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माँ जगदम्बे का स्कंद रूप, स्नेह-प्रेम का सागर

माँ जगदम्बे का स्कंद रूप, स्नेह-प्रेम का सागर

कुमार महेंद्र
पंचम दिवस की पावन बेला,
भक्ति-सुमन का सजा है थाल।
माँ स्कंदमाता के दर्शन से,
होता जीवन निहाल।
ममता, करुणा, प्रेम की प्रतिमा,
भक्त धन्य कृपा-प्रसाद पाकर।
माँ जगदम्बे का स्कंद रूप, स्नेह-प्रेम का सागर।।


विशुद्ध चक्र की अधिष्ठात्री,
महिमा अपरंपार।
योग-साधना, ज्ञान-ज्योति से,
करतीं भव से पार।
गौरी, पार्वती, माहेश्वरी,
ज्ञान-ज्योति से जग उजागर।
माँ जगदम्बे का स्कंद रूप, स्नेह-प्रेम का सागर।।


सिंहवाहिनी मात भवानी,
कार्तिकेय की मात।
दिव्य कमल पर विराजित होकर,
करतीं जग का त्रात।
दुःख-संकट के मेघ मिटाकर,
भरतीं सुख की गागर।
माँ जगदम्बे का स्कंद रूप, स्नेह-प्रेम का सागर।।


नारी-शक्ति का मान बढ़ाएँ,
जग में करें उजास।
प्रेम, दया, सद्भाव जगाकर,
पूर्ण करें हर आस।
दूर करें अंधियारा,
नवचेतना की ज्योति जगाकर।
माँ जगदम्बे का स्कंद रूप, स्नेह-प्रेम का सागर।।


वंदन, अभिनंदन, हे स्कंदमाता,
करुणा का विस्तार।
भक्ति-सुधा से तृप्त करें माँ,
खोलें मुक्ति-द्वार।
सफल हों सबके शुभ मनोरथ,
श्रीचरणों में अपना शीश नवाकर ।
माँ जगदम्बे का स्कंद रूप, स्नेह-प्रेम का सागर।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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