"अपने प्रकाश का साक्षी"

"अपने प्रकाश का साक्षी"

पंकज शर्मा
मैंने स्वयं से पूछा—
क्या अँधेरे में जीता मनुष्य
सबकी सहानुभूति पा सकता है,
किन्तु अपने प्रकाश के साथ
उसे अकेला होना पड़ता है?


भीतर से स्वर आया—
शायद पीड़ा सहज स्वीकार्य है,
पर उत्कर्ष अनेक अंतर्विरोध
जगा देता है।


मैंने अपनी यात्राओं में
अभावों का मौन सहा है,
परिश्रम की अग्नि में
असंख्य स्वप्न तपाए हैं।
जब कोई साक्षी नहीं था,
तब भी मैं चलता रहा;
आज प्रकाश है,
तो दृष्टियों में प्रश्न हैं।


क्या यह मेरी सफलता है,
या किसी का अंतर्द्वंद्व,
जो मेरे उल्लास में
अपनी अपूर्णता देखता है?
मैं कैसे जानूँ—
किस मौन के पीछे सद्भाव है,
किस मुस्कान में ईर्ष्या,
किस प्रशंसा में पराया हुआ मन?


तभी स्वयं से कहा—
अपनी प्रसन्नता का भार
दूसरों की स्वीकृति पर
क्यों रखूँ मैं?
जो पथ मैंने अश्रुओं से सींचा,
उसकी सार्थकता का निर्णय
किसी अन्य की दृष्टि
कैसे कर सकती है?


मेरी उपलब्धियाँ
मेरे अहंकार का शिखर नहीं,
मेरे धैर्य की साक्षी हैं;
उनमें समय का अनुशासन,
पराजयों का आत्मबोध
एवं उस अदृश्य का अंश है,
जिसे मैं जानता नहीं,
फिर भी नकार नहीं पाता।


अब न किसी से आगे,
न किसी के विरुद्ध—
मैं केवल अपने भीतर
अधिक मनुष्य होना चाहता हूँ।
क्योंकि जीवन का अंतिम प्रश्न
यह नहीं कि मेरे प्रकाश से
कितने नेत्र चकाचौंध हुए,
अपितु यह
प्रकाशवान होकर भी
क्या मैं अपने भीतर
अंधकार से मुक्त हुआ?


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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