निखर गई कायनात, जब आई शरद पूनम की रात

निखर गई कायनात, जब आई शरद पूनम की रात

कुमार महेंद्र
चमक उठा अंबर का आँगन,
महक उठा धरती का कण-कण।
शीतल-मंद पवन के झोंके,
हर्षित कर गए जन-जन का मन।
चाँदी की चादर ओढ़ धरा ने,
पाई ज्योत्स्ना की सौगात।
निखर गई कायनात, जब आई शरद पूनम की रात।।


शुभ्र चंद्र-किरणों की धारा,
धोने लगी तिमिर जग सारा।
झीलों में लहरें मुस्काईं,
नभ में चमका तारा-तारा।
वृंदावन में रचा महारास,
झूम उठी सारी कायनात।
निखर गई कायनात, जब आई शरद पूनम की रात।।


भक्ति-सुधा छलक उठती है,
प्रेम हृदय में लहराता है।
यमुना के शीतल तट पर,
दिव्य माधुर्य उतर आता है।
राधा-कृष्ण की मोहक छवि से,
सजी प्रीत की मधुर बारात।
निखर गई कायनात, जब आई शरद पूनम की रात।।


प्रकृति-सुंदरी के मुखमंडल पर,
चंद्रकलाओं का रूप निखरता।
अमृतमयी रश्मियों को पाकर,
जन-जन का अंतर्मन हर्षता।
मिटें जगत के दुःख-संताप,
चहुँदिशि प्रेम-सुधा की बरसात।
निखर गई कायनात, जब आई शरद पूनम की रात।।


चंद्र-किरणें अमृत बरसाएँ,
खिल उठें आशाओं के फूल।
मन से मिट जाएँ सब संशय,
प्रेम में हो न कोई भूल।
विश्व-प्रेम की ज्योति जलाकर,
मानवता महके जैसे परिजात।
निखर गई कायनात, जब आई शरद पूनम की रात।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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