बेन पटेल को जानकारी देने का उल्लेख उनके जीवन से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रसंग है। इस प्रकार वे धार्मिक स्थलों को केवल पूजा-पद्धतियों के आधार पर नहीं, बल्कि उनके इतिहास, साधना-परंपरा और सांस्कृतिक योगदान के आधार पर भी समझते थे।
मनोहर जी का यह व्यापक दृष्टिकोण आज के समाज के लिए विशेष महत्व रखता है। धर्म का वास्तविक ज्ञान मनुष्य को संकीर्णता की ओर नहीं, बल्कि अपनी परंपरा के प्रति श्रद्धा रखते हुए दूसरों की आस्थाओं को समझने की ओर प्रेरित करता है। मनोहर जी ने अपने अध्ययन और व्यवहार से यह संदेश दिया कि सांस्कृतिक विविधता किसी समाज की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी समृद्धि का प्रमाण है।
1975 की भीषण बाढ़ और समाजसेवा का दायित्व
पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ के जीवन को केवल पत्रकारिता और साहित्य की उपलब्धियों के आधार पर ही नहीं समझा जा सकता। वे एक सक्रिय समाजसेवी भी थे। उनके लिए समाज के प्रति उत्तरदायित्व लेखों और भाषणों तक सीमित नहीं था। वे नागरिक समस्याओं, सार्वजनिक सुविधाओं और नगर की आवश्यकताओं के प्रति भी सजग रहते थे।
वर्ष 1975 में पटना में आई भीषण बाढ़ ने शहर के जनजीवन को गंभीर रूप से प्रभावित किया था। ऐसी प्राकृतिक आपदाएँ केवल घरों और सड़कों को नुकसान नहीं पहुँचातीं, बल्कि लोगों के जीवन, रोजगार, स्वास्थ्य और दैनिक आवश्यकताओं पर भी गहरा प्रभाव डालती हैं। इस कठिन समय की स्मृतियों में मनोहर जी के योगदान को भी याद किया जाता है।
उनका सामाजिक सरोकार नगर की ऐतिहासिक पहचान और नागरिक सुविधाओं से भी जुड़ा हुआ था। राजेंद्रनगर टर्मिनल स्टेशन के निर्माण से संबंधित प्रयासों तथा पटना सिटी के शाद अजीमाबादी लेन, पश्चिम दरवाजा और पूरब दरवाजा जैसे क्षेत्रों की समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित कराने के कार्यों का उल्लेख उनके सामाजिक योगदान के संदर्भ में किया जाता है।
किसी पत्रकार के लिए नगर की समस्याओं को सामने लाना एक महत्वपूर्ण दायित्व है, लेकिन जब वह इन समस्याओं के समाधान के लिए भी प्रयास करता है, तब उसका सामाजिक सरोकार और अधिक व्यापक हो जाता है। मनोहर जी इसी सक्रिय पत्रकारिता के प्रतिनिधि थे। वे जानते थे कि समाचारपत्र में प्रकाशित एक तथ्य कभी-कभी प्रशासन का ध्यान किसी उपेक्षित समस्या की ओर आकर्षित कर सकता है और सार्वजनिक हित में परिवर्तन का आधार बन सकता है।
उनकी दृष्टि में शहर केवल इमारतों और सड़कों का समूह नहीं था। वह इतिहास, संस्कृति, नागरिक जीवन और मानवीय संबंधों का जीवंत संसार था। इसीलिए पटना की ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने और उसकी सार्वजनिक आवश्यकताओं को सामने लाने का प्रयास उनके लिए एक ही व्यापक सामाजिक दायित्व के दो पक्ष थे।
मगही भाषा और साहित्य के प्रति समर्पण
बिहार की सांस्कृतिक पहचान उसकी भाषाई विविधता में भी निहित है। हिंदी के साथ-साथ मगही, भोजपुरी, मैथिली, अंगिका और अन्य भाषाएँ इस क्षेत्र की लोकस्मृति, जीवन-दर्शन और सामाजिक अनुभवों को अभिव्यक्ति देती हैं। पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ इस भाषाई विरासत के महत्व को समझते थे।
23 फरवरी, 1986 को उन्हें अखिल भारतीय मगही भाषा सम्मेलन की अध्यक्षता करने का अवसर प्राप्त हुआ। यह उनके साहित्यिक और भाषाई सरोकारों की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। मगही भाषा का अपना समृद्ध लोकसाहित्य, लोकगीत, कथाएँ, कहावतें और ऐतिहासिक अनुभव हैं। ऐसी भाषाओं का संरक्षण केवल भाषाविदों का दायित्व नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
मनोहर जी का इस सम्मेलन से जुड़ाव दर्शाता है कि उनकी रुचि केवल प्रतिष्ठित साहित्यिक परंपराओं तक सीमित नहीं थी। वे क्षेत्रीय भाषा और लोकसंस्कृति के महत्व को भी स्वीकार करते थे। भाषा किसी समाज की स्मृति का भंडार होती है। उसमें पीढ़ियों के अनुभव, संघर्ष, हास्य, संवेदना और जीवन-मूल्य सुरक्षित रहते हैं। किसी भाषा की उपेक्षा वस्तुतः उस समाज की सांस्कृतिक स्मृति की उपेक्षा है।
उनकी साहित्यिक दृष्टि में स्थानीयता और व्यापक भारतीयता के बीच विरोध नहीं था। वे मानते थे कि अपनी मातृभाषाओं और क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान करते हुए ही भारतीय भाषाई संस्कृति को समृद्ध बनाया जा सकता है।
संपादन-कला और संस्थागत योगदान
पत्रकारिता का एक महत्वपूर्ण पक्ष संपादन है। समाचारों और लेखों को प्रकाशित करना ही संपादकीय कार्य की संपूर्णता नहीं है। इसके लिए विषय की समझ, भाषा पर अधिकार, तथ्यात्मक सावधानी, सामग्री का चयन, प्रस्तुति की योजना और प्रकाशन के उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक होती है। पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ ने इस क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उन्होंने अनेक अभिनंदन ग्रंथों और स्मारिकाओं का संपादन किया। इनमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्मृति स्मारिका, 1985; राष्ट्रीय सिख संगत स्मारिका, 1989; बिहार पत्रकारिता संस्थान एवं संग्रहालय की वार्षिक पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ के 1989, 1991 और 1993 के अंक; तथा प्रो. जगन्नाथ प्रसाद मिश्र अभिनंदन ग्रंथ, 1997 प्रमुख हैं।
इन प्रकाशनों का महत्व केवल उनके संपादन तक सीमित नहीं था। स्मारिकाएँ और अभिनंदन ग्रंथ किसी व्यक्ति, संस्था, आंदोलन अथवा सांस्कृतिक परंपरा के योगदान को व्यवस्थित रूप से सुरक्षित रखने का माध्यम होते हैं। वे भविष्य के शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए संदर्भ-सामग्री उपलब्ध कराते हैं।
ऐसे कार्यों में संपादक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। उसे विभिन्न स्रोतों से सामग्री जुटानी पड़ती है, लेखकों से संपर्क करना होता है, तथ्यों और विवरणों को व्यवस्थित करना होता है तथा संपूर्ण प्रकाशन को एक सुसंगत रूप देना होता है। मनोहर जी की संपादकीय सक्रियता उनके संगठन-कौशल और ज्ञान-संपदा का प्रमाण थी।
बिहार पत्रकारिता संस्थान एवं संग्रहालय : एक अमूल्य धरोहर
पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ की पत्रकारिता संबंधी उपलब्धियों में बिहार पत्रकारिता संस्थान एवं संग्रहालय का विशेष स्थान है। पत्रकारिता का इतिहास केवल प्रसिद्ध संपादकों और चर्चित समाचारपत्रों का इतिहास नहीं है। उसमें उन पत्र-पत्रिकाओं का भी महत्व है, जिन्होंने अलग-अलग कालखंडों में सामाजिक चेतना, राजनीतिक विमर्श, साहित्यिक विकास और जनमत के निर्माण में भूमिका निभाई।
पुराने समाचारपत्र और पत्रिकाएँ समय के साथ दुर्लभ होते जाते हैं। कागज की नश्वरता, संरक्षण की कठिनाइयाँ और संस्थागत उपेक्षा के कारण अनेक महत्वपूर्ण प्रकाशन नष्ट हो जाते हैं। उनके साथ ही किसी युग की भाषा, विचारधारा, सामाजिक परिस्थितियों और सार्वजनिक जीवन से जुड़े अनेक प्रमाण भी लुप्त हो जाते हैं।
मनोहर जी ने पत्रकारिता की इस ऐतिहासिक आवश्यकता को समझा। बिहार पत्रकारिता संस्थान एवं संग्रहालय के माध्यम से दुर्लभ पत्र-पत्रिकाओं को सुरक्षित रखने की दिशा में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। इस प्रकार का संग्रहालय पत्रकारिता के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, लेखकों और इतिहासकारों के लिए ज्ञान का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
जब कोई शोधार्थी पुराने समाचारपत्रों के माध्यम से किसी ऐतिहासिक घटना का अध्ययन करता है, तो उसे केवल उस घटना की सूचना नहीं मिलती, बल्कि यह भी समझ में आता है कि उस समय समाज किस प्रकार सोचता था, सार्वजनिक मुद्दों पर क्या बहस होती थी और भाषा तथा अभिव्यक्ति में किस तरह परिवर्तन आ रहे थे। इस दृष्टि से पत्रकारिता का संग्रहालय एक जीवंत ऐतिहासिक अभिलेखागार का कार्य करता है।
मनोहर जी को पटना सिटी के मंगल तालाब में अखिल भारतीय हिंदी पत्र-पत्रिका प्रदर्शनी के आयोजन का श्रेय भी दिया जाता है। इस प्रकार के आयोजन पाठकों और समाज को पत्रकारिता की विविधता से परिचित कराने का अवसर प्रदान करते हैं। वे नई पीढ़ी को यह समझने में सहायता करते हैं कि समाचारपत्र केवल दैनिक घटनाओं के वाहक नहीं, बल्कि सामाजिक इतिहास के महत्वपूर्ण दस्तावेज भी हैं।
उनका यह योगदान आज के डिजिटल युग में भी उतना ही प्रासंगिक है। तकनीक बदलती रहती है, समाचारों के प्रसार के माध्यम बदल जाते हैं, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेजों को सुरक्षित रखने की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होती। मनोहर जी की दृष्टि इस स्थायी आवश्यकता को पहचानने वाली दृष्टि थी।
सम्मान और उपलब्धियाँ : कर्मनिष्ठ जीवन की सार्वजनिक स्वीकृति
पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ के लंबे पत्रकारिता जीवन और सामाजिक-सांस्कृतिक योगदान को विभिन्न संस्थाओं ने सम्मानित किया। उन्हें बिहार सरकार के राजभाषा विभाग की ओर से वर्ष 1986-87 में हिंदी-सेवी पत्रकारिता सम्मान प्रदान किया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दूबे के कर-कमलों से प्राप्त यह सम्मान उनके पत्रकारिता क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान की सार्वजनिक स्वीकृति के रूप में याद किया जाता है।
इसके अतिरिक्त श्री तख्त हरिमंदिर जी प्रबंधक समिति, पटना साहिब, अखिल भारतीय मगही भाषा सम्मेलन और नगर के विभिन्न रोटरी क्लबों सहित अनेक संस्थाओं ने भी उन्हें सम्मानित किया।
इन सम्मानों का महत्व इस तथ्य में निहित है कि मनोहर जी की पहचान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी। पत्रकारिता जगत उन्हें एक कर्मठ पत्रकार के रूप में जानता था, साहित्यिक समाज उन्हें लेखक और वक्ता के रूप में सम्मान देता था, इतिहासप्रेमी उनके ज्ञान से लाभान्वित होते थे और धार्मिक-सांस्कृतिक संस्थाएँ उनके अध्ययन तथा योगदान की सराहना करती थीं।
हालाँकि किसी भी व्यक्ति की वास्तविक महानता पुरस्कारों की संख्या से निर्धारित नहीं होती। उसका वास्तविक मूल्य उस कार्य से आँका जाता है, जो उसके जीवन के बाद भी समाज के लिए उपयोगी बना रहता है। मनोहर जी की कृतियाँ, लेख, भाषण, संपादकीय कार्य और पत्रकारिता के ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण के प्रति उनका समर्पण इसी स्थायी योगदान के प्रमाण हैं।
आदर्श पत्रकारों से प्रेरणा और मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता
पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ के आदर्श पत्रकारों में बाबूराव विष्णुराव पड़ारकर और गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। इन पत्रकारों की परंपरा में पत्रकारिता को केवल पेशे के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व और जनचेतना के माध्यम के रूप में देखने की दृष्टि निहित थी।
गणेश शंकर विद्यार्थी ने निर्भीक पत्रकारिता, मानवीय संवेदना और सामाजिक सौहार्द के लिए अपना जीवन समर्पित किया। बाबूराव विष्णुराव पड़ारकर हिंदी पत्रकारिता के प्रतिष्ठित संपादकों में रहे। ऐसे व्यक्तित्वों से प्रेरणा लेने का अर्थ था कि पत्रकारिता में भाषा की शक्ति के साथ नैतिक साहस और सार्वजनिक हित की भावना को भी महत्व दिया जाए।
मनोहर जी के जीवन में अध्ययन, लेखन, इतिहासबोध और समाज के प्रति जिम्मेदारी का जो समन्वय दिखाई देता है, वह इसी व्यापक पत्रकारिता परंपरा को आगे बढ़ाने वाला था। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से केवल घटनाओं का वर्णन नहीं किया, बल्कि उन विषयों को भी महत्व दिया, जो समय के साथ उपेक्षित हो सकते थे।
वे किसी भी सभा में बोलते तो उनके भाषण में तथ्यों का विस्तार, प्रसंगों की विविधता और अभिव्यक्ति का प्रभाव दिखाई देता था। उनकी वाणी हृदयस्पर्शी होने के साथ-साथ ज्ञान से परिपूर्ण रहती थी। वे अच्छे वक्ता थे, साहित्यकार थे और विभिन्न संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े रहते थे।
ऐसी प्रतिभाएँ समाज को केवल जानकारी नहीं देतीं, बल्कि उसकी बौद्धिक क्षमता को भी विकसित करती हैं। वे लोगों को अपने परिवेश को नए ढंग से देखने, प्रश्न पूछने और इतिहास तथा संस्कृति के महत्व को समझने की प्रेरणा देती हैं।
पीटीआई के सामने प्रदर्शित हुआ पटना के इतिहास का विराट ज्ञान
मनोहर जी की असाधारण स्मरणशक्ति और ऐतिहासिक ज्ञान से जुड़ा एक प्रसंग उनके व्यक्तित्व की विशेषता को स्पष्ट करता है। बताया जाता है कि एक अवसर पर दिल्ली स्थित प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) ने पटना के ऐतिहासिक स्थलों के संबंध में अंग्रेजी में विस्तृत जानकारी माँगी थी। उस समय रामजी मिश्र ‘मनोहर’ ने दूरभाष पर संबंधित ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध कराए। उनकी जानकारी की व्यापकता से संबंधित लोग आश्चर्यचकित रह गए।
इस प्रसंग का महत्व केवल उनकी स्मरणशक्ति में नहीं, बल्कि उनके ज्ञान के स्वरूप में है। वे पटना के ऐतिहासिक स्थलों, उनसे जुड़े प्रसंगों और सांस्कृतिक महत्व के बारे में ऐसी जानकारी रखते थे, जिसे एक ही स्थान पर संकलित करना भी कठिन कार्य हो सकता है।
किसी नगर का इतिहास समझने के लिए उसके अलग-अलग कालखंडों, धार्मिक परंपराओं, सामाजिक परिवर्तनों और स्थापत्य विरासत को एक साथ देखने की आवश्यकता होती है। मनोहर जी ने वर्षों के अध्ययन और अनुभव के माध्यम से अपने भीतर इस व्यापक दृष्टि का विकास किया था।
आज जब सूचना कुछ क्षणों में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच जाती है, तब भी तथ्यात्मक ज्ञान और ऐतिहासिक समझ का महत्व कम नहीं हुआ है। इंटरनेट पर जानकारी की उपलब्धता और किसी विषय का प्रामाणिक ज्ञान होना दो अलग बातें हैं। मनोहर जी का जीवन हमें याद दिलाता है कि वास्तविक विद्वत्ता निरंतर अध्ययन, स्रोतों से परिचय, अनुभव और विषय के प्रति दीर्घकालीन समर्पण से निर्मित होती है।
पाँच दशकों की पत्रकारिता : एक व्यक्ति नहीं, एक परंपरा
पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ ने लगभग पाँच दशकों तक पत्रकारिता की सेवा की। यह अवधि अनेक सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और तकनीकी परिवर्तनों की साक्षी रही। इतने लंबे समय तक सक्रिय बने रहना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है, लेकिन उनकी विशेषता केवल दीर्घकालीन सक्रियता नहीं थी। उन्होंने पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य, इतिहास, धार्मिक अध्ययन, रेडियो वार्ता, पटकथा लेखन और सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए भी अपना समय दिया।
उनके जीवन में ज्ञान अर्जित करने और उसे समाज के साथ साझा करने की निरंतर प्रक्रिया दिखाई देती है। वे जितना अध्ययन करते थे, उतना ही उसे लेखन, भाषण और संस्थागत गतिविधियों के माध्यम से दूसरों तक पहुँचाने का प्रयास भी करते थे।
उनका व्यक्तित्व इस बात का उदाहरण था कि पत्रकार की सामाजिक भूमिका समाचारपत्र के पन्नों से आगे तक जाती है। वह नगर की स्मृतियों का संरक्षक, भाषा का संवाहक, सार्वजनिक जीवन का पर्यवेक्षक और सामाजिक समरसता का समर्थक भी हो सकता है।
आज की पत्रकारिता के सामने अनेक चुनौतियाँ हैं। समाचारों की तीव्र गति, प्रतिस्पर्धा, तकनीकी बदलाव और पाठकों का बदलता व्यवहार पत्रकारिता के स्वरूप को निरंतर प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे समय में मनोहर जी के जीवन से प्रेरणा लेकर तथ्यात्मक विश्वसनीयता, गहन अध्ययन, भाषा की गरिमा, स्थानीय इतिहास के संरक्षण और सार्वजनिक हित के प्रति प्रतिबद्धता को मजबूत किया जा सकता है।
उनकी स्मृति का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब पत्रकारिता की नई पीढ़ी उनके जीवन से जुड़े इन मूल्यों को समझे और अपने काम में अपनाने का प्रयास करे।
29 अक्टूबर 1998 : एक युग का अवसान
29 अक्टूबर, 1998 को पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ का देहावसान हो गया। उनके निधन से पत्रकारिता, साहित्य और ऐतिहासिक अध्ययन के क्षेत्र में एक ऐसे व्यक्तित्व का अभाव उत्पन्न हुआ, जिसकी भरपाई सरल नहीं थी। उनके साथ अनुभव, ज्ञान, स्मृतियों और ऐतिहासिक संदर्भों का एक विशाल संसार भी विदा हो गया।
किसी विद्वान के निधन के बाद उसकी पुस्तकों और लेखों को पढ़ा जा सकता है, उसके भाषणों और कार्यों का उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन उसके अनुभवों की जीवंतता और तत्काल किसी जटिल प्रश्न का उत्तर देने की क्षमता का स्थान आसानी से नहीं लिया जा सकता। मनोहर जी के संबंध में भी यही अनुभूति होती है।
पटना की गलियों, ऐतिहासिक स्थलों, धार्मिक परंपराओं और पत्रकारिता के पुराने संसार से उनका गहरा परिचय था। वे अनेक विषयों पर ऐसी जानकारी रखते थे, जिसे प्राप्त करने के लिए किसी व्यक्ति को वर्षों का अध्ययन करना पड़ सकता है। इसीलिए उनके जाने से केवल एक वरिष्ठ पत्रकार का निधन नहीं हुआ, बल्कि इतिहास और संस्कृति से जुड़ी एक चलती-फिरती ज्ञान-परंपरा का भी अवसान हुआ।
फिर भी महान व्यक्तित्वों की सबसे बड़ी विशेषता यही होती है कि उनका जीवन समाप्त होने के बाद भी उनके विचार और कार्य समाज के लिए प्रेरणा बने रहते हैं। मनोहर जी की ‘दास्ताने पाटलिपुत्र’, उनके असंख्य लेख, उनके संपादकीय कार्य और पत्रकारिता के ऐतिहासिक दस्तावेजों के संरक्षण के प्रति उनका समर्पण आज भी उनकी स्मृति को जीवित रखने के आधार हैं।
उनके जीवन का मूल्यांकन करते समय यह समझना आवश्यक है कि विरासत केवल स्मारकों और पुस्तकों में सुरक्षित नहीं रहती। वह उन मूल्यों में भी जीवित रहती है, जिन्हें कोई व्यक्ति अपने आचरण और कर्म से समाज को सौंपता है। मनोहर जी ने अध्ययन, परिश्रम, सांस्कृतिक जिज्ञासा, सामाजिक उत्तरदायित्व और धार्मिक सहिष्णुता के जिन मूल्यों को महत्व दिया, वे आज भी उतने ही उपयोगी हैं।
नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा-स्रोत
आज की नई पीढ़ी के सामने ज्ञान प्राप्त करने के अनेक साधन उपलब्ध हैं। डिजिटल माध्यमों के जरिए दुनिया भर की जानकारी कुछ क्षणों में प्राप्त की जा सकती है। लेकिन जानकारी की प्रचुरता अपने आप में ज्ञान की गारंटी नहीं है। किसी विषय को गहराई से समझना, तथ्यों की प्रामाणिकता परखना, इतिहास के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करना और प्राप्त ज्ञान को समाजोपयोगी रूप में प्रस्तुत करना अलग प्रकार की साधना है।
पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ का जीवन इसी साधना का उदाहरण है। उन्होंने पत्रकारिता को अध्ययन से जोड़ा, इतिहास को जनसुलभ बनाने का प्रयास किया, भाषाओं और साहित्य के महत्व को समझा तथा विभिन्न धार्मिक परंपराओं के अध्ययन के माध्यम से सामाजिक सद्भाव का संदेश दिया।
नई पीढ़ी के पत्रकार उनसे यह सीख सकते हैं कि किसी खबर की वास्तविक शक्ति केवल उसके शीघ्र प्रकाशन में नहीं, बल्कि उसकी सत्यता, संदर्भ और सामाजिक उपयोगिता में निहित होती है। इतिहास के विद्यार्थियों के लिए उनका जीवन यह प्रेरणा देता है कि स्थानीय इतिहास को गंभीरता से पढ़ा और संरक्षित किया जाना चाहिए। साहित्यकारों के लिए उनका लेखन यह संदेश देता है कि विषयों की विविधता और निरंतर अध्ययन रचनात्मकता को व्यापक बनाते हैं। समाजसेवियों के लिए उनका जीवन यह दर्शाता है कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी और ज्ञान का प्रसार एक-दूसरे के पूरक हैं।
उनकी स्मृति में आयोजित कार्यक्रमों, लेखों और चर्चाओं का उद्देश्य केवल अतीत का गुणगान करना नहीं होना चाहिए। उनसे जुड़े संस्थानों, दुर्लभ पत्र-पत्रिकाओं, लेखों और ऐतिहासिक सामग्रियों के संरक्षण की दिशा में ठोस प्रयास भी आवश्यक हैं। यदि उनकी रचनाओं का व्यवस्थित संकलन, डिजिटलीकरण और अध्ययन किया जाए, तो आने वाली पीढ़ियों को पत्रकारिता तथा पटना के इतिहास के संबंध में महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध हो सकती है।
यही किसी महान पत्रकार के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी—उसके नाम का स्मरण करने के साथ-साथ उसके कार्यों को सुरक्षित रखना और उसके मूल्यों को आगे बढ़ाना।
पत्रकारिता के आकाश का अमर दीपस्तंभ
पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ का संपूर्ण जीवन एक ऐसी कर्मगाथा है, जिसमें पत्रकारिता की निष्ठा, साहित्य की संवेदना, इतिहास की गंभीरता, वक्तृत्व की प्रभावशीलता और समाजसेवा का समर्पण एक साथ दिखाई देता है। वे केवल समाचारपत्रों में लिखने वाले पत्रकार नहीं थे; वे पटना की ऐतिहासिक स्मृतियों के सजग संरक्षक, दुर्लभ पत्र-पत्रिकाओं के महत्व को समझने वाले दूरदर्शी कर्मयोगी, अनेक धार्मिक परंपराओं के अध्येता और जनजीवन से जुड़े विषयों पर मुखर रहने वाले समाजसेवी थे।
उन्होंने अपनी लेखनी से पाँच दशकों तक समाज की सेवा की। एक हजार से अधिक लेखों, सौ से अधिक आकाशवाणी वार्ताओं, अनेक संपादित प्रकाशनों, ‘दास्ताने पाटलिपुत्र’ जैसी कृति और बिहार पत्रकारिता संस्थान एवं संग्रहालय से जुड़े अपने योगदान के माध्यम से उन्होंने ज्ञान की एक ऐसी विरासत निर्मित की, जिसे विस्मृत करना संभव नहीं है।
उनकी विशेषता यह थी कि वे अपनी विद्वत्ता को केवल व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का साधन नहीं बनाते थे। उनका ज्ञान समाज के काम आए, लोग अपने इतिहास को जानें, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति समझ विकसित करें तथा पत्रकारिता के महत्व को पहचानें—इन उद्देश्यों की झलक उनके कार्यों में मिलती है।
उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें स्मरण करते हुए यही कामना की जानी चाहिए कि भारतीय पत्रकारिता में अध्ययनशीलता, सत्यनिष्ठा, सामाजिक संवेदना और सांस्कृतिक चेतना की परंपरा और मजबूत हो। पटना की ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित करने, दुर्लभ प्रकाशनों को सुरक्षित रखने और नई पीढ़ी को अपने अतीत से परिचित कराने के लिए उनके योगदान को प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया जाए।
उनके जीवन पर चरितार्थ होती ये पंक्तियाँ मानवीय प्रेम, आत्मीयता और कर्म की सार्थकता का सुंदर संदेश देती हैं-
“तुम उठो तो रात की रानी तुम्हारे पाँव चूमे,
और यदि तुम मुस्कुराओ, साथ में हर फूल झूमे।
चाल से चंचल पवन भी होड़ लेकर द्वार जाये,
आदमी वह धन्य है, जो आदमी-सा प्यार पाये।”
निश्चय ही पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ ऐसे ही व्यक्तित्व थे, जिन्होंने अपने ज्ञान, कर्म, व्यवहार और लेखनी से लोगों के हृदय में स्थान बनाया। उनका जीवन इस सत्य का साक्षी है कि मनुष्य की महानता उसके पद अथवा प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि उसके द्वारा समाज को दी गई स्थायी विरासत से निर्धारित होती है।
29 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए यही कहना उचित होगा कि रामजी मिश्र ‘मनोहर’ केवल एक नाम नहीं, बल्कि भारतीय पत्रकारिता, पटना के इतिहास और सांस्कृतिक चेतना की एक अमूल्य धरोहर हैं। उनकी स्मृतियाँ तब तक जीवित रहेंगी, जब तक पत्रकारिता को जनसेवा, इतिहास को सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान को समाज की साझा संपत्ति मानने वाले लोग इस धरती पर मौजूद रहेंगे।
विनम्र श्रद्धांजलि!
पं. रामजी मिश्र ‘मनोहर’ अमर रहें-अपनी लेखनी, अपनी विद्वत्ता और अपनी अमूल्य विरासत में।
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