बेमरिहा के दरद

बेमरिहा के दरद

जय प्रकाश कुवंर
ना जीयत बानी,
ना मरत बानी।
डाक्टर आ अस्पताल के बिल,
रोज भरत बानी।।
डाक्टर के अंतरमन कहत बाटे,
जैसे तोहार रोग ठीक हो जाई।
अस्पताल से तू अपना घर चल ज‌इब,
हमार आ अस्पताल के कमाई बंद हो जाई।।
बहुत प‌इसा चढ़ावा देके,
हम डाक्टर बनल बानी।
अपनहीं सब से कमाई कके,
अस्पताल खड़ा क‌इले बानी।।
रोवत कराहत एहिजा रहऽ,
अंदर के दुख केहू से मत कहऽ।
गहना खेत बिकाव भले,
अस्पताल आ दवाई के बिल भरत रहऽ।।
इहंवा से तू कतहुँ ज‌इब,
सब अस्पताल में अइसहीं लुट‌इब।
रोग ठीक होई की ना,
माथा पिट सब जगह घिघिअइब।।
जीयल मरल रोगी के,
जानत केवल विधाता बा।
आज कल डाक्टर आ रोगी के,
खाली फिस भरला ले नाता बा।।
भगवान् मत करस जे,
केहू का घर में रोग समाव।
डाक्टर आ अस्पताल के बिल भरे में,
केहू के गहना खेत बिकाव।।


समसामयिक विषय पर यह मेरी रचना भोजपुरी भाषा में है। यह आज कल चिकित्सा जगत में छाई हुई रोगी और डाक्टर तथा अस्पताल के संबंधों को उजागर करती है। आशा है मेरे साथ जुड़े हुए कुछ संस्थानों के पाठक इसे पढ़ेंगे और भाव को भाषाई कठिनाई के बावजूद भी पढ़ कर आशीर्वाद देंगे।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ